ओह देवसाहब! आप लौट आइए…

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-आशीष तिवारी।।

जीवन का सबसे बड़ा सच यही है कि मौत शाश्वत है। हम हमेशा इस सच से भागने की कोशिश भी करते हैं लेकिन कभी भाग नहीं पाते हैं। हिंदी फिल्मों के सदाबहार नायक देवआनंद साहब भी अब हमारे बीच नहीं हैं। दिल का दौरा पड़ने से उनकी मृत्यु हो गई। यह वही दिल है जिसने उन्हें 88 साल की उम्र में भी जवां बना कर रखा था। आखिरकार उसी दिल ने उन्हें हमसे छीन लिया।

देवआनंद साहब अपने आप में एक किवदंती बन चुके थे। जिस उम्र में आम लोग भगवान के भजन में लग जाते हैं उस उम्र में नई फिल्मों की तैयारी में लगे थे। जिस जीवटता की बात हम किताबों में पढ़ा करते हैं उसकी मिसाल थे देवसाहब। मेरे जैसे करोड़ों लोग हैं जो कभी उनसे नहीं मिले लेकिन उनकी फिल्मों ने ऐसा खिंचाव था कि सभी अपने को देव आनंद के साथ जोड़ लेते थे।

छह दशक तक हिंदी फिल्म जगत में अपनी अलग पहचान रखने वाले देव आनंद ने कई फिल्मों में काम किया। उन्होंने कभी भी फिल्मों के सेल्समैन के रूप में नायक का रोल नहीं अदा किया। उन्हें कभी इस बात की चिंता नहीं रही कि उनकी फिल्म बाक्स ऑफिस पर चलेगी या पिट जायेगी। यही वजह थी कि उन्होंने ‘गाइड’ फिल्म बनाई। आरके लक्ष्मण के उपन्यास पर आधारित इस फिल्म में तत्कालीन रूढ़ीवादी समाज की बेडि़यों को तरजीह न देते हुये एक शादीशुदा भारतीय महिला का बिना शादी किए एक पराए व्यक्ति के साथ रहना दिखाया गया था। फिल्म के अंत में नायक की मौत भी हो जाती है। इस फिल्म का प्लॉट ऐसा था कि कोई भी डिस्ट्रीब्यूटर खरीदने में डर रहा था। लेकिन यह फिल्म जब चली तो चलती ही गई। गाइड में बेहतरीन अदाकारी के लिए देवआनंद साहब को फिल्म फेयर अवार्ड मिला। फिल्म को पांच कैटेगरीज में फिल्म फेयर अवार्ड के लिए चुना गया। आस्कर के लिए भी गाइड को भेजा गया। यही है देवसाहब का आकर्षण। युवाओं में नशाखोरी की समस्या को लेकर देवसाहब ने हरे रामा, रे कृष्णा बनाई तो प्रवासी भारतीयों की समस्या को देश-परदेस में दिखाया।

पिछले छह दशक से देव साहब नवकेतन के बैनर तले फिल्में बनाते रहे। इतने लम्बे समय सक्रिय रहना साधारण बात नहीं। नवकेतन के बैनर तले बनी कई फिल्में फ्लॉप हो गयीं लेकिन देवसाहब कभी रुके नहीं। 1950 में फिल्म ‘अफसर’ से शुरु हुआ सिलसिला 2011 में चार्जशीट तक चलता रहा। बाजी, आंधियां, हमसफर, टैक्सी डाइवर, हाउस नं. 44, फंटूश, काला पानी, काला बाजार, हमदोनों, तेरे घर के सामने, ज्वेलथीफ, प्रेमपुजारी, शरीफ बदमाश, हीरा-पन्ना जैसी फिल्में नवकेतन और देवसाहब ने हमें दी हैं। देवसाहब ने कई चेहरों को भी हिंदी फिल्म जगत में पहचान दिलाई। इनमें गुरुदत्त, जयदेव, राज खोसला, जानी वाकर, किशोर कुमार, यश जौहर, सुधीर लुधायनवी, शत्रुघ्न सिंहा, जैकी श्राफ, तब्बू, उदित नारायण और अभिजीत के नाम शामिल हैं। जाने फिल्म निर्माता निर्देशक शेखर कपूर देव साहब की बहन के लड़के हैं और फिल्म निर्माण का ककहरा उन्होंने अपने मामा देवसाहब से ही सीखा है।

देव साहब न सिर्फ फिल्मों में नायक का किरदार अदा करते थे बल्कि वास्तविक दुनिया के लिए भी एक नायक थे। इसका उदाहरण है इमरजेंसी का विरोध। इंदिरा गांधी द्वारा घोषित आपातकाल का देवसाहब ने पुरजोर विरोध किया था। जबकि फिल्म जगत के और किसी ने हिम्मत नहीं दिखाई। देवसाहब का रोमांच यही था कि हमारे दादा और पिता भी हमेशा देवसाहब की तरह युवा दिखना चाहते थे तो आज का युवा भी देवसाहब की तरह दिखने से गुरेज नहीं करता। देव साहब कहते थे, ‘कि मैं यह नहीं सोचता कि मैं जवान था बल्कि यह सोचता हूं कि मैं आज भी जवान हूं।’ देव साहब का यह कहना उनके करोड़ों चाहने वालों के लिए सू़त्र वाक्य है लेकिन आज यही वाक्य बेहद चुभ भी रहा है क्योंकि वक्त ने भरी जवानी में देव साहब को मौत की नींद सुला दी।

ओह देवसाहब! आप लौट आइए…

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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