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आर के शर्मा ने ही दी थी पत्रकार शिवानी की सुपारी : दिल्ली पुलिस

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पत्रकार शिवानी भटनागर हत्याकांड में पूर्व आइपीएस अधिकारी आरके शर्मा एवं अन्य को बरी किए जाने के फैसले के खिलाफ दिल्ली पुलिस सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई है। बुधवार को दायर याचिका में पुलिस ने जांच के दौरान एकत्र किए गए सुबूतों का विस्तृत विवरण पेश किया है। उसमें सभी अभियुक्तों के आपस में किए गए फोन कॉल और आने-जाने एवं ठहरने का ब्योरा शामिल है। पुलिस ने हत्या के पीछे कारण और इरादे के साथ मुख्य साजिशकर्ता आरके शर्मा को ही बताया है। याचिका में हाई कोर्ट के फैसले को कई आधारों पर चुनौती दी गई है।

शिवानी भटनागर की 23 जनवरी, 1999 को नई दिल्ली में उनके फ्लैट में हत्या हो गई थी। निचली अदालत ने आरके शर्मा, श्री भगवान, सत्यप्रकाश एवं प्रदीप शर्मा को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। दिल्ली हाई कोर्ट ने गत वर्ष 12 अक्टूबर को आरके शर्मा, श्री भगवान एवं सत्यप्रकाश को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया था। हाई कोर्ट ने सिर्फ प्रदीप शर्मा की उम्रकैद पर ही मुहर लगाई थी।

हाईकोर्ट ने कहा था कि इंडियन एक्सप्रेस की पत्रकार की हत्या किए जाने के संबंध में इरादा स्पष्ट नहीं है, हालांकि यह सवाल खड़ा करता है कि क्या प्रदीप शर्मा ने अकेले यह काम किया या आर के शर्मा एवं अन्य अथवा किसी दूसरे व्यक्ति की शह पर किया।

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा था, ”कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिनका उत्तर हमारे समक्ष पेश की गई सामग्री के आधार पर नहीं दिया जा सकता है। हमारे समक्ष पेश किए गए साक्ष्य उच्च गुणवत्ता के नहीं हैं।” अदालत ने यह भी कहा कि सभी कॉल रिकार्ड और महत्वपूर्ण दस्तावेज पहेली के जैसे हैं जिनपर भरोसा नहीं किया जा सकता है। न्यायमूर्ति बी डी अहमद और न्यायमूर्ति मनमोहन सिंह की पीठ ने कहा था कि अभियोजन पक्ष आर के शर्मा और हत्यारे के बीच संबंध स्थापित करने में विफल रहा। यहां तक कि कॉल के ब्यौरे से संबंधित महत्वपूर्ण रिकार्ड के साथ छेड़छाड़ की गई है और उनपर भरोसा नहीं किया जा सकता है।

अदालत ने कहा था कि अभियोजन पक्ष इस अपराध का इरादा और सह अभियुक्तों और प्रदीप शर्मा के बीच संबंध को स्थापित करने में विफल रही। हाईकोर्ट ने अभियोजन पक्ष की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि शिवानी की हत्या आर के शर्मा [एयर इंडिया के तत्कालीन सतर्कता निदेशक] की शह पर की गई।

दिल्ली पुलिस ने हाईकोर्ट के इस फैसले को चुनौती देते हुए कहा है कि हाई कोर्ट का यह मानना कि अभियोजन अपना केस साबित करने में सफल नहीं हुआ, ठीक नहीं है। पेश सुबूतों को देखते हुए ये फैसला ठीक नहीं है। मामले में ऐसे परिस्थितिजन्य साक्ष्य पेश किए गए हैं जो कि अभियुक्तों की शिवानी भटनागर की हत्या करने की साजिश को साबित करते हैं। हाई कोर्ट ने कहा है कि अभियोजन पक्ष अभियुक्त प्रदीप शर्मा एवं अन्य अभियुक्तों के बीच संबंध और संपर्क को साबित नहीं कर पाया है।

पुलिस के अनुसार इस बात का सुबूत मिलना बहुत मुश्किल है कि अपराधियों के बीच क्या साठगांठ हुई थी। सिर्फ मौजूद तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर उसका मतलब निकाला जा सकता है। जरूरी नहीं है कि सभी अभियुक्त एक दूसरे को जानते हों, या सभी को साजिश की गोपनीयता मालूम हो। (जागरण)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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