अमेरिकी कानूनों के विरोध में विकीपीडिया समेत कई वेबसाइटों की हड़ताल

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ऑनलाइन इनसाइक्लोपीडिया विकीपीडिया बुधवार को बंद रखी गई। अमेरिकी कांग्रेस में विचाराधीन पायरेसी-रोधी विधेयकों के विरोध में वेबसाइट को 24 घंटे के लिए बंद रखा जाएगा। कंपनी का कहना है कि अगर ये विधेयक पारित हो जाते हैं तो इन विध्वंसकारी कानूनों से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ‘खतरे में’ पड़ जाएगी और वैश्विक वेबसाइटों पर सेंसरशिप लागू हो जाएगी।

विकीपीडिया का अंग्रेजी संस्करण बुधवार रात अर्ध-रात्रि (भारतीय समयानुसार सुबह साढ़े दस बजे) से एक दिन के लिए बंद हो गया। विकीपीडिया के अलावा न्यूज वेबसाइट रेडिट और ब्लॉग बोइंग-बोइंग ने भी अपनी साइटों को बंद रखने का फैसला किया है। इन वेबसाइटों को न्यूज कॉर्प के प्रमुख रूपर्ट मडरेक का भी साथ मिला है।

मडरेक ने एक ट्वीट में इन विधेयकों का साथ देने के लिए राष्ट्रपति ओबामा की आलोचना की है। हालांकि, ट्विटर ने इस तरह के किसी विरोध से इनकार किया है। उसके मुताबिक, एक देश में हो रही गतिविधियों के कारण एक वैश्विक वेबसाइट को बंद नहीं किया जाना चाहिए।

विकीमीडिया फाउंडेशन के संचार प्रमुख जिमी वेल्स ने कहा, ‘एक अप्रत्याशित निर्णय में विकिपीडिया समुदाय ने अमेरिकी सीनेट में प्रस्तावित कानूनों के खिलाफ 24 घंटे के लिए विकीपीडिया का अंग्रेजी संस्क रण बंद करने का निर्णय किया है।’ वेल्स ने कहा है कि ये कानून मुक्त व खुली इंटरनेट व्यवस्था को नुकसान पहुंचाएंगे और अमेरिका में अंतरराष्ट्रीय वेबसाइटों की सेंसरशिप के तरीके इजाद करेंगे।

अमेरिकी संसद के निचले सदन कांग्रेस में स्टॉप ऑनलाइन पायरेसी एक्ट (सोपा) और सीनेट में प्रोटेक्ट आईपी एक्ट (पिपा) लाए गए हैं। अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि इन कानूनों से पायरेसी रोकने में मदद मिलेगी। वहीं, इस कानून का विरोध कर रहे लोगों का मानना है कि इन कानूनों की आड़ में इंटरनेट सेंसरशिप लागू करने की कोशिश हो रही है।

क्या है सोपा और पिपा?

इन कानूनों के तहत अनधिकृत कॉपीराइट सामग्री वाली साइटों तक पहुंच ब्लॉक कर दी जाएगी।
सामग्री के अधिकृत मालिक या अमेरिकी सरकार के पास इन साइटों को बंद कराने के लिए अदालत से आदेश मांगने का हक होगा।

विदेशी मदद से चल रहे साइटों के लिए विज्ञापन और राजस्व जुटाना मुश्किल हो जाएगा। (भास्कर)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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