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मिनी कश्मीर की झील में डूब रहा है कमल, लेकिन हाथी कहीं खेल ना बिगाड़ दे हाथ का

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उत्‍तराखण्‍ड में भाजपा  पहली बार व्यक्ति विशेष के नाम पर चुनाव लड़ रही है। कहा जा रहा है कि प्रदेश की 72 फीसद जनता चाहती है कि खंडूड़ी मुख्यमंत्री बनें। परन्‍तु इसके लिए जरूरी है कि हर विधानसभा में भाजपा का कमल खिले। हालांकि उत्तराखंड के मिनी कश्मीर कहे जाने वाले पिथौरागढ़ में एंटी इनकंबेंसी फैक्‍टर असरकारक होता दिख रहा है जिससे भाजपा को नुकसान माना जा रहा है, और मीडिया रिपोर्टों की मानें तो ‘खंडूड़ी हैं जरूरी’ का नारा यहां उल्टा पड़ता हुआ दिखाई दे रहा है। लेकिन वहां हाथी की धमक से हाथ भी कांपता दिख रहा है। पिथौरागढ, डीडीहाट, धारचूला में भाजपा की सीट फंसती हुई नजर आ रही है, चन्‍द्रशेखर जोशी की एक रिपोर्ट

उत्तराखंड में  भाजपा और कांग्रेस का चुनावी समीकरण पूरी तरह से उलझ गया है। भाजपा के लिए मिनी कश्मीर कही जाने वाली पिथौरागढ़ की सीट फंसती हुई नजर आ रही है। पिछले दस सालों में पहला बार यह स्‍थिति आई है कि चुनाव प्रचार में जाति व क्षेत्रवाद विकास के मुद्दों पर भारी पड़ते हुए दिखाई दे रहे हैं। ज्ञात हो कि राज्य गठन के बाद पिथौरागढ़ विस में भाजपा के खाते में रही है। इस बार यहां एंटी इनकंबेंसी फैक्टर दिखाई दे रहा है।   पिथौरागढ़ में लोस चुनाव के दौरान भाजपा छह हजार से अधिक मतों से पिछड़ गई थी। तब जनता के आक्रोश को सत्तारूढ़ पार्टी ने नहीं समझा था।  वहीं आक्रोश अब फिर रई झील, नैनी सैनी हवाई पट्टी से नियमित उड़ान, नर्सिग कालेज आदि बड़े मुद्दे के रूप में विधानसभा चुनाव में भी दिखाई दे रहे हैं। कांग्रेस ने पिथौरागढ़ में भाजपा राज में कुमाऊं के साथ शिक्षा के क्षेत्र में की गई उपेक्षा को एक नया मुद्दा बनाया है। इस तरह अनेक मुददो से इस विस सीट पर कांटे का मुकाबला  दिखाई दे रहा है। भाजपा के विश्लेषक भी मान रहे हैं कि इस बार पिथौरागढ़ सीट पर कांटे की टक्कर है। 2002 और 2007 के चुनाव में भाजपा को जिताने वाले समर्पित कार्यकर्ताओं की कमी भी दिखाई दे रही है।

धारचुला विस सीट में सरकार और विधायक के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी फैक्‍टर से भाजपा को नुकसान माना जा रहा है, ‘खंडूड़ी हैं जरूरी’ का नारा यहां उल्टा पड़ता हुआ दिखाई दे रहा है। उक्रांद (पी) के शीर्ष नेता काशी सिंह ऐरी, भाजपा प्रत्याशी खुशाल सिंह पिपलिया और कांग्रेस प्रत्याशी हरीश धामी के बीच कांटे का मुकाबला है।  शुरूआत में यहां काशी सिंह ऐरी ने काफी बढ़त बनाई थी लेकिन अब अंतिम दौर में काशी सिंह ऐरी फंसते हुए नजर आ रहे हैं जबकि विधायक एवं निर्दलीय प्रत्याशी गगन सिंह रजवार भाजपा, कांग्रेस और यूकेडी के वोट बैंक में सेंध लगा रहे हैं। वहीं ऐरी के पक्ष में सहानुभूति की लहर भी दिखाई दे रही है, इस क्षेत्र में पूरा चुनाव धारचूला विस के 111 गांवों को मृगविहार अभ्यारण्य से बाहर करने के साथ ही बिजली, पानी, सड़क, शिक्षा, चिकित्सा पर केंद्रित है। पलायन भी यहां बड़ा मुद्दा है लेकिन भाजपा, कांग्रेस के दिग्गजों ने इन मुद्दों की हवा निकाल दी है। ताबड़तोड़ प्रचार और सारे संसाधन झोंक देने से ऐरी की राह कांटों से भर दी है। भाजपा, कांग्रेस के कुछ दिग्गज भी ऐरी को किसी भी हालत में रोकने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।

इसके अलावा बसपा प्रत्याशी राजेन्द्र कुटियाल ने अनुसूचित जनजाति के वोट बैंक में सेंधमारी की है। इसका नुकसान ऐरी को हो रहा है। हालांकि ऐरी को अनुसूचित जनजाति का वोट दिलाने के लिए इस जाति के तमाम आईएएस, आईएफएस, आईपीएस, पीसीएस, एलाइड पीसीएस, एलआईसी एवं तमाम बैंक अफसर जीतोड़ कोशिश कर रहे हैं। इसके बावजूद अनुसूचित जनजाति का काफी वोट कुटियाल के पक्ष में जाता दिखाई दे रहा है।

पिथौरागढ जनपद की डीडीहाट सीट में इस बार हाथी पहुंच चुका है।  भाजपा के प्रदेश अध्‍यक्ष व प्रत्याशी बिशन सिंह चुफाल को डीडीहाट विस सीट में  हाथी ने अपनी चिंघाड़ से हिला दिया  हैं।   बसपा प्रत्याशी जगजीवन सिंह कन्याल इस सीट पर अप्रत्याशित परिणाम लाकर चौंकाने वाली स्‍थिति में पहुंच गए हैं। मतदान के लिए अंतिम चरण में  उत्तराखंड के मिनी कश्मीर में हाथी रौंदता हुआ आगे बढता दिख रहा है। इस सीट से भाजपा प्रदेश अध्यक्ष चुफाल की  ही नहीं भाजपा की प्रतिष्ठा दांव पर है।

वैसे चुनाव की घोषणा से पहले भाजपा के लिए यह सबसे मुफीद सीट मानी जा रही थी लेकिन किसी दौर में भाजपा के सबसे वजनदार नेता जगजीवन सिंह कन्याल ने हाथी पर सवार होकर एकतरफा संघर्ष को काफी रोचक बना दिया है। इस सीट को अपने खाते में करने के लिए इस सीमांत सीट पर भाजपा के सर्वोच्‍च महारथी लालकृष्ण आडवाणी को लाया गया, और कांग्रेस ने अपने दिग्‍गज महारथी दिग्गज  केन्‍द्रीय मंत्री हरीश रावत को उतारा जिन्‍होंने कांग्रेस प्रत्याशी रेवती जोशी को जिताने के लिए गांव गधेरों में जनसभा कर चुनावी फिजा बनाने की । जबकि  बसपा प्रत्याशी जगजीवन सिंह कन्याल सिर्फ अपने बल पर इस महासंग्राम में डटे हैं, वह पिछले पांच साल से लोगों से मिलते जुलते रहे हैं और चुनाव प्रचार के बाद उभर रही तस्वीर में इसका असर भी देखने को मिल रहा है। उल्लेखनीय है कि अविभाजित उत्तर प्रदेश में 80 के दशक को छोड़कर हर बार डीडीहाट सीट में परिवर्तन होता रहा है। कभी कांग्रेस तो कभी भाजपा और कभी यूकेडी ने यहां से जीत का स्वाद चखा। राज्य गठन के समय इस सीट से चुफाल ही विधायक थे। इसके बाद 2002 और 2007 में भी चुफाल की विजय का डंका बजता रहा है।

नए परिसीमन के बाद बेरीनाग तहसील का पूरा हिस्सा गंगोलीहाट में चले जाने के कारण भाजपा प्रत्याशी को नुकसान हुआ है। यह क्षेत्र भाजपा का गढ़ रहा है। यह क्षेत्र हर बार जीत-हार में निर्णायक भूमिका निभा चुका है। टिकटों के बंटवारे के समय यह माना जा रहा था कि इस सीट पर चुफाल की एकतरफा जीत तय है। कांग्रेस ने रेवती जोशी को मैदान में उतारकर इस अनुमान को और बल दे दिया था लेकिन जैसे-जैसे चुनाव प्रचार बढ़ रहा है कि बसपा प्रत्याशी सहानुभूति लहर पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। बता दें कि 80 के दशक में कन्याल भाजपा के वरिष्ठ नेताओं में एक थे और नगर पालिका पिथौरागढ़ के अध्यक्ष भी बने थे। 2002 के चुनाव में कन्याल ही डीडीहाट से भाजपा के प्रत्याशी थे लेकिन ऐन वक्त पर चुफाल को टिकट मिला। इसके बाद कन्याल ने कनालीछीना से भाग्य आजमाने की कोशिश की और उनके रास्ते को उक्रांद के शीर्ष नेता काशी सिंह ऐरी ने जाम कर दिया। इसके बाद भाजपा पूर्व सीएम भगत सिंह कोश्यारी से बिगड़े रिश्तों के कारण कन्याल ने पहले कांग्रेस तो बाद में बसपा का दामन थाम लिया। डीडीहाट में चर्चा है कि कन्याल ने ही भाजपा प्रदेश अध्यक्ष को राजनीति का ‘क, ख, ग’ सिखाया। अब यहां किस्मत ने गुरु और शिष्य को ही मुख्य मुकाबले में खड़ा कर दिया है। डीडीहाट शहर से लेकर तमाम ग्रामीण हिस्सों में ‘हाथी’ तेजी से आगे बढ़ रहा है लेकिन चुफाल की व्यक्तिगत छवि ‘हाथी’ को आगे बढ़ने से रोक रही है। इस कारण डीडीहाट सीट भी चुनाव नतीजों के हिसाब से फंसती हुई नजर आ रही है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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