महसा अमीनी कुर्द मूल की लड़की थी..

-राज ढल्ल।।


कुर्द एक मुस्लिम समुदाय है। इसकी अपनी अलग सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान है। कुर्द मूल के लोग आम मुस्लिमों के मुकाबले ज्यादा खुले विचारों के हैं। कुर्द महिलाएं भी सरकारी दमन के खिलाफ हथियार उठाती रही हैं।

कुर्दिस्तान देश के तीन प्रांतों का हिस्सा है- कुर्दिस्तान, केरमनशाह और पश्चिमी अजरबैजान प्रांत।
इसकी सीमाएं तुर्की और इराक के कुछ हिस्से से लगी हैं। ईरान में दूसरे विश्व युद्ध के बाद 1946 में कुर्द रिपब्लिक ऑफ महाबाद भी बनाया गया था। ये सिर्फ एक साल तक अस्तित्व में रहा और कुर्द आबादी अपने लिए अलग राष्ट्र नहीं बना पाई।

कुर्दो को सद्दाम हुसैन ने भी पूरी तरह से मारने की कोशिश की अपने रासायनिक हथियारों से..
तुर्की भी समय समय पर सैनिक कार्यवाही करता रहा है.. लेकिन सबसे ज्यादा खतरनाक लड़ाई कुर्दो की कट्टर इस्लामी आतंकी संगठन ISIS के साथ हुई ..!!

इस लड़ाई में कुर्द महिलाओं ने बढ़चढकर हिस्सा लिया और ISIS को हराने में प्रमुख भूमिका निभाई..

जब एक ओर जहां कट्टर आतंकी संगठन आईएसआईएस का पूरी दुनिया में खौफ व्याप्त था, वहीं इस संगठन के दुर्दांत आतंकी हाथ में मेंहदी और नेल पॉलिस लगी कुछ सुंदर महिलाओं के सामने आनेे से भी घबराते थे.. ये महिलाएं कोई ओर नहीं बल्कि पेशमरगा फौज की लड़ाका है..

इनके हाथों में मेहंदी, नेल पॉलिश, आंखों में काजल व होठों पर लिपिस्टिक लगी हो लेकिन सेना की वर्दी में तैनात इन महिलाओं के हाथ में आधुनिक हथियार रहते हैं। इन महिलाओं के सामने आतंकवादी आने से कतराते हैं।

दरअसल, ये आतंकी इनके हाथों नहीं मरना चाहते। उन्हें लगता है कि महिला के हाथ से मारे गए, तो जन्नत नसीब नहीं होगी। जिहाद की राह पर निकले इन आतंकियों का मानना है कि महिलाओं के हाथों मरकर दौजख की आग का सामना करना पड़ेगा।

कुर्द महिला लड़ाकों की पुरानी परंपरा रही है..पिछले 100 सालों का रिकॉर्ड देखें तो कुर्द समाज में महिला लड़ाकों की पुरानी परंपरा है..
कुर्दों ने ओटोमन साम्राज्य से लड़ाई की, ब्रिटेन से लड़े. सद्दाम हुसैन के दौर में बाथिस्ट सत्ता से जंग की और फिर आईएस से जंग की…

बता दें कि इराक में जब सद्दाम हुसैन का दौरान था उस समय सद्दाम की ओर से कुर्दों के खिलाफ नरसंहार अभियान शुरू किया गया था…
गांव के गांव जला दिए गए थे, शहर उजाड़ वीरान कर लिए गए, लोगों को उनके घरों से खदेड़ दिया गया। इस दौर में लगभग पौने दो लाख से ज्यादा कुर्दों ने जान गंवाई। उस समय ये कुर्द औरतें अपने पतियों और भाइयों का साथ देती थीं।

इन महिला लड़ाकों को झिनी शाख कहा जाता है..
ये गुरिल्ला वॉर छापामार युद्ध, घात लगाकर हमला करने और फिर गायब हो जाने में पूरी पारंगत हैं। आजादी हासिल करने की उस लड़ाई में इन महिला जांबाजों ने अपने मर्दों का खूब साथ दिया।

महिलाओं के इस योगदान के लिए कुर्द लोगों को अपनी औरतों का गर्व है। इन महिलाओं में सब औरतों में एक बात कॉमन है..
इन सबको ISIS से बहुत चिढ़ थी। इस चिढ़ का सबसे बड़ा कारण यह था कि आईएस से जुड़े लोगों के लिए महिलाएं केवल सेक्स और गुलामी की चीज थी..कुर्द महिलाओं को यह मंजूर नहीं था

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