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राजनीतिक दलों से नाई जाति का सौदा

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 -भारत सेन।।

भारतीय राजनीति में शासन और सत्ता से हमेशा दूर रही नाई जाति भारत के सभी राज्यों से अपने विधायक और सांसदो की मांग राजनीतिक दलो से करती रही हैं। सामाजिक और शैक्षणिक रूप पिछड़ी हुई और आर्थिक रूप से कमजोर भूमिहीन नाई जाति देश की आजादी के समय से ही अनुसूचित जाति में शामिल किये जाने की मांग करती रही हैं। इसके अलावा नाई जाति जनसंख्या के अनुपात में राज्यों की विधान सभा, लोक सभा और राज्य सभा में अपने प्रतिनिधि चाहती हैं। यह सच हैं कि भारत सरकार और राज्य सरकार के विभिन्न आयोगों में नाई जाति के प्रतिनिधी नही हैं। वही पर दूसरी ओर भारत सरकार एवं राज्य सरकार की प्रथम श्रेणी एवं द्वितीय श्रेणी की शासकीय सेवाओं में नाई जाति की मौजूदगी नही के बराबर रही हैं।

आगामी लोक सभा चुनाव और विधान सभा चुनाव में नाई जाति सीधे राजनीतिक दलो से सौदे की बात करने का मन बना चुकी हैं। भारतीय राजनीति में सत्ता तक पहुंचने के लिए तीन चीजे आवश्यक मानी जाती हैं। मनी याने पैसा, मीडिया याने समाचार पत्र और माफिया याने अपराध की ताकत जिनके पास होती हैं, वही सत्ता तक पहुंच पाता हैं। नाई जाति के पास यह तीनो ताकत नही हैं इसलिए वह वोट बैंक की तरह इस्तेमाल होने से बचना चाहती हैं। सेन समाज संगठन के विभिन्न सम्मेलनों में हिन्दू वर्ण व्यवस्था पर प्रहार होता हैं और सेन समाज को राजनीतिक न्याय दिलवाने की आवश्यकता पर बल दिया जाता हैं। बहुजन समाज पार्टी के पूर्व विधान सभा सदस्य डा0 आईएमपी वर्मा नाई जाति में राजनीतिक चेतना का प्रचार प्रसार के पूरे मध्य प्रदेश और अन्य जिलो का दौरा पिछले दस सालो से कर रहे हैं। इसका सीधा प्रभाव सेन समाज सम्मेलनों पर दिखाई पडऩे लगा हैं।

सेन समाज लोक सभा और विधान सभा में अपने प्रतिनिधि चाहता हैं। अक्सर यह देखने में आता हैं कि सेन समाज संगठन के नेताओं को चुनाव के दौरान राजनीति दलों से पता नही क्या मिल जाता हैं कि नाई जाति के घर घर जाकर एक खास राजनीतिक दल को वोट करने की बात करते हैं। ऐसा मालूम पडता हैं कि हमारे नेता वोटो का सौदा स्वयं के लिए कर लेते हैं। लेकिन इस बार ऐसा नही होगा, सेन सामज के युवक सीधे राजनीतिक दलो से चुनाव के दौरान सम्पर्क करके सेन समाज के सामुदायिक भवन निर्माण के लिए अनुदान की मांग की मांग करेगे और अनुदानकत्र्ता का सम्मान करेगे। राजनीतिक दल सेन समाज को चुनाव में अपना टिकिट देगा अथवा संबंधित लोक सभा क्षेत्र या विधान सभा क्षेत्र से अनुदान देगा।

राजनीतिक दलो से मिलने वाली अनुदान राशि सेन समाज संगठन के बैंक खाते में चली जायेगी, जिससे समाज का विकास होगा। अगर राजनीतिक दल अनुदान नही देते हैं तो उस दशा में सेन समाज तीसरी और चौथी ताकत को अपना अघोषित समर्थन कर सकता हैं। सेन समाज के इस कदम से राजनीति में फैला भ्रष्टाचार पर एक करारी चोट होगी। राजनीतिक दल एक वोट को पाने के लिए करीब 5 सौ रूपये से ज्यादा खर्च कर देते हैं। चुनाव के दौरान पैसा और शराब बटने से चुनाव का खर्च ज्यादा बढ़ जाता हैं। सेन समाज संगठन अपने जाति के लोगों को संगठित करने के लिए पैसा खर्च करने के साथ मेहन भी करता हैं। इसलिए सेन समाज की मेहनत का प्रतिफल उसे मिलना चाहिए।

संत सेनजी महाराज के नाम से विद्यालय, सामुदायिक भवन और विश्वविद्यालय होना चाहिए। सेन समाज को आर्थिक मदद एक मुश्त अब चुनावों के अवसर पर ही मिलने की संभावना हैं। इस योजना पर सेन समाज में व्यापक सहमति प्राप्त किये जाने का अभियान जारी हैं। अगर यह योजना पर कठोरता से अमल कर लिया जाता हैं तो आगामी चुनावों में सेन समाज प्रदेश स्तर पर और राष्ट्रीय स्तर पर निर्णायक भूमिका निभा सकेगा। सेन समाज का इस समय एक ही नारा हैं। चाहे जो मजबूरी हो, मांग हमारी पूरी हो।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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