महिलाओं की आजादी का सवाल..


महसा आमिनी नारी स्वातंत्र्य की आवाज़ का नया नाम बन चुकी हैं। 22 बरस की महसा की मौत पिछले दिनों ईरान में पुलिस हिरासत में हो गई। उनका जुर्म ये था कि उन्होंने हिजाब नहीं पहना था और इस वजह से उन्हें पुलिस हिरासत में लिया गया, जहां उन्होंने आखिरी सांसें लीं। महसा की मौत के लिए सरकारी एजेंसी ‘गश्त-ए-इरशाद’ को जिम्मेदार माना जा रहा है। यह एक तरह की नैतिक पुलिस है, जिसका काम ईरान में सार्वजनिक तौर पर इस्लामी आचार संहिता को लागू करना है। ‘गश्त-ए-इरशाद’ का गठन 2006 में हुआ था। ये संगठन ‘इस्लामी आचार संहिता के उल्लंघन’ पर किसी को फटकार लगा सकता है या सार्वजनिक तौर पर किसी को गिरफ़्तार कर सकता है। ईरान में महिलाओं को हिजाब पहनना अनिवार्य है, इसके अलावा भी तैराकी की पोशाक पहनने, स्टेडियम में फुटबॉल मैच देखने, कार्यस्थल पर उत्पीड़न के खिलाफ आवाज़ उठाने या अकेले बाहर घूमने के लिए पुरुषों की तरह अधिकार हासिल नहीं हैं, बल्कि कई तरह की पाबंदियों में उनका जीवन बीतता है। एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट बताती है कि महिलाओं को शादी, तलाक या बच्चों का हक रखने के लिए भी कई किस्म के भेदभाव सहने पड़ते हैं। संक्षेप में कहें तो स्त्री-पुरुष गैरबराबरी ईरान में कई शक्लों में नजर आती है और अब तक महिलाएं किसी न किसी वजह से इस अन्याय को सहती आ रही हैं। लेकिन महसा आमिनी की मौत ने बदलाव की एक नयी लहर उठाई है। कुर्दिस्तान से लेकर तेहरान तक ईरान के कई इलाकों में हिजाब के विरोध में महिलाएं सड़कों पर उतर आई हैं। शनिवार को जब महसा को दफ्न किया जा रहा था, तो उनके अंतिम संस्कार के लिए भारी भीड़ इक_ा हुई और वहां मौजूद कई महिलाओं ने महसा के समर्थन में अपने हिजाब उतार दिए।
ईरानी महिलाओं का यह विरोध दुनिया भर में चर्चा का विषय बना हुआ है। क्योंकि महिलाओं ने केवल अपने हिजाब नहीं उतारे, बरसों से दमन और उत्पीड़न के आवरण को खींचकर पुरुष सत्तात्मक समाज को अपनी हिम्मत का चेहरा दिखाया है। महिलाएं जानती थीं कि जब वे अपना गुस्सा जाहिर करने के लिए घरों की चौखटों को पारकर सड़कों पर उतरेंगी तो उन्हें रोकने के लिए सत्ता जोर आजमाइश करेगी। इसके बावजूद महिलाओं ने हिम्मत दिखाई। सुरक्षा बलों की कार्रवाई में कम से कम पांच लोगों की मौत की खबर है, कई लोग घायल भी हुए हैं। लेकिन जो सवाल ईरान से उठा है, वो अब दूसरे देशों तक भी पहुंच रहा है। सवाल ये है कि क्या महिलाओं को अपनी मर्जी से जीवन जीने का हक नहीं होना चाहिए। क्या किसी धार्मिक मान्यता या परंपरा का उल्लंघन इतना गंभीर अपराध हो सकता है कि उसके लिए किसी के प्राण ले लिए जाएं।
ईरान में जब हिजाब की अनिवार्यता पर विरोध-प्रदर्शन चल रहा है, तो वहीं भारत में भी कई महीनों से हिजाब विवाद जारी है। कुछ शिक्षण संस्थानों ने हिजाब पहन कर आने पर पाबंदी लगा दी, जिसके विरोध में लड़कियों ने आवाज उठाई। हिजाब पहनने की मांग के कारण कई छात्राओं को कक्षाओं से, परीक्षा से वंचित होना पड़ा। अब यह मुद्दा न्यायालय में विचाराधीन है और इस पर देश की सर्वोच्च अदालत को फैसला लेना है। वैसे हिजाब के विरोध में जब कक्षाओं में भगवा गमछा नजर आ गया, तभी यह बात स्पष्ट हो गई कि भारत में यह मुद्दा नारी स्वतंत्रता के नाम पर धार्मिक प्रतीकों की होड़ का बना दिया गया है। जो लोग हिजाब पर रोक के समर्थक हैं, वे स्त्री मुक्ति, उदारता, रूढ़ियों से मुक्ति और प्रगतिशीलता की दलीलें देते हैं। हालांकि इन दलीलों में वो ये बात भूल जाते हैं कि असली मुक्ति या सच्चा विकास और बराबरी तो तभी मानी जाएगी, जब एक लड़की या महिला को उसका जीवन उसके हिसाब से जीने का माहौल बने। यह अधिकार उसे किसी खैरात की तरह नहीं मिले, बल्कि उसी तरह हासिल हो, जैसे समाज में पुरुषों को मिला हुआ है।
जैसे पतलून, पायजामा, धोती या हाफ पैंट में से कुछ भी पहनने का फैसला लड़के अपनी मर्जी और सुविधा से करते हैं, वहीं हक लड़कियों को क्यों न हासिल हो। उनके लिए धर्म की बेड़ियां मर्जी के हिसाब से क्यों लगाई या हटाई जाती हैं। सवाल केवल हिजाब या बुरके का ही नहीं है। किसी भी धर्म में पली-बढ़ी समूची औरत ज़ात के रहन-सहन का है। सुहागिनों के तरह-तरह के धार्मिक अनुष्ठानों से लेकर विधवाओं तक कई किस्म के नियम बने हुए हैं, जिनका पालन महिलाएं न करें या उनमें हील-हवाला बरतें तो उन्हें प्रश्नवाचक निगाहों से गुजरना पड़ता है। लेकिन पुरुषों के लिए नियमों की संख्या नगण्य है। अपने वर्चस्व को बनाए रखने के लिए ही पितृ सत्तात्मक समाज ने महिलाओं के लिए ऐसे नियम बनाए हैं, जिनकी आड़ में उन पर नियंत्रण किया जा सके। महिलाओं को मानवीय गरिमा से नीचे गिराकर केवल शारीरिक संरचना के आधार पर गौण मानकर व्यवहार किया जाता है। जब महिलाएं इस व्यवहार को अत्याचार कहती हैं, तो उन्हें धर्म की दुहाई दी जाती है।
देश कोई भी हो, महिलाओं की पूरी आजादी का सवाल एक जैसा ही है। फिलहाल ईरान और भारत में इसका क्या जवाब मिलता है, ये देखना होगा।

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