यह सिर्फ देह का मामला नहीं है, इसका संबंध तो सत्ता के नशे से है – प्रीतीश नंदी

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राजनीति हमारे जीवन से अलग-थलग कोई चीज नहीं है, इसलिए यह जाहिर ही है कि जो चीजें हमारे जीवन का एक अहम आयाम हैं, वे राजनीति की दुनिया का भी अहम आयाम हों। राजनेताओं से जुड़े सेक्स स्कैंडल्स को भी हमें इसी तरह देखना चाहिए। यह जरूर है कि आजकल ऐसे स्कैंडल्स की तादाद बढ़ी है और वे ज्यादा खुलकर सामने आ रहे हैं। इटली के सिल्वियो बर्लुस्कोनी इसकी एक मिसाल हैं। कुछ मामले ऐसे भी होते हैं, जिनकी वास्तविकता कभी पूरी तरह खुलकर सामने नहीं आ पाती, जैसा नारायणदत्त तिवारी के मामले में हुआ। लेकिन चाहे जो हो, ये स्कैंडल अन्य चीजों के साथ ही हमारे पाखंड को भी उजागर करते हैं।

सवाल यह है कि आखिर हम अपने नेताओं से संत-महात्मा होने की अपेक्षा क्यों करते हैं? क्या राजनेता किसी किस्म की धार्मिक परंपरा का प्रतिनिधित्व करते हैं? हम राजनेताओं को जनप्रतिनिधि कहते हैं। यदि वे देश की जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं तो वे जनता के गुण-दोषों का भी प्रतिनिधित्व क्यों नहीं कर सकते?

सच्चाई यह है कि इस तरह के स्कैंडल आज हर वर्ग और समुदाय में आम होते जा रहे हैं और जाहिर है कि राजनीतिक वर्ग भी इससे अछूता नहीं रह गया है। कोई भी ठीक-ठीक तरह से यह नहीं बता सकता कि यह स्थिति कैसे निर्मित हुई। कुछ लोग इसके लिए लोकप्रिय संस्कृति को दोष देते हैं।

कुछ यह कहते हैं कि हमारी लोकप्रिय संस्कृति हमारा आईना भर होती है। वह केवल वही दिखाती है, जो हम करते हैं। ऐसे में यह अपेक्षा करना तो अनुचित ही होगा कि हमारे राजनेता हमसे भिन्न हों। वास्तव में यदि वे हमसे भिन्न होंगे तो यह और भी बुरी स्थिति होगी, क्योंकि तब वे और अमानवीय होंगे। वे धन और सत्ता के प्रति लोभ की प्रतिमूर्ति के सिवा कुछ न होंगे।

लिहाजा वास्तविक मसला सेक्स स्कैंडल या उसके कारण नेताओं की छवि पर लगने वाला बट्टा नहीं है। वास्तविक मसला कुछ और है। अधिक चिंता की बात यह है कि इस तरह के स्कैंडल आखिर हमें कहां ले जा रहे हैं? वे किस चीज की ओर इशारा करते हैं? इस तरह के मामले दो वयस्कों के बीच आपसी सहमति से निर्मित होने वाले संबंधों की तरह नहीं होते, जैसा कि सभी वैध-अवैध संबंधों में होता है। वास्तव में इस तरह के मामलों का नाता हिंसा, अपराध और भ्रष्ट आचरण की एक अंधेरी सुरंग से होता है, जिसकी बर्बरता के समक्ष उसके अन्य पक्ष महत्वहीन मालूम होने लगते हैं।

हाल ही भंवरी देवी के अपहरण और संभावित हत्या के मामले ने खासी सुर्खियां बटोरी हैं। एक छोटे-से कस्बे की इस नर्स के एक मंत्री से संबंधों की खबर सामने आने के बाद इतनी खलबली मची कि राजस्थान के मुख्यमंत्री को अपनी पूरी कैबिनेट भंग कर उसे पुनर्गठित करना पड़ा था। गहलोत सरकार यूं भी अपनी दक्षता के लिए प्रसिद्ध नहीं थी। अलबत्ता मौजूदा मामले के संदर्भ में यह नौबत भ्रष्टाचार या अकुशलता के कारण नहीं आई। यह नौबत आई है फरेब, दुराचार, अपहरण और संभावित हत्या के एक केस के कारण। भंवरी देवी का अब भी कोई अता-पता नहीं है और उसे आखिरी बार तब देखा गया था, जब भाड़े के कुछ गुंडों द्वारा उसे अपहृत कर लिया गया था।

वास्तव में सवाल केवल भंवरी देवी का ही नहीं है। अखबारों में रोज इस तरह की खबरें पढ़ी जा सकती हैं। चेहरे पर तेजाब फेंक देना, धारदार हथियारों से हमला कर देना, अपहरण, नृशंस हिंसा, खाप पंचायतों द्वारा अभिप्रेरित हत्याएं।।। यह भयावह कहानियों की एक लंबी शृंखला है, जिसमें हर नई कहानी पहले से बदतर होती चली जाती है। इसके मूल में एक ही बात है: यौन वर्चस्व और सत्ता की भूख।

सबसे विचलित करने वाली बात यह है कि अब यौन आचरण को भी प्रताडऩा का एक उपकरण बना लिया गया है। यह ताकतवर या ताकत की चाह रखने वाले लोगों के लिए एक और ऐसा तरीका है, जिसका इस्तेमाल कर वे महिलाओं को प्रताडि़त कर सकते हैं और उन पर अपना दबदबा कायम रख सकते हैं। लिहाजा कॉलेज के बाहर जींस पहनने वाली लड़कियों पर हमला किया जाता है। बार में ड्रिंक कर रही लड़कियों के साथ हिंसक वारदातें होती हैं। जब उनके पुरुष मित्र इसका विरोध करने का प्रयास करते हैं, तो उनकी हत्या कर दी जाती है।

मुंबई को आज भी उन दो युवाओं की नृशंस हत्या याद है, जो अपनी महिला मित्रों को स्थानीय गुंडों के एक समूह से बचाने का प्रयास कर रहे थे। एक और घटना वह है, जिसमें एक पुलिसकर्मी ने मरीन ड्राइव पर अपनी क्लासमेट्स के साथ बैठी एक लड़की को उठवा लिया और पुलिस चौकी में दिनदहाड़े उससे ज्यादती की।

इन घटनाओं का नाता केवल यौन आचरण से ही नहीं है। इनका नाता सत्ता की लिप्सा से भी है। यौन आचरण तो महज एक बहाना है। सत्ता की अदम्य लालसा इस तरह की जघन्य और हिंसक घटनाओं का कारण बनती है। इससे यह भी पता चलता है कि पौरुष की हमारी धारणाएं कितनी विकृत हो चली हैं। असहाय महिलाओं पर आक्रमण करने से आखिर किस तरह के पौरुष की पुष्टि हो सकती है? या उन बचकाने नियम-कायदों के बारे में क्या कहा जाए, जो यह निर्धारित करते हैं कि महिलाएं रात नौ बजे के बाद बार में काम नहीं कर सकतीं?

जैसे-जैसे राजनीति में महिलाओं के ज्यादा से ज्यादा प्रतिनिधित्व की मांग बढ़ती जा रही है, वैसे-वैसे हिंसा की इस तरह की वारदातों में भी इजाफा होता जा रहा है। अब तो वर्चुअल वर्ल्ड में भी इस तरह की घटनाएं देखी जा सकती हैं। इंटरनेट पर महिलाओं को भांति-भांति से प्रताडि़त और परेशान किया जाता है।

इसके लिए केवल यौन आचरण को दोषी ठहराया जाना उचित नहीं है। वास्तव में हमें उस प्रवृत्ति की पड़ताल करनी चाहिए, जिसके कारण पुरुष महिलाओं को अपने लिए एक ‘ईजी गेम’ समझते हैं। और जब महिलाएं उनके मंसूबों को पूरा नहीं करतीं तो वे उन्हें सबक सिखाने की कोशिश करते हैं। इस प्रवृत्ति का सीधा-सीधा संबंध सत्ता से है और राजनीति का अर्थ ही होता है सत्ता का दुरुपयोग।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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