नफरती कारोबार  रोकने के प्रयास

देश में नफरत फैलाने की सतत कोशिशों के कारण जो दरार समाज में दिखने लगी है, उसे भरने के लिए और भारत को नए सिरे से एकता के सूत्र में बांधने का इरादा लेकर कांग्रेस सांसद राहुल गांधी इस वक्त भारत जोड़ो यात्रा निकाल रहे हैं। फिलहाल यात्रा केरल में है और इसे जिस तरह का जनसमर्थन मिल रहा है, उससे पता चलता है कि देश के युवा, बूढ़े, बच्चे सभी भारत को मजबूती से जोड़ने के विचार से उत्साहित हैं।

मुख्यधारा के मीडिया में इस यात्रा के बारे में जानकारियां तो दी जा रही हैं, लेकिन उसके साथ कांग्रेस के भीतर चल रही खटपट, या कांग्रेस कहां कमजोर पड़ रही है, ऐसी खबरें अधिक प्रमुखता से दिखाई जा रही हैं। भारत जोड़ो यात्रा में भले रोजाना हजारों लोग स्वत:स्फूर्त तरीके से जुड़ रहे हों, लेकिन बड़े-बड़े समाचार प्रस्तोताओं यानी एंकर्स के लिए उनके बारे में बात करना जरूरी न समझ कर चीतों की बात करना उचित समझ रहे हैं। यहां पसंद अपनी-अपनी, ख्याल अपना-अपना वाला सिद्धांत लागू नहीं होता है, बल्कि सवाल प्राथमिकता का है। अगर भाजपा के छोटे से छोटे अभियान को दिन-रात को दिखाया जा सकता है, तो फिर कांग्रेस के नेतृत्व में निकल रहे एक जरूरी अभियान को उपेक्षित क्यों किया जा रहा है।

जाहिर है मुख्यधारा के मीडिया का एजेंडा यह है कि किसी भी तरह कांग्रेस को भाजपा के मुकाबले कमतर साबित करके बताया जाए। कांग्रेस के मीडिया विभाग के प्रभारी पवन खेड़ा ने इस यात्रा के बारे में चर्चा के दौरान पहली टिप्पणी यही की कि टीवी पर जो भारत दिखाया जाता है औऱ जिस तरह के मुद्दों पर बहसें की जाती हैं, वह असली भारत नहीं है, ये 15 दिन की यात्रा में समझ आ गया है। श्री खेड़ा के इस बयान से पता चलता है कि देश की असलियत से चैनलों के जरिए परिचित नहीं हुआ जा सकता, क्योंकि वहां सब कुछ प्रायोजित है, ब्रेकिंग न्यूज से लेकर परिचर्चाओं तक।

खबरों के इस प्रायोजित चलन से पत्रकारिता का नुकसान तो हुआ ही है, देश के ताने-बाने को भी गहरी चोट मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने हालिया टिप्पणी में पूछा भी है कि हमारा देश किस ओर जा रहा है। गौरतलब है कि न्यायमूर्ति केएम जोसेफ और न्यायमूर्ति हृषिकेश रॉय की पीठ बुधवार को 11 रिट याचिकाओं के एक बैच की सुनवाई कर रही थी, जिसमें हेट स्पीच को नियंत्रित करने के निर्देश देने की मांग की गई है। बैच में सुदर्शन न्यूज टीवी द्वारा प्रसारित ‘यूपीएससी जिहाद’ शो के खिलाफ दायर याचिकाएं, धर्म संसद की बैठकों में दिए गए भाषण, और सोशल मीडिया संदेशों के नियमन की मांग करने वाली याचिकाएं हैं, जो कोविड महामारी को सांप्रदायिक बना रहे थे। इसी दौरान देश की शीर्ष अदालत ने मौखिक सवाल किया कि हमारा देश किस ओर जा रहा है। अदालत ने भारत सरकार से भी सवाल किया है कि ‘जब यह सब हो रहा है तो यह एक मूक गवाह के रूप में क्यों खड़ी है। जस्टिस जोसेफ ने सुझाव दिया कि सरकार को एक ऐसी संस्था बनाने के लिए आगे आना चाहिए जिसका पालन सभी करेंगे। इसके अलावा उन्होंने एंकर की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि जैसे ही आप किसी को हेट स्पीच में जाते हुए देखते हैं, यह एंकर का कर्तव्य है कि वह तुरंत देखें कि वह उस व्यक्ति को आगे कुछ भी कहने के लिए अनुमति ना दे।

सुप्रीम कोर्ट की ओर से नफरती बातों के प्रसार को रोकने के लिए की गई इस पहल से एक दिन पहले ही केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने एशिया-पैसिफिक इंस्टिट्यूट फॉर ब्रॉडकास्टिंग डेवलपमेंट द्वारा आयोजित एआईबीडी जनरल कॉन्फ्रेंस 2022 में कहा था कि मुख्यधारा की मीडिया को सबसे ज्यादा खतरा ऑनलाइन मीडिया से नहीं बल्कि खुद न्यूज़ चैनलों से है। उन्होंने टीवी चैनलों के लिए कहा था कि यदि आप ऐसे मेहमानों को चैनलों पर आमंत्रित करेंगे जो ध्रुवीकरण कर रहे हैं, जो झूठी खबरें फैलाते हैं, और जो जोर-जोर से चिल्लाते हैं, तो इससे आपके चैनल की विश्वसनीयता कम हो जाती है।

अदालत के निर्देश और केन्द्रीय मंत्री की चिंताओं को देखकर उम्मीद बंधती है कि पत्रकारिता के पेशे पर जो कालिख पिछले सात-आठ सालों में गहराई है, वह थोड़ी कम हो सकती है। लेकिन हकीकत ये भी है कि मीडिया के लिए सरोकारों को व्यक्त करने में काफी देरी हो गई है। जैसे छोटे से घाव को नजरंदाज किया जाए, तो वह नासूर बन जाता है, इस वक्त मुख्यधारा के मीडिया का बड़ा वर्ग समाज के लिए ऐसा ही नासूर बन गया है। मंत्री महोदय की चिंता है कि चैनल धु्रवीकरण करने वाले मेहमानों को बुलाएंगे तो उनकी विश्वसनीयता कम होगी और अदालत की चिंता है कि एंकर हेट स्पीच करने वालों को रोकने के लिए तत्पर क्यों नहीं हैं। लेकिन इन दोनों चिंताओं की असली जड़ जहां है, वहां तक क्या सरकार और अदालत की टिप्पणियां पहुंच पाएंगी।

मीडिया मिशन नहीं मुनाफे वाले कारोबार की तरह चलाया जाता है, जिसमें बड़े पैमाने पर कार्पोरेट पूंजी लगी होती है। देश के अधिकतर मीडिया घराने कार्पोरेट के नियंत्रण में हैं और जो नहीं हैं, पूंजी छल-बल से उन पर मालिकाना कब्जे की कोशिश कर रही है। मीडिया के जरिए पूंजी बढ़ाने का चक्र सत्ता की धुरी के बिना आगे नहीं बढ़ सकता। इसलिए इस खेल में सब एक-दूसरे के साथी हैं। अगर सत्ता के लिए नफरत का माहौल मुनासिब है, तो फिर मीडिया घराने इस माहौल को ही बनाने का काम करेंगे। इस काम में कभी-कभी नफरत का अतिरेक भी दिख जाता है, तो सवाल उठते हैं कि अब पत्रकारिता के मूल्य कहां खो गए हैं। लेकिन नफरत कम हो या अधिक, टीवी पर चिल्ला कर फैलाई जाए, या दबी जुबान से झूठ बोलकर या फिर सोशल मीडिया की ट्रोल सेना के जरिए फैलाई जाए, नफरत हर सूरत में समाज के लिए खतरनाक ही होती है।

अच्छा है कि अब इस नफरत को रोकने के लिए अलग-अलग मोर्चों पर कोशिश हो रही है। इससे समाज का बचा-खुचा हिस्सा टूटने से बच जाएगा।

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