पेड न्यूज़ पर रोक है तो क्या..? नए-नए तरीकों का भी ‘जागरण’ हो चुका है

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पिछले लोकसभा चुनावों में पेड न्यूज को लेकर जिस एक बड़े अखबार की सबसे अधिक आलोचना हुई थी उसका नाम दैनिक जागरण है। हालांकि इस बार अभी तक किसी प्रत्याशी ने जागरण के खिलाफ कोई शिकायत नहीं की है लेकिन दैनिक जागरण अपने तरीके से पेड न्यूज का कारोबार करने से नहीं चूक रहा है। वाराणसी मंडल में ऐन चुनाव से पहले यहां छपनेवाले अखबार के संस्करण में दो ऐसे विज्ञापन नजर आ ही गये जो जागरण की दूषित मानसिकता का संकेत देते हैं।

15 फरवरी को इस क्षेत्र में मतदान से पूर्व जागरण में छपे ये दो विज्ञापन संकेत करते हैं कि चुनाव आयोग की सख्ती के बावजूद भी अखबारों ने पेड न्यूज के नये नये तरीके इजाद कर लिये और कारोबार को अंजाम दिया। लोकसभा चुनाव में अखबारों से जो सबसे बड़ी शिकायत थी वह यह कि जो कन्टेन्ट लिखा गया उसमें विज्ञापन शब्द नहीं लिखा गया इसलिए उससे यह समझने में मुश्किल हुई कि अखबार में छपी सामग्री समाचार है या विज्ञापन। तो इसका तोड़ जागरण ने कुछ यूं निकाला है कि सामग्री तो विज्ञापन है लेकिन विज्ञापन के अंदर जो लिखा है वह समाचार है।

ये दोनों विज्ञापन दो अलग अलग उम्मीदवारों के हैं। इसमें एक उम्मीदवार रोहनिया से बसपा के प्रत्याशी रमाकांत सिंह पिन्टू का है तो दूसरा विज्ञापन पिण्डरा से निवर्तमान विधायक और दबंग माफिया अजय राय का है। वैसे तो इन दोनों ही विज्ञापनों में बहुत छोटे अक्षरों में advt लिखकर विज्ञापन होने का संकेत किया गया लेकिन इन विज्ञापनों में ही असली खेल है। विज्ञापन के साथ ही यह भी लिखा हुआ है कि यह संबंधित प्रत्याशी द्वारा जारी किया गया है।

जाहिर है, ऐसा करने से विज्ञापन का खर्च प्रत्याशी के खाते में जुड़ जाएगा और अखबार पर कोई आरोप नहीं लगेगा, लेकिन जब आप विज्ञापन पढ़ेंगे तो पायेंगे कि यह तो विज्ञापन है ही नहीं। यह तो सीधे सीधे प्रशंसा समाचार है जिसे विज्ञापन बनाकर छाप दिया गया है और नीचे उसी प्रत्याशी द्वारा जारी किया गया बताया जा रहा है जिसकी प्रशंसा की जा रही है। इस तथाकथित विज्ञापन की भाषा देखने से कोई भी पत्रकार आसानी से हक़ीकत समझ सकता है।

रमाकांत सिंह पिन्टू के नाम से जो विज्ञापन छापा गया है, जरा उसकी भाषा पर गौर फरमाइये- ” रोहनिया विधानसभा के मुकाबले में रमाकांत सिंह पिन्टू को क्षेत्रीय प्रत्याशी होने का पूरा फायदा मिल रहा है। यही वजह है कि जाति और धर्म तथा पार्टी का बंधन तोड़कर सभी समाज के लोग उनका साथ दे रहे हैं। गांवों में पहुंचते ही नौजवानों का हुजूम साथ चल दे रहा है तथा गांव के बुजुर्ग सिर पर हाथ रखकर आशिर्वाद दे रहे हैं। रमाकान्त सिंह मिन्टू के मिलनसार व्यवहार और ब्लाक प्रमुख होने का भी उन्हें पूरा लाभ मिल रहा है।”

ऐसे ही लंबे चौड़े प्रचार के बाद आखिर में लिखा गया है-” मतदाताओं के रुझान को देखते हुए रमाकांत सिंह पिन्टू की जीत सुनिश्चित लग रही है।” इस पहले विज्ञापन को पढ़ने के बाद किसी के भी जेहन में तत्काल जो सवाल उभरेगा वह यह कि प्रत्याशी वोट मांगने और जनता से अपील करने की बजाय उन्हें हर हाल में अपने विजयी होने के कारण समझा रहा है। वह अपने तथाकथित विज्ञापन में न तो वोट मांग रहा है और न ही जनता से कोई अपील कर रहा है। उसका विज्ञापन बता रहा है कि वह तो विजेता है और उसके विजेता होने के जो कारण है वे कारण विज्ञापन में बता दिये गये हैं। और उस पर तुर्रा यह कि विज्ञापन के आखिर में उसी व्यक्ति की ओर से विज्ञापन को जारी बताया जा रहा है, जिसकी तारीफ की गई है।

इसी तरह दूसरा विज्ञापन अजय राय का है। कांग्रेस के अजय राय इस वक्त पिण्डरा विधानसभा से विधायक हैं और एक बार फिर मैदान में हैं। अजय राय की ओर से जो तथाकथित विज्ञापन प्रकाशित किया गया है उसकी भाषा भी विज्ञापन की आड़ में खबर छापनेवाला ही है। विज्ञापन इन शब्दों के साथ शुरू होता है कि “पिण्डरा की जनता इन दिनों चट्टी चौराहों पर स्वयं ही चौपाल लगाकर अजय राय और कांग्रेस को लेकर चर्चा कर रही है। एक माहौल बन गया है।” विज्ञापन में चुनाव आयोग की सख्ती का भी जिक्र किया गया है तो यह भी बताया गया है कि दूसरे प्रत्याशी जाति, धर्म के नाम पर वोट मांग रहे हैं लेकिन कोई सुनने को तैयार नहीं है।

ये दो विज्ञापन हमें क्या बता रहे हैं? क्या सचमुच पेड न्यूज हमारी पत्रकारिता से खत्म हो गया या फिर उसने ज्यादा खतरनाक गठजोड़ कायम कर लिया है जिसमें वे खामियां दूर कर दी गई हैं जिसके कारण 2009 में बड़े अखबारी घरानों को आलोचना झेलनी पड़ी थी। हो सकता है इस दफा जागरण यह कह दे कि यह तो विज्ञापन है और विज्ञापन की भाषा क्या है यह फैसला विज्ञापनदाता करता है लेकिन क्या इस सफाई से जागरण निर्दोष साबित हो जाएगा? अगर ऐसा है तो गलत दावे और भ्रामक प्रचार के लिए अखबार और प्रत्याशी दोनों को दंडित किया जाना चाहिए। अगर विज्ञापन को खबर बनाना अपराध है तो खबर को विज्ञापन के रूप में छापना कौन सा पुनीत काम है? क्या उसे अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जाना चाहिए या फिर उसमें प्रकाशक की कोई जिम्मेदारी नहीं होनी चाहिए? फैसला शायद चुनाव आयोग को ही करना होगा। (विष्फोट)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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2 thoughts on “पेड न्यूज़ पर रोक है तो क्या..? नए-नए तरीकों का भी ‘जागरण’ हो चुका है

  1. दैनिक जागरण से और उम्मीद भी क्या की जा सकती है? सबसे ‘बिका हुआ’ अखबार है। अब जनता भी इसकी हक़ीकत समझ चुकी है, तभी तो इसकी बिक्री सिमटने लगी है।

  2. दैनिक जागरण से एसे घटिया नापाक कार्य की उम्मीद नहीं थी.

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