पहले पिटवाया, फिर कहा कोड ऑफ कंडक्ट लागू करो तभी होगी पत्रकारों की पहचान

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पुलिस की कभी भी यह मंशा नहीं रहती कि वह मीडियाकर्मियों को निशाना बनाए। ऐसी घटनाएं तभी होती हैं जब मीडियाकर्मी हिंसक प्रदर्शनकारियों के बीच रहते हैं… मैं दावे से कह सकता हूं कि पत्थरों से भरा बैग और कैमरे का बैग भी कई बार एक जैसे हो सकते हैं।’

 -उमर अब्दुल्ला

जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने अपने राज्य समेत पूरे देश में मीडियाकर्मियों के लिए एक आचार संहिता अथवा कोड ऑफ कंडक्ट लागू करने का सुझाव दिया है। उमर ने यह सुझाव भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष मार्कण्डेय काटजू के पत्र के जवाब में दिया। काटजू ने अपने पत्र में लिखा था कि अगर सुरक्षाबलों ने मीडियाकर्मियों के साथ मारपीट की अपनी प्रवृत्ति को जारी रखा तो उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

बता दें कि बीते दिनों श्रीनगर के डाउन-टाउन में प्रदर्शनकारियों पर काबू पाने के प्रयास में पुलिसकर्मियों ने चार प्रेस छायाकारों को पीट दिया था। काटजू को लिखे अपने जवाब में उमर ने कहा,”आपकी भावनाओं को मैं अच्छी तरह समझता हूं, लेकिन पुलिस की कभी भी यह मंशा नहीं रहती कि वह मीडियाकर्मियों को निशाना बनाए। ऐसी घटनाएं तभी होती हैं जब मीडियाकर्मी हिंसक प्रदर्शनकारियों के बीच रहते हैं। मुझे भी बीते दिनों श्रीनगर में हुई इस घटना पर अफसोस है, लेकिन हम इससे सबक ले सकते हैं। घटनास्थल से दूर बैठकर हमारे लिए यह कहना बहुत आसान है कि पुलिस मीडियाकर्मियों के कैमरे देखकर पता लगाए कि वह प्रेसकर्मी हैं या प्रदर्शनकारी। लेकिन जब चारों तरफ नारेबाजी चल रही हो, प्रदर्शनकारी पत्थर फेंक रहे हों, आंसूगैस का इस्तेमाल किया जा रहा हो तब पुलिस द्वारा उनकी पहचान करना लगभग असंभव हो जाता है। मैं दावे से कह सकता हूं कि पत्थरों से भरा बैग और कैमरे का बैग भी कई बार एक जैसे हो सकते हैं।”

उमर ने कहा कि बहुत से मुल्कों में मीडिया के लिए एक आचार संहिता है। विशेषकर जन आंदोलनों व हिंसक प्रदर्शनों की कवरेज के लिए, लेकिन हमारे देश में ऐसा कोई कानून नहीं है। शायद अब समय आ गया है कि प्रेस परिषद राज्यों और मीडिया जगत के साथ विचार-विमर्श कर कोई आचार संहिता बनाए। मेरा सुझाव है कि जो भी पत्रकार प्रदर्शनकारियों की भीड़ में जाकर अपने लिए बेहतर तस्वीर जुटाना चाहते हैं वे कोई चमकीली जैकेट या बिब्स पहने, जिनके आधार पर वे दूर से ही पहचाने जा सकें। उमर ने कहा कि मैं मीडिया के कोड ऑफ कंडक्ट को तय करने में सहयोग के लिए हमेशा तैयार हूं। मैं आपको जम्मू-कश्मीर में सक्रिय सुरक्षाबलों की तरफ से यकीन दिलाता हूं कि हम ऐसे किसी भी कोड का पूरी इमानदारी से पालन करेंगे।

क्या था काटजू के पत्र में?

भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष मार्कण्डेय काटजू ने अपने पत्र में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को लिखा था कि पुलिस का यह तर्क उचित नहीं कि वह पथराव कर रही भीड़ और मीडियाकर्मियों में फर्क नहीं कर सकी। उन्होंने लिखा था कि मीडियाकर्मियों के पास कैमरे थे, उन्होंने अपनी पहचान भी बताई। इसके बावजूद उन पर लाठियां बरसीं। उन्होंने पत्र में लिखा, ”मैं केंद्रीय सचिव, केंद्रीय गृहसचिव, देश के सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों, मुख्यसचिवों और गृहसचिवों को यह स्पष्ट करने जा रहा हूं कि पत्रकारों के प्रति पुलिस और केंद्रीय बलों के हिंसक रवैये को सहन नहीं किया जा सकता। प्रेस परिषद के संविधान के अनुच्छेद 13 के तहत प्रेस परिषद का कर्तव्य है कि वह प्रेस की स्वतंत्रता की सुरक्षा करे। कोई भी पत्रकार जब कवरेज पर जाता है तो वह सिर्फ अपना काम कर रहा होता है। उसे भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(1) (क) के तहत प्रेस की स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार प्राप्त है। इसलिए पुलिस व अर्धसैनिकबलों को चाहिए कि वह पत्रकारों के साथ मारपीट न करें, अन्यथा प्रेस परिषद उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई करेगी।”

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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