गमला चोर पत्रकारों को बिजली कंपनी ने दिया जोर का झटका, वह भी जोर से

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हाय रे! दिल्ली-एनसीआर के पत्रकार। दलाली के बाद अब चोरी पर भी उतर गए हैं। चोरी भी किसकी, कुछ रुपयों के गमलों की। चोरी के बाद सीनाजोरी भी की इन पत्रकारों ने लड़ाई-बहस की इसके बाद भी गमले ले जाने में सफलता नहीं मिली इन गमला चोरों को। सुरक्षा गार्डों ने सबकी गाडि़या चेक कीं और गमले उतार लिए। ये कारनामा छोटे या कस्बों के पत्रकारों ने नहीं की, जिन्हें पर्याप्त तनख्वाह नहीं मिलती, बल्कि ऐसा किया है ज्यादा पैसा पाने तथा कार में चलने वाले पत्रकारों ने। 

खबर है कि कि दिल्ली के मयूर विहार फेस वन में शनिवार को दिल्ली को बिजली सप्लाई करने वाली कंपनी बीएसईएस ने एक कार्यक्रम आयोजित किया था। इसमें मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को चीफ गेस्ट बनाकर बुलाया गया था। कंपनी के अधिकारियों ने कुछ पत्रकारों को बुलाया था तो कुछ खुद ही पहुंच गए। कार्यक्रम हुआ अच्छा हुआ। भाषणबाजी के बाद सीएम वहां से निकल गईं। अब चूंकि कार्यक्रम में सीएम को आना था तो वहां की साज-सज्जा भी ठीक-ठाक की गई थी। सुंदर-सुंदर गमले तथा फूल भी रखे गए थे। ये गमले और फूल वहां मौजूद कई पत्रकारों की आंखों में चढ़ गए।

बताया जा रहा है कि इसके बाद चार पहिया गाडि़यों से आए पत्रकार एक-दो करके गमले अपनी कारों में रखने लगे, बिना पूछे, बिना किसी को बताए। पत्रकारों का गमला बटोरो अभियान  नोएडा स्थित एक बड़े मीडिया समूह से जुड़ी एक महिला पत्रकार की अगुवाई में हुआ जो खुद को समूह के एनसीआर चैनल का हेड भी बताती हैं। उनके अलावा भी कई बड़े पत्रकार इस काम में लगे हुए थे। गार्डों ने जब सरेआम गमलों की चोरी होते देखा तो उन्होंने इन्हें मना किया। पत्रकारों ने धौंस दिखाया तथा गमले उतारने से इनकार कर दिया। गार्ड बिजली कंपनी के अधिकारियों और पुलिस को बुला लाए। इसके बाद कुछ कहासुनी हुई तथा अधिकारियों ने जबरिया गार्डों को आदेश देकर गमले उतरवाए।

शर्म की बात तब हुई जब गार्डों ने गेट से बाहर जाने वाले सभी पत्रकारों की कार चेक की। जिन इक्का-दुक्का पत्रकारों ने गाड़ी बाहर खड़ी की थी और गमला रख चुके थे, वो भागने में सफल रहे। बाकी गाड़ी वाले कई पत्रकार अपना सा मुंह लेकर लौटे। बेइज्जत भी हुए और गमला भी नहीं मिला। हालांकि कार्यक्रम स्थल पर पत्रकारों की गमला चोरी और सीनाजोरी की काफी चर्चा रही। जो युवा पत्रकार थे तथा पत्रकारों की इस तरह की हरकत पहले नहीं देखी थी वो अपने आप को शार्मिंदा महसूस कर रहे थे।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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