अम्बिका सोनी ने विधिक पत्रकारिता के लिए कुछ नही किया

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-भारत सेन।।

भारत सरकार की सूचना और प्रसारण मंत्री, अम्बिका सोनी की उपलब्धि यादगार हो जाती अगर उन्होने विधिक पत्रकारिता को सूचना और प्रसारण का अनिवार्य अंग बना दिया होता। भारत में विधिक पत्रकारिता को गति और महत्व मिलता। इसके साथ ही भारत के गिने चुने विधिक पत्रकार और कोर्ट रिर्पोटर, अम्बिका सोनी को विधिक पत्रकारिता के लिए हमेशा याद करते। यही आरोप भारत के कानून मंत्री पर लगता हैं कि उन्होने विधिक पत्रकारिता के लिये कुछ नही किया।
पत्रकारिता क्रांति हैं। पत्रकारिता की इस परिभाषा में उसका महत्व और परिणाम दोनो बताया गया हैं। कानून और न्याय का शासन स्थापित करने के लिए विधिक पत्रकारिता की आवश्यकता हैं। भारत में विधिक पत्रकारिता और कोर्ट रिपोटिंग बड़ी ही उपेक्षित स्थान रखते हैं। समाचार पत्रों और टेलीविजन न्यूज चैनलों में विधि संवाददाता का कोई पद नही हैं। कोर्ट रिपोटिंग होती ही नही हैं। इससे कानून और न्याय के सिद्धांतो का प्रचार प्रसार नही हो पाने से विधिक साक्षरता का उद्देश्य ही पूरा नहीं हो पाता हैं। सामाजिक
नियंत्रण में कानून और न्याय की भूमिका का निवर्हन नहीं हो पाता हैं। भारत में के विश्वविद्यायलयों में विधिक पत्रकारिता के पाठ्यक्रम ही नही हैं। विधिक पत्रकारिता विशेषज्ञों का काम हैं। विधिक पत्रकारिता के लिए विधि स्नातक उपाधिक के साथ ही न्यायालयीन कार्यो का कम से कम 10 वर्षो का अनुभव के बाद ही विधिक पत्रकारिता की योग्यता पैदा होती हैं। जिस तरह भूसे में से गेंहू को अलग करना होता हैं उसी तरह घटनाओं में से समाचारों को अलग कर पहचनाना पत्रकार का काम होता हैं। न्यायालय के प्रकरण में जो महनत एक अधिवक्ता करता हैं, एक फैसला लिखने में जो मेहनत एक न्यायधीश करता हैं, ठीक उतना ही मानसिक परिश्रम एक विधिक पत्रकार को न्यायालय के फैसले पर समाचार लिखने में करना होता हैं।
भारत में विधिक पत्रकारिता केवल कानून की महंगी पुस्तके और मासिक पत्रिकाओं के प्रकाशन तक सीमित हैं जिसे उच्च न्यायालय और अधीनस्थ न्यायालय के न्यायधीश और अधिवक्ताओं के अतिरिक्त कोई नही पढ़ता हैं। जिला न्यायालय के फैसलों पर पत्रकारिता अगर होगी तो इसका लाभ आम जनता को सीधा मिलेगा। इस महत्वपूर्ण क्षेत्र में पत्रकारिता करने वालों की दशा बहुत खराब हैं। राष्ट्रीय समाचार पत्रों से लेकर स्थानीय समाचार पत्रों में विधिक पत्रकारिता का कोई स्थान नही हैं। विधिक पत्रकार की कोई विशिष्ट
पहचान नही हैं।

राष्ट्रीय स्तर और प्रादेशिक स्तर पर विधिक पत्रकारों को कोई सम्मान विधिक सेवा दिवस के अवसर पर नहीं मिलता हैं। सबसे बड़ी बात विधिक पत्रकारिता, समाचार पत्रों के लिए अनिवार्य नही हैं। विधि के साथ ही पत्रकारिता की सेवा करने वाले विधिक पत्रकारिता को संरक्षण और विशिष्ट पहचान की जरूरत हैं। इसके लिए भारत सरकार के कानून मंत्री और सूचना और प्रसारण मंत्री को मिलकर प्रयास करके भारत में बड़ा परिवर्तन ला सकते हैं।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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