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संदीप पौराणिक-

इन बच्चों की उम्र भले ही 15 वर्ष से कम हो, मगर इनकी आंखों में सपने बड़े-बड़े हैं। ये बच्चे समाज में बढ़ते भ्रष्टाचार से लेकर बिजली, पानी की समस्याओं तक से समाज को मुक्ति दिलाना चाहते हैं। वे इसके लिए कलम को हथियार बनाने के लिए तैयार हैं। यहां हम उन बाल पत्रकारों की बात कर रहे हैं, जो पत्रकारिता में अपना भविष्य संवारने के साथ समाज को समस्याओं से छुटकारा दिलाना चाहते हैं। 

ग्वालियर में बच्चों के लिए काम करने वाली संस्था यूनिसेफ, महिला बाल विकास विभाग और गैर सरकारी संगठनों चाइल्ड राइट ऑब्जरबेटरी, विभावरी तथा कल्पतरु द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित दो दिवसीय बाल पत्रकार कार्यशाला में शामिल हो रहे बाल पत्रकार समाज में पल रहे भ्रष्टाचार को विकास व तरक्की के लिए सबसे बड़ा रोड़ा मानते हैं।

गुना जिले के नैगुआं गांव का रहने वाला हनुमंत धाकड़ पढ़ता तो कक्षा आठवीं में है मगर उसे बढ़ते भ्रष्टाचार की चिंता सताए जा रही है। वह कहता है कि आज भ्रष्टाचार सबसे बड़ी समस्या बन गया है, सारी समस्याओं की जड़ ही भ्रष्टाचार है। इस पर अंकुश लगना जरूरी है। उसे अपने गांव की बिजली, सड़क की समस्या भी नजर आती है।

हनुमंत इन सारी समस्याओं के खात्मे के साथ गांव से लेकर समाज तक की तस्वीर बदलने के लिए कलम को कारगर हथियार मानता है, इसीलिए उसने पत्रकार बनने की ठानी है। हनुमंत की बातें जाहिर करती हैं कि वह बच्चा जरूर है मगर अपनी जिम्मेदारियों से बखूबी वाकिफ है और समस्याओं की समझ रखता है।

इसी गांव का एक और बच्चा कपिल शराब बंदी का पक्षधर है। वह कहता है कि उसके गांव का माहौल बिगाड़ने में शराब की सबसे बड़ी भूमिका है। पिछली कुछ घटनाओं की चर्चा करते हुए वह बताता है हर शाम को उसके गांव का माहौल सामान्य नहीं रहता, गाली की आवाजें सुनाई देती हैं और झगड़े के हालात बन जाते हैं। उसकी इच्छा है कि गांव से शराब की दुकान हटाई जाए।

भोपाल का आदेश मुकाती मानता है कि समाज में सुधार लाने के लिए भ्रष्टाचार पर अंकुश जरूरी है। वह कहता है कि आज जो समस्याएं बढ़ रही हैं उनकी मूल वजह भ्रष्टाचार और लोगों का अपनी जिम्मेदारियों से विमुख होना है। वह उदाहरण देता है कि चौराहे पर खड़ा एक पुलिसकर्मी भी अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाता, मगर जब मुख्यमंत्री या किसी प्रमुख व्यक्ति को निकलना होता है तो वही पुलिसकर्मी पूरी मुस्तैदी से काम करता नजर आता है।

भोपाल के ही शुभम त्रिपाठी का मानना है कि आम आदमी का जीवन सुखमय बनाना है तो जनसंख्या पर नियंत्रण जरूरी है। वह कहता है कि सड़कें लगभग वही हैं मगर उन पर चलने वाले लोगों व वाहनों की संख्या बढ़ती जा रही है, इसका असर यातायात पर पड़ रहा है। इतना ही नहीं दुर्घटनाओं की वजह भी कहीं न कहीं बढ़ती जनसंख्या ही है। बढ़ती जनसंख्या ने अन्य सुविधाओं पर भी असर डाला है।

दो दिवसीय इस कार्यशाला में आए बच्चे उन समस्याओं से पूरी तरह वाकिफ हैं, जो आम आदमी को परेशान कर देने वाली हैं। इसके लिए उन्होंने जनजागृति लाने का अभियान छेड़ने का संकल्प भी लिया है। वे हालात बदलने के लिए कलम को हथियार बना रहे हैं। इस कार्यशाला में इन बच्चों ने अपनी बेबाक राय जाहिर करने में हिचक नहीं दिखाई।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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By admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

2 thoughts on “कलम को हथियार बनाते नन्हे पत्रकार”

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