क्या हो अगर लोकपाल भी भ्रष्ट हो जाए?

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– कृष्ण कुमार

(मीडिया दरबार आलेख प्रतियोगिता के तहत द्वितीय पुरस्कार से सम्मानित)

आज देश में शासन तंत्र का आलम यह है कि भ्रष्टाचार निरोधी विभाग ही भ्रष्टाचार के सबसे बड़े अड्डे बन गए हैं। लोग सिफारिश लगवा कर उस विभाग में अपनी पोस्टिंग करवाते हैं और भ्रष्टअधिकारियों की बाहें मरोड़ कर या राजी-खुशी मिल बांट कर लाखों करोड़ों कमाते हैं। ऐसे में अहम सवाल ये है कि अगर एक सर्व शक्तिमान पद बन जाए और उस पर कोई भ्रष्ट व्यक्ति काबिज हो जाए तो क्या होगा? सबसे बड़ा सवाल तो ईमानदार लोकपाल को ढूंढकर लाने का है। जब बड़े-बड़े पदों पर नियुक्त अधिकारी, राजनेता और न्यायाधीश भी भ्रष्ट आचरण करते रहे हों तो यह काम बहुत मुश्किल हो जाता है। ऐसे में अगर लोकपाल को न्यायपालिका, कार्यपालिका व विधायिका तीनों के ऊपर निगरानी रखने का अधिकार दे दिया तो भ्रष्ट लोकपाल पूरे देश का कबाड़ा कर देगा। फिर कहीं बचने का रास्ता भी नहीं मिलेगा।
जब अरविन्द केजरीवाल, स्वामी अग्निवेश व किरण बेदी ने देश के कुछ खास लोगों को दिल्ली बुलाकर प्रस्तावित लोकपाल विधेयक पर खुली चर्चा की तो यह स्पष्ट हो गया कि विधेयक के मौजूदा प्रारूप को लेकर सिविल सोसाइटी में ही भारी मतभेद हैं। हालांकि अनेक विद्वानों ने कहा है कि यद्यपि न्यायपालिका में भारी भ्रष्टाचार है, फिर भी न्यायपालिका को लोकपाल के अधीन लाना सही नहीं होगा। मेरा मानना है कि न्यायपालिका की जबावदेही सुनिश्चित करने की अलग व्यवस्था बनाई जानी चाहिए, क्योंकि उसकी कार्यप्रणाली और कार्यपालिका की कार्यप्रणाली में मूलभूत अन्तर होता है। जिसके लिए ‘न्यायपाल’ जैसी कोई व्यवस्था रची जा सकती है। मेरा सुझाव है कि प्रस्तावित लोकपाल को सिर्फ राजनेताओं के आचरण पर निगाह रखने का काम दिया जाना चाहिए। इस तरह अपनी लोकतांत्रिक व्यवस्था में जो ‘चैक व बैलेंस’ की व्यवस्था है, वह भी बनी रहेगी।
अब तक के घोटालों में जयललिता, लालू यादव, सुखराम, मधु कौडा, ए राजा और सुरेश कलमाड़ी तक, बड़े से बड़े राजनेता बिना लोकपाल के ही मौजूदा कानूनों के तहत पकड़े जा चुके हैं। अगर इन्हें माकूल सजा नहीं मिल सकी तो हमें सीबीआई की जाँच प्रक्रिया में आने वाली रूकावटों को दूर करना चाहिए। केन्द्रीय सतर्कता आयोग की स्वायत्ता सुनिश्चित करनी चाहिए। एकदम से सारी पुरानी व्यवस्थाओं को खारिज करके नई काल्पनिक व्यवस्था खड़ी करना, जिसकी सफलता अभी परखी जानी है, बुद्धिमानी नहीं होगी।
मौजूदा लोकपाल को सरकार और सिविल सोसाइटी दोनों ने कई अहम अधिकारों से वंचित रखा है। यह भी देखने में आता है कि कई स्वंयसेवी संस्थाएं (NGOs) जो विदेशी आर्थिक मदद लेती हैं, उसमें भी बड़े घोटाले होते हैं। अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाएं भी भारत में बड़े घोटाले कर रही हैं। तो ऐसे सभी मामलों को जाँच के दायरे में लेना चाहिए। इस पर किसी प्रस्ताव में अभी तक कोई प्रावधान नहीं है। प्रस्तावित विधेयक में नेताओं और अफसरों के विरूद्ध तो कड़े प्रावधान हैं, लेकिन समिति ने उन भ्रष्ट उद्योगपतियों को पकड़ने के लिए लोकपाल विधेयक में कोई प्रावधान फिलहाल नहीं रखा हैं। गौरतलब है कि भ्रष्टाचार बढ़ाने में सबसे बड़ा हाथ, बड़े औद्योगिक घरानों का देखा गया है जो चुनाव में 500 करोड़ रूपया देकर अगले 5 सालों में 5 हजार करोड़ रूपये का मुनाफा कमाते हैं। जब तक यह व्यवस्था नहीं बदलेगी, तब तक राजनैतिक भ्रष्टाचार खत्म नहीं हो सकता।

भ्रष्टाचार से आम हिन्दुस्तानी दुखी है और इससे निज़ात चाहता है इसलिए अन्ना का अनशन शहरी मध्यम वर्ग के आक्रोश की अभिव्यक्ति बन गया। सवाल यह भी है कि पी जे थॉमस को ‘सही’ ठहराने वाले प्रशांत भूषण और उनके अरबपति पिता अनैतिक आचरण के अनेक विवादों में घिरे हैं, फिर भी उन्हें अन्ना समिति से हटा नहीं रहे हैं। सवाल यह भी उठता है कि इस वाली ‘सिविल सोसाइटी’ ने परदे के पीछे बैठकर जल्दबाजी में सारे फैसले कैसे ले लिए? टीम अन्ना ने देश को न्यायविदों के नाम सुझाने का 24 घण्टे का भी समय नहीं दिया। भूषण पिता-पुत्र को ले लिया और विवाद खड़ा कर दिया। सर्वेंट ऑफ इण्डिया सोसाइटी व ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि इस समिति के सदस्यों ने ‘लोकपाल विधेयक’ पर उनका अर्से से चल रहा आन्दोलन यह कहकर बन्द करवा दिया कि इस मुद्दे पर सब मिलकर लड़ेंगे। फिर उनकों ठेंगा दिखा दिया।

उधर बाबा रामदेव का भी आरोप है कि भ्रष्टाचार के विरूद्ध सारी हवा उन्होंने बनाई, इन लोगों को टीवी चैनल पर कवरेज दिलाई और इनकी सभाओं में अपने समर्थक भेजकर भारी भीड़ जुटाई। लेकिन अन्ना हजारे ने धरने शुरू होते ही बाबा से भी पल्ला झाड़ लिया। बाबा इससे आहत हैं और आगे की लड़ाई वे इन्हें बिना साथ लिये लड़ना चाहते हैं। मैं भी अन्ना हज़ारे की माँग का पूरा समर्थन करता हूं और चाहता हूं कि भ्रष्टाचार के विरूद्ध कड़े कानून बनें, लेकिन ऐसे हड़बड़ी में नादानी भरे और रहस्यमयी तरीके से नहीं।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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