काटजू को फिर नागवार गुजरा मीडिया का रवैयाः खिलाड़ियों को भारत रत्न की मांग को बताया बकवास

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सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज और प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष जस्टिस मार्कंडेय काटजू के विवादास्पद बयानों का सिलसिला कायम है। अपने ताज़ा बयान में काटजू ने क्रिकेटरों और फिल्मी सितारों को भारत रत्न दिए जाने की मांग पर तल्ख टिप्पणी की है। उनका कहना है कि क्रिकेटरों और फिल्मी सितारों को भारत रत्न देना इस पुरस्कार का मजाक उड़ाना होगा क्योंकि इन लोगों का समाज के लिए कोई योगदान नहीं है।

काटजू ने इस बारे में कहा, ”लोग क्रिकेटरों और फिल्मी सितारों को भी भारत रत्न देने की बात कर रहे हैं। हम लोग सांस्कृतिक स्तर के बहुत ही निचले पायदान पर जा रहे हैं। हम अपने असली हीरो को नजरअंदाज करते हैं और सतही लोगों के बारे में बातें करते हैं। आज हमारा देश बहुत ही निर्णायक दौर से गुजर रहा है। हमें ऐसे लोगों की जरूरत है जो देश को दिशा देकर इसे आगे ले जा सकें। वे जीवित न भी हों तो भी ऐसे लोगों को भारत रत्न देना चाहिए।”

सवाल यह उठता है कि काटजू खुद को पत्रकार समझते हैं या उन्हें संचालित करने वाला? कुछ लोगों का मानना है कि वे बार-बार अपनी पसंद देश के लोगों पर थोपने की जुगत में रहते हैं। हाल ही में जब मीडिया ने हिन्दी फिल्मों के सदाबहार हीरो देव आनंद को भाव-भीनी श्रद्धांजलि दी तो भी काटजू साहब बौखला उठे। उन्होंने तपाक से मीडिया की आलोचना करते हुए कह डाला कि ये गलत हो रहा है।

ऐसा अक्सर देखने को मिलता है कि मीडिया फिल्म और मनोरंजन जगत की घटनाओं के बहाने काफी समय जन सरोकार के मामलों से दूर रहने में बिताता है, लेकिन शायद काटजू साहब यह भूल रहे थे कि नौजवान हो या बुजुर्गवार, देव आनंद साहब के लिए सम्मान शायद ही किसी के दिल में न हो।

काटजू ने कहा कि उन्होंने मिर्जा गालिब और शरत चंद्र चटोपाध्याय के लिए भारत रत्न की मांग की थी, जिसके लिए उनकी आलोचना हो चुकी है। ”मैं यह कहना चाहता हूं कि मरणोपरांत पुरस्कार देने में कोई बुराई नहीं है। इससे पहले भारत रत्न कई विभूतियों को मरणोपरांत मिला है। इनमें सरदार पटेल औैर डॉ. अंबेडकर शामिल हैं।” उन्होंने जोड़ा।

पहले भी काटजू ने अपने विवादास्पद बयान में कहा था कि मौजूदा दौर में ज़्यादातर पत्रकारों को इतिहास, भूगोल, राजनीति विज्ञान, अर्थशास्त्र, दर्शनशास्त्र की जानकारी नहीं है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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  1. श्री काटजू एक पूर्व जज है तो उनके बौद्धिक स्तर का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है, उनके अधिकाँश वक्तव्य उनकी समझ और पूरी जिंदगी के निचोड़ से उत्पन्न होते हैं , ऐसे में कुछ एक विचार हो सकता है अस्वीकार्य हो जाएँ लेकिन उन गलत बयानों से उनका सम्पूर्ण व्यक्तित्व प्रभावित नहीं कर सकते, वो जो कहते हैं ये उनका अपना अभिमत है उसे देश पर थोपने वाला विचार नहीं कहा जा सकता क्योंकी सभी को अपने विचार व्यक्त करने का मौलिक अधिकार प्राप्त है. और वो भी ऐसा करते हैं. जिसे उनकी बातों से मिर्च लगती है वे खिलाफत में बोल सकते हैं, रहा सवाल भारत रत्ना का तो वे सही तो कह रहे हैं, क्या होगा जब भारत रत्ना ऐसे लोगों को दिया जाने लगेगा जिनके कारण से किसी की जिंदगी बेहतर नहीं हुई, जिनका सामजिक रूप से भारत में कोई योगदान नहीं रहा, कोई बता सकता है सचिन और अमिताभ से इस देश की कितनी करोड जनता के जीवन में बदलाव आया, इन्होने भारत के समाजिक और सांस्कृतिक ताने बाने में क्या-क्या योगदान दिया. मेरे ख्याल से कौड़ी भर नहीं, तो फिर इस श्रेष्ठ पुरष्कार का अवमूल्यन क्यों, यदि आपको उनके सम्मान की इतनी ही खुजाल है तो इसे के समकक्ष कोई नया पुरष्कार और शुरू कर ले.

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