क्या दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र से विचारों की आजादी छीनने के जुगाड़ में है सरकार?

admin 2
0 0
Read Time:4 Minute, 55 Second

खबर है कि सोनिया और मनमोहन सिंह के खिलाफ की गई टिप्पणियों से संचार मंत्री कपिल सिब्बल खफा हैं और आलाकमान को खुश करने के लिए साइट्स के प्रतिनिधियों को बुलाकर इस पर आपत्ति जाहिर की। अब आलोचना के डर से कपिल सिब्बल सफाई दे रहे हैं। उन्होंने साफ किया है कि सरकार का फेसबुक और ट्वीट जैसी कंपनियों पर पाबंदी लगाने का कोई इरादा नहीं है।

सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर सेंसरशिप के मुद्दे पर मचे बवाल के बाद ये भी सवाल उठ रहे हैं कि कहीं इसके पीछे अन्ना इफेक्ट तो नहीं, क्योंकि हजारों लोग फेसबुक के जरिए अन्ना के आंदोलन से जुड़े थे। अन्ना आंदोलन के दौरान बड़ी संख्या में लोगों ने अपनी राय फेसबुक पर जाहिर की थी। कहा जा रहा है कि सरकार को इस बात का डर है कि अगर विपक्ष इसी फॉर्मूले को अपनाता है तो उसके लिए नुकसानदेह होगा।।

सरकार के ताज़ा ऐलान के बाद अब सवाल उठने लगे हैं कि क्या संचार मंत्री अन्ना के आंदोलन के दौरान उन्हें फेसबुक और बाकी सोशल नेटवर्किंग साइट्स के जरिये मिल रहे समर्थन को मॉनीटर कर रहे थे। यह सवाल इसलिए क्योंकि 28 अगस्त को अन्ना हजारे का बारह दिन का अनशन खत्म हुआ था और कपिल सिब्बल उसके ठीक हफ्ते भर बाद पांच सितंबर को इस संबंध में सोशल साइट्स के पदाधिकारियों से मिले।

इस दौरान भ्रष्टाचार को लेकर फेसबुक पर जारी बहसों ने उनके दिमाग की घंटी बजा दी थी। फेसबुक पर अन्ना के आंदोलन को लेकर उन दिनों हलचल तेज थी। लोग सरकार की सुस्ती के खिलाफ खुलकर फेसबुक पर अपनी राय दे रहे थे। तो क्या सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर सेंसर थोपने के फैसले के पीछे अन्ना इफेक्ट है।

प्रेस कॉन्फ्रेंस में कपिल सिब्बल से जब ये सवाल पूछा गया तो वो हंसकर टाल गए। टीम अन्ना के सदस्य पहले भी आरोप लगा चुके हैं कि आंदोलन के दौरान उनके फेसबुक अकाउंट को ब्लॉक किया गया था। अन्ना के आंदोलन के दौरान टीम अन्ना ने लोगों को साथ जोड़ने के लिए एसएमएस का भी खूब इस्तेमाल किया था। आपको याद होगा आंदोलन खत्म होने के कुछ ही दिनों बाद संचार मंत्रालय ने बल्क एसएमएस पर भी पाबंदी लगा दी थी। ये कानून बना दिया गया कि एक दिन में एक मोबाइल नंबर से सिर्फ सौ एसएमएस भेजे जा सकते हैं।

दरअसल गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, फेसबुक और याहू के प्रतिनिधियों ने कंटेंट को लेकर कुछ कर पाने में असमर्थता जाहिर कर दी है। सोशल साइट्स के इस रवैये से सिब्बल खुश नहीं थे। सिब्बल का कहना है कि इस तरह के साइट्स पर धार्मिक भावनाओं को भड़काने वाली टिप्पणियां की जाती है। जिसकी इजाजत नहीं दी जा सकती। सिब्बल ने साफ तौर पर कहा है कि प्रेस की आजादी पर पाबंदी लगाने का उनकी सरकार को कोई इरादा नहीं है लेकिन धार्मिक भावनाओं को भड़काने की इजाजत नहीं दी सकती। लेकिन इन साइट्स पर लगाम लगाने की सरकार की रणनीति का खुलासा करने से सिब्बल ने इंकार कर दिया है।

लेकिन लाख टके का सवाल यह है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि अन्ना के आंदोलन के बाद सरकार आंदोलनों के लिए इंटरनेट का रास्ता रोकना चाहती हो? दुनिया जानती है कि मिस्र की क्रांति में फेसबुक ने सबसे बड़ा रोल निभाया था। इससे घबराकर चीन ने अपने देश में फेसबुक पर बैन लगा दिया। तो अब क्या भारत की सरकार दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र से विचारों की आजादी छीनने के जुगाड़ में जुटी है?

About Post Author

admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
Happy
Happy
0 %
Sad
Sad
0 %
Excited
Excited
0 %
Sleppy
Sleppy
0 %
Angry
Angry
0 %
Surprise
Surprise
0 %
Facebook Comments

Average Rating

5 Star
0%
4 Star
0%
3 Star
0%
2 Star
0%
1 Star
0%

2 thoughts on “क्या दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र से विचारों की आजादी छीनने के जुगाड़ में है सरकार?

  1. आखिर कोंग्रेस KE
    नेता क्यों इतने असहाय है ,क्यों नहीं आवाज उठाते जो उनके दिल की है और देश हित मै है,क्यों काठ पुतली बने है जिसको इस देशवासिओं की भावनाओं
    से नहीं,बल्कि देश को अपने निजी स्वार्थ क्र लिए इस्तेमाल करना है

  2. ये सही हें कि किसी भी संवाद का एक तरीका हें लेकिन अपने तरफ आने वाले कटाक्ष ही क्यों कुधन पैदा करते हें ! मुझे ध्यान हें लोकपाल के मुद्दे पर माननीय दिग्विजय सिंह जी में साडी मर्यादाए पार कर दी थी, यहाँ तक शायद उज्जैन में एक समारोह के दोरान कुछ युवाओ के पीछे भागे थे , जब हमारे जिम्मेदार राज नेता ये हरकत करते हें तो शायद जनता को सस्ता और सुरछित जरिया सोसिअल नेटवर्क लगता हें और यहाँ तक आज बड़े बड़े नेताओ ने भी फीड बेक के लिए इसका सहारा लिया हें जाता हें !
    इसलिए जन मानस के द्वारा यदि कोई एक्शन या कमेन्ट दिया जाता हें उसे हम सकारात्मक सोच मानकर उसके हिसाब से अपने क्रिया कलाप को परिवर्तित करे न कि उसे समूल नष्ट कारनमे का प्रयास करे? लेकिन शायद अग्न्ग्रेजो कि गुलामी में अपने कीमती २०० बर्ष व्यतीत करने के बाद आज ही उसी सोच में अपने कार्य की और अग्रसर हें न कि नै सोच के साथ.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Next Post

जनसंदेश TV के मालिक रामचंद्र प्रधान से छिन सकती है लालबत्ती और BSP सदस्यता?

उत्तर प्रदेश में हुए लगभग तीन हज़ार करोड़ के मनरेगा महा घोटाले की जांच सीबीआई पिछले लगभग 4 महीनो से कर रही है। इसमें कई सफेदपोशो के नाम भी जाँच टीम के सामने आए हैं जिनमें पीसीएफ के चेयरमैन, एमएलसी और जनसंदेश टीवी चैनल के मालिक रामचंद्र प्रधान पर तो सीधे […]
Facebook
%d bloggers like this: