न्यूज़ चैनल खोलने का दावा किया था, चिटफंडिए भाग गए बैंकाक

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मल्टीलेवल मार्केटिंग के माध्यम से रुपए निवेश कराकर तीन साल में धन दस गुना देने का दावा करने वाली गोल्ड सुख कंपनी के ऑफिस पर मंगलवार को ताला नजर आया। कंपनी की वेबसाइट सस्पेंड है और डायरेक्टरों के फोन बंद।

नाराज निवेशकों ने सिविल लाइंस फाटक के समीप स्थित ऑफिस पर हंगामा खड़ा कर दिया। सिक्योरिटी गार्ड ने बंदूक तानी तो निवेशकों ने उसकी भी जमकर पिटाई कर दी। बाद में, सूचना पर पहुंची विधायकपुरी पुलिस ने गुस्साए लोगों को वहां से हटाया।

दरअसल कंपनी के निदेशक करीब एक महीने पहले ही लापता हो चुके थे। गोल्ड सुख के चार संचालक नरेन्द्र सिंह, मानवेन्द्र सिंह, महेन्द्र सिंह व प्रमोद शर्मा थे। मुख्य प्रबंधक कौशलेन्द्र सिंह था। अभियुक्तों ने 12 दिसम्बर 2008 को कम्पनी का रजिस्टे्रशन करवाने के बाद चार स्कीमों के जरिए लोगों को फंसाना शुरू किया था।

उसके मुताबिक ज्यादातर कंपनियां एजेंटों के माध्यम से चल रही हैं और सीधे तौर पर आरोपी बनने से बच जाती हैं। इसके बाद केंद्र के कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय और रिजर्व बैंक ने एमएलएम फर्मो को रेगुलेट करने के लिए नए नियम बनाने के लिए कमर कसी है।

इस कंपनी के एक इन्वेस्टर के मुताबिक कंपनी के कई शहरों में तकरीबन 2 लाख सदस्य हैं जिन्होंने कम से कम 6000 रुपए तो इन्वेस्ट किए ही होंगे। यानी यही रकम तकरीबन 120 करोड़ बैठती है जबकि कई लोगों ने तो लाखों रुपए लगा रखे हैं।

एक निवेशक ने बताया कि उन्होंने किसी परिचित की बातों में आकर कंपनी में दो माह पहले 22 हजार 9 सौ रुपए जमा कराए थे। तब उन्हें तीन वर्ष बाद कंपनी की ग्रोथ बढ़ने पर 26 लाख रुपए देने का दावा किया था, लेकिन उन्हें इन दो माह में ग्रोथ का एक रुपया भी नहीं मिला। दूसरे निवेशक ने बताया कि उन्होंने दोस्त के कहने पर करीब एक वर्ष पहले कंपनी में 22 हजार 9 सौ रुपए जमा कराए थे। उन्हें भी तीन वर्ष बाद 26 लाख रु. देने का वादा किया था।

कई देशों में तो मल्टीलेवल मार्केटिंग या पिरामिड मार्केटिंग प्रतिबंधित है, लेकिन भारत के हर शहर में हजारों की तादाद में ये कंपनियां मौजूद हैं। देश में इस प्रकार की ठगी के नियंत्रण के लिए कोई ठोस कानून नहीं है हालांकि केंद्र के सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टिगेशन ऑफिस (एसएफआईओ) ने देश में एमएलएम कंपनियों का एक मूल्यांकन कॉर्पोरेट अफेयर्स मंत्रालय को दिया है।

अभी कुछ महीनों पहले पकड़ में आए स्पीक एशिया कंपनी के फ्रॉड के पर्दाफाश के बावजूद सरकार और निवेशकों ने कोई सबक नहीं लिया। यह तकरीबन 2400 करोड़ की ठगी थी, जिसने निवेशकों को कुल 30 हजार करोड़ के फायदे के सपने दिखाए थे। निवेशकों का कहना था कि कंपनी संचालक का रसूखदारों से सम्पर्क था और कंपनी कार्यक्रमों में वह आते भी थे। रसूखदारों की कार्यालय में फोटो भी लगी हुई है। इन्हीं रसूखदारों को फोटो व कार्यक्रमों में आता देख निवेशकों ने कंपनी पर विश्वास किया। जयपुर के सांसद महेश जोशी, पुलिस कमिश्नर बी.एल. सोनी, महापौर ज्योति खण्डेलवाल, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता बीडी कल्ला, कम्पनी की तरफ से आयोजित रक्तदान शिविर में मुख्य अतिथि बनकर आए थे। विधायक प्रताप सिंह खाचरियावास ने कम्पनी के शोरूम का उद्घाटन किया था।

निवेशकों के मुताबिक कम्पनी के राजस्थान के अलावा जम्मू-कश्मीर, यूपी, हरियाणा, दिल्ली, महाराष्ट्र, पंजाब, असम, गुजरात, छत्तीसगढ़ में कार्यालय खोले। इसके अलावा कम्पनी के कोटा, बारां, अजमेर, सीकर, हनुमानगढ़ आदि जिलों में भी ब्रांच खोल रखी थी। कंपनी ने एक अखबार भी चला रखा था और एक न्यूज़ चैनल खोलने की घोषणा भी की थी।
पिछले साल दो निवेशकों ने जयपुर में कंपनी के खिलाफ एफआईआऱ भी लिखवाई थी, लेकिन पुलिस ने छानबीन कर कोई अपराध न होने की रिपोर्ट लगा दी। नवंबर 2010 में इन्कम टैक्स डिपार्टमेंट की इन्वेस्टिगेशन विंग ने गोल्ड सुख के जयपुर में 5 ठिकानों पर छापा मारा था जिसमें कंपनी ने 23.35 करोड़ की अघोषित आय विभाग को सरेंडर की थी। इसके अलावा अजमेर, आगरा, अहमदाबाद, चंडीगढ़ और सीकर में भी कई जगहों पर सर्च ऑपरेशन किए गए थे।

पुलिस में रिपोर्ट नहीं की पीड़ित व आरोपी नेविधायकपुरी थानाप्रभारी चंद्र पुरोहित का कहना है कि यदि किसी व्यक्ति के साथ ठगी हुई है, तो वे शिकायत करने पर मुकदमा दर्ज कर लेंगे। लेकिन, अभी तक किसी पीड़ित ने पुलिस से संपर्क कर शिकायत नहीं दी है। यहां तक मारपीट के शिकार सुरक्षा गार्ड की ओर से शिकायत दर्ज नहीं हुई है। मामले का पता चलने पर पुलिस ने मौके पर लोगों को शांत कराकर मुकदमा दर्ज कराने को कहा था, लेकिन कोई सामने नहीं आया।

सितंबर 2009 में रिजर्व बैंक ने एक सर्कुलर जारी कर बैंकों को चेताया था कि अगर किसी प्रकार की मल्टीलेवल मार्केटिंग कंपनियां जो बहुत बड़े रिटर्न का दावा कर रही हैं, उनके खातों का तुरंत रिव्यू किया जाए। वक्त-वक्त पर बैंकों को ऐसा करते रहना चाहिए। इसके अलावा रिजर्व बैंक ने बैंकों को अपनी आंतरिक पॉलिसी को सख्त करने व फ्रॉड रिस्क मैनेजमेंट और फ्रॉड इन्वेस्टिगेशन फंक्शन को मजबूत करने की सलाह दी थी। लेकिन बीते दो सालों में प्रदेश और अन्य राज्यों में ऐसे मामले बढ़ते जा रहे हैं।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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