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पत्रकार हत्याकांड की रिपोर्टिंग में भी पुलिस ने पत्रकारों का इस्तेमाल कर ही लिया

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11 जून को पवई में हत्यारों की गोली का निशाना बने मिड डे के पत्रकार ज्योतिर्मय डे हत्याकांड में मुंबई पुलिस ने एक अन्य पत्रकार जिग्ना वोरा को गिरफ्तार किया है। जिग्ना एशियन एज की डिप्टी ब्यूरो चीफ हैं और जे डे की पुरानी परिचित हैं। पुलिस के मुताबिक आईबी लंबे समय से जे डे और जिग्ना वोरा पर भी नजर रखे हुए थी। अपनी रूटीन ट्रैकिंग में आईबी अंडरवर्ल्ड पर नजर रखने के लिए जिन पत्रकारों को ट्रैक कर रही थी उसमें जिग्ना वोरा भी थीं।

जे डे हत्याकांड में जिग्ना की गिरफ्तारी पत्रकारिता के इतिहास में बड़ी घटना है। क्या ऐसा हो सकता है कि पत्रकारी प्रतिद्वंदिता इस हद तक बढ़ जाए कि हत्याकांड को अंजाम दिलवाने तक सूचनाएं देने लगें सचमुच चौंकानेवाला है? यह इस बात का भी प्रमाण है कि अपराधी अब पत्रकारों को अपने काम को अंजाम देने के लिए इस्तेमाल करने लगे हैं। पुलिस यह फैलाने में जुटी है कि जे डे क्राइम की जो खबरें लिखते थे उसकी सूचना छोटा राजन तक जिग्ना वोरा ही पहुंचाती थीं और उसे समझाती थी कि कैसे इस खबर से उसका नुकसान हो सकता है।

डे हत्याकांड में जिगना वोरा की भूमिका के बारे में चर्चा फैलाई गई है कि जिगना ने संभवतः क्राइम रिपोर्टिंग की प्रतिद्वंद्विता में छोटा राजन के लोगों को सूचनाएं दे दी होंगी और मर्डर के लिए भड़काया होगा, लेकिन मुंबई के पत्रकार इससे इत्तेफाक नहीं रखते। उनका मानना है कि जिगना की क्राइम रिपोर्टिंग की प्रतिद्वंद्विता जेडे से जरूर रही होगी, लेकिन कोई भी पत्रकार किसी दूसरे पत्रकार की हत्या कतई नहीं कराना चाहता।

उधर पुलिस की मानें तो खुफिया विभाग ने पाया था कि जिग्ना वोरा छोटा राजन के संपर्क में रहती है। ऐसी खबरें भी उड़ाई जा रही हैं कि जे डे हत्याकांड में छोटा राजन गिरोह हो सकता है लेकिन हैरानी की बात यह है कि छोटा राजन ने डे को क्यों निशाना बनाया इस गुत्थी को अभी भी नहीं सुलझाया जा सका है। जबसे आईबी से डेपुटेशन पर मुंबई पुलिस में स्पेशल कमिश्नर (क्राइम) बनकर आए देवेन भारती ने अपनी पूर्व की सूचनाओं के आधार पर जिग्ना वोरा को ट्रैक करना शुरू किया और बहुत जल्द यह सच्चाई सामने आ गई कि जे डे के बाइक का नंबर जिग्ना वोरा ने ही छोटा राजन गिरोह तक पहुंचाया था। देवेन भारती आईबी के कड़क अफसरों में रहें हैं इसलिए उन्होंने इस हत्याकांड की जांच में कोई कोताही नहीं की और हत्याकांड की पहली मुख्य कड़ी जिग्ना वोरा तक पहुंच बना ली। फिलहाल जिग्ना वोरा को मकोका के तहत रिमांड पर लिया गया है।

क्राइम रिपोर्टिंग में ऐसा अक्सर होता है कि जो शख्स किसी पत्रकार का मुखबिर होता है वही अंडरवर्ल्ड का भी मुखबिर होता है और पुलिस का भी कई बार सोर्स बन जाया करता है। क्राइम रिपोर्टर ऐसे सोर्सेज से संबंध बनाकर रखते हैं क्योंकि कई बार अंदरखाने की बहुत बड़ी सूचनाएं मिल जाया करती हैं। इसी क्रम में जिगना वोरा का जिस सूत्र से संबंध था उसने जेडे के बारे में जिगना से पूछ लिया। यह सूत्र छोटा राजन से जुड़ा था। उसने जिगना से ऐसे पूछा कि उसे यह कतई भान न हो सके कि आखिर किस मकसद से ये जानकारियां ली जा रही हैं।

उदाहरण के तौर पर उस सूत्र ने जिगना से पूछा होगा कि वो जो क्राइम रिपोर्टर जेडे है, वो तो बहुत महंगी कार से चलता होगा. तब जिगना ने कहा होगा कि नहीं, वो बाइक से चलता है. फिर उस सोर्स ने पूछा होगा कि अगर जेडे से मिलना होगा किसी को तो उसे कैसे पहचाना जा सकेगा, क्या उसकी गाड़ी का नंबर पता है? तब जिगना ने गाड़ी का नंबर पता करके बता दिया होगा। मुंबई के पत्रकारों का कहना है कि जिगना को यह कतई पता नहीं था कि उससे जो घुमा फिराकर सूचनाएं ली जा रही हैं उसका इस्तेमाल ये लोग किस मकसद के लिए करने जा रहे हैं।

बताया जाता है कि जब क्राइम ब्रांच ने पहली बार वोरा से छोटा राजन के बारे में पूछा तो उसने बताया कि वह छोटा राजन से न कभी मिली है और न ही कभी बात की है। लेकिन बाद में वोरा ने स्वीकार किया की उसने काम के सिलसिले में एकबार छोटा राजन से बात की थी। साथ ही यह भी बताया की उसकी बातचीत जैदी के उपस्थिति में मोबाइल के स्पीकर पर हुई थी। जब पुलिस ने जैदी से इस बारे में पूछने पर जैदी ने बताया कि वोरा ने उसे बस यह जानकारी दी थी कि उसने छोटा राजन से बात की है। लेकिन इस बात से इनकार किया कि मोबाइल के स्पीकर पर उसके सामने बात हुई थी।

पुलिस सूत्रों ने जिगना के कॉल डिटेल्स का हवाला देकर बताया है कि जिगना डे की हत्या के दौरान छोटा राजन से 7 से 8 बार बातचीत हुई थी। इसी आधार पर जिगना को पुलिस ने शुक्रवार को गिरफ्तार किया। हालांकि अदालत में इस बारे में कोई सुबूत नहीं दिए गए हैं। पुलिस ने यह भी फैलाने की कोशिश की है कि जिग्ना से जे डे की अनबन छोटा राजन के एक गुर्गे फरीद तानशा के कारण हुई थी। तानशा की 2010 में हत्या हो चुकी है। बताया जाता है कि जिग्ना अक्सर खबरों के सिलसिले में तानशा के पास जाती थी। जेडे भी तानशा से मिलते रहते थे जो जिगना को नागवार लगता था।

बहरहाल हकीकत क्या है यह तो अदालत के फैसले के बाद ही साबित हो पाएगा, लेकिन इतना जरूर है कि पत्रकार चाहे सहमत हों या असहमत पुलिस उनसे अपनी बात लिखवाने में कामयाब हो चुकी है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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