उम्र हो गई लेकिन गहलोत की नाजायज हसरतों का ऊफान ठंडा नहीं पड़ रहा..

-सुनील कुमार।।

कांग्रेस अध्यक्ष के लिए होने जा रहे चुनाव को लेकर यह चर्चा है कि राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत सोनिया परिवार के पसंदीदा हैं। ऐसा इसलिए भी हो सकता है कि वे उम्रदराज हैं, और एक या दो कार्यकाल के बाद उनकी अधिक महत्वाकांक्षा या उम्र नहीं रह जाएगी, और अगर राहुल गांधी को दुबारा कोई ओहदा देने की नौबत आएगी तो गहलोत कोई जवान रोड़ा नहीं रहेंगे। यह एक अच्छी बात है कि कांग्रेस के भीतर एक औपचारिक चुनाव की औपचारिकता हो रही है, और एक से अधिक लोगों के अध्यक्ष चुनाव में उतरने की चर्चा है। इस मुद्दे पर अभी लिखने को कुछ खास नहीं है, लेकिन चुनाव के सवालों के बीच जब गहलोत से पूछा गया कि अगर वे कांग्रेस अध्यक्ष बनते हैं तो क्या वे ‘एक व्यक्ति एक पद’ के नियम के मुताबिक मुख्यमंत्री पद छोड़ देंगे? तो उनका जवाब था कि अध्यक्ष का चुनाव तो खुला चुनाव है, और इसे कोई भी लड़ सकता है, पार्टी का यह नियम मनोनीत पदों के लिए है। उन्होंने बड़े खुलासे से यह बात साफ कर दी कि वे पार्टी के अध्यक्ष रहते हुए भी मुख्यमंत्री तो बने ही रहेंगे।
कांग्रेस पार्टी की बर्बादी के लिए कुछ लोग शौकिया तौर पर सोनिया-परिवार पर तोहमत लगाते हैं, लेकिन गहलोत का यह ताजा बयान बताता है कि पार्टी के बहुत से नेताओं के अहंकार, और उनकी मतलबपरस्ती पार्टी के आज के बदहाल के लिए बराबरी से जिम्मेदार हैं। अब देश भर में फैली हुई कांग्रेस पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष रहते हुए, मिट्टी में मिली हुई दिखती पार्टी को उठाकर खड़े करने की एक बड़ी जिम्मेदारी को गंभीरता से लेने के बजाय गहलोत साथ-साथ मुख्यमंत्री भी बने रहना चाहते हैं। यह बात उन लोगों को हक्का-बक्का करती है जिन्हें लगता है कि एक पूर्णकालिक पार्टी अध्यक्ष होने के बाद शायद कांग्रेस की हालत सुधर जाए। पार्टटाईम पार्टी अध्यक्ष तो सोनिया गांधी भी हैं, और अगर राजस्थान का मुख्यमंत्री पार्टटाईम पार्टी अध्यक्ष रहना चाहता है, तो उसकी बात कौन सुनेगा? कांग्रेस के सिर पर छाए गहरे काले बादल छंटने का आसार नहीं दिखता। इस ऐतिहासिक पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद भी किसी की हसरत अपने प्रदेश का मुख्यमंत्री भी साथ-साथ बने रहने की है, तो वह हसरत पार्टी के लिए जानलेवा रहेगी। अदालत के कटघरे में घिरा हुआ कोई मुजरिम जिस तरह अपने बचाव के लिए तरह-तरह के तर्क ढूंढता है, कुछ उसी तरह के तर्क गहलोत दो कुर्सियों पर बैठे रहने के लिए जुटा रहे हैं कि ‘एक व्यक्ति, एक पद’ का नियम सिर्फ मनोनीत लोगों के लिए है।


आज देश में कांग्रेस के कुल दो मुख्यमंत्री बचे हैं, उनमें से एक का लालच आज अगर इतना है कि राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद भी वह एक राज्य का सीएम बने रहना चाहता है, तो फिर ऐसे लोगों को पार्टी के लिए त्याग करने के दावे नहीं करने चाहिए। यह बात हम वैसे तो कांग्रेस को लेकर लिख रहे हैं, और गहलोत के बयान के बाद लिख रहे हैं, लेकिन भारतीय राजनीति को देखते हुए यह बात साफ है कि पार्टियों के अध्यक्ष पद पर, या प्रधानमंत्री-मुख्यमंत्री जैसे पदों पर लोगों का आना सीमित समय के लिए होना चाहिए। दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमरीका में राष्ट्रपति कुल चार बरस का कार्यकाल लेकर आते हैं, और वे अधिक से अधिक दो ऐसे कार्यकाल पा सकते हैं, और उसके बाद बाकी तमाम जिंदगी किसी सरकारी ओहदे पर नहीं जा सकते। आज हिन्दुस्तान में पीएम और सीएम की कुर्सी पर लोग तमाम जिंदगी बने रह सकते हैं, उस पर कोई रोक नहीं है। और फिर इस कुर्सी पर लगातार बने रहने के लिए लोग तरह-तरह के जायज और नाजायज तरीकों से ताकत जुटाते हैं, समर्थन जुटाते हैं, और विरोधियों को शांत करने के लिए तरह-तरह की जांच एजेंसियों का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में अगर पार्टियां यह तय नहीं करती हैं कि उनके पीएम और सीएम दो कार्यकाल से अधिक नहीं रहेंगे, तो फिर चुनाव आयोग को ही इस तरह की बात उठानी चाहिए, और कहीं न कहीं से इस पर बहस शुरू होनी चाहिए। लोकतंत्र में हर बीमारी का इलाज कानून से नहीं निकल सकता, दुनिया के बहुत से गौरवशाली और विकसित लोकतंत्र परंपराओं पर चलते हैं, और इन परपंराओं को कानून बनाकर नहीं बनाया जा सकता। जो राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष का पद छोडऩे के बाद परिवार से बाहर के किसी अध्यक्ष के लिए दो बरस से जिद पर अड़े हैं, उन्हें ही पार्टी के पिछले शिविर में इस बात को उठाना था कि पार्टी अध्यक्ष, प्रदेश अध्यक्ष, सीएम और पीएम जैसे पदों पर दो बार से अधिक कोई लगातार नहीं रहेंगे। अगर जिंदगी में कभी दुबारा किसी को उसी कुर्सी पर आना भी है, तो भी कार्यकाल के बराबरी का फासला बीच में होना जरूरी रहना चाहिए।
जब पार्टियों के भीतर किसी भी तरह का लोकतंत्र न रह जाए, तब उन पार्टियों के तय किए हुए उम्मीदवार मनमाने होंगे, और उनसे बनी हुई सरकारें भी मनमानी करती रहेंगी। देश की मजबूत लोकतांत्रिक व्यवस्था देश की पार्टियों की मजबूत आंतरिक लोकतांत्रिक व्यवस्था के बिना नहीं बन सकती। एक-एक कुनबे में कैद पार्टी लीडरशिप, और उनके लड़े गए चुनावों से लोकतंत्र मजबूत नहीं हो सकता। जिन अशोक गहलोत की बात से आज की यह चर्चा शुरू हुई है, उसे सार्वजनिक रूप से खारिज करने की जरूरत है। आज देश में कांग्रेस के पास गिने-चुने ओहदे रह गए हैं, और उनमें से दो सबसे बड़े ओहदे अगर कोई एक आदमी कब्जाना चाहता है, तो यह बहुत ही नाजायज सोच है।

Facebook Comments
(Visited 50 times, 1 visits today)

Leave a Reply

Your email address will not be published.

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.