चंडीगढ़ MMS कांड से उठे सवाल..


चंडीगढ़ के एक निजी विश्वविद्यालय के हॉस्टल में एक लड़की द्वारा अपनी अन्य साथी लड़कियों के आपत्तिजनक वीडियो बनाकर उन्हें लीक करने के मामले से हड़कंप मचा हुआ है। इस विश्वविद्यालय में शनिवार देर रात से बड़ी संख्या में छात्राओं ने प्रदर्शन किया, जिसके बाद यह मामला सुर्खियों में आया। समाज में अक्सर दूसरों की बातों या समस्याओं को, खासकर लड़कियों के मामलों को चटखारे के साथ सुनाया जाता है और सोशल मीडिया आने के बाद बातों में अपनी ओर से कुछ जोड़ कर बताने की गलत आदत भी पड़ गई है। चंडीगढ़ मामले में भी ऐसा ही हुआ। सोशल मीडिया पर पहले खबर आई कि एक लड़की ने अपना एमएमएस लीक होने की वजह से आत्महत्या कर ली। एक अन्य खबर में सात से आठ लड़कियों की आत्महत्या की जानकारी दी गई। ये बात भी सामने आई कि विरोध प्रदर्शन के दौरान कम से कम आठ लड़कियां बेहोश हो गई हैं। लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन ने इन खबरों का खंडन करते हुए जो बयान दिया, उसके मुताबिक सोशल मीडिया पर चल रही अफवाहें निराधार थीं। यूनिवर्सिटी के प्रो-चांसलर डॉ. आर.एस. बावा ने कहा कि अफवाहें फैली हैं कि सात लड़कियों ने आत्महत्या कर ली है लेकिन सच्चाई यह है कि किसी भी लड़की ने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया है। घटना में किसी भी लड़की को अस्पताल में भर्ती नहीं कराया गया है। वहीं मोहाली पुलिस का कहना है कि अब तक सिर्फ एक ही वीडियो सामने आया है जो आरोपी का ही है। इसके अलावा और कोई वीडियो जांच में सामने नहीं आया है। इस मामले में विश्वविद्यालय प्रशासन पर मामले को दबाने और लापरवाही के इल्जाम भी लगे। लेकिन राष्ट्रीय महिला आयोग ने चंडीगढ़ विश्वविद्यालय के कुलपति से कहा है कि वह दोषियों के खिलाफ उचित कार्रवाई करें। पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने मामले की उच्च स्तरीय जांच का भरोसा दिया है साथ ही लोगों से अपील की है कि सोशल मीडिया पर अफवाहें फैलाने से बचें।
ये मामला कब, कहां और कैसे थमेगा, फिलहाल कुछ भी कहना कठिन है। यह घटना साइबर अपराध का एक और उदाहरण है, जिसकी चपेट में अक्सर सामान्य लोग आ जाते हैं, जो तकनीकी को सुविधा और मनोरंजन के लिए इस्तेमाल करते हैं। मगर कुछ लोग अपने नापाक इरादों को पूरा करने के लिए तकनीकी का दुरुपयोग करते हैं और फिर चर्चा इस बात पर शुरु हो जाती है कि विज्ञान अभिशाप है या वरदान। इस चर्चा में यह पहलू गौण रह जाता है कि कोई भी चीज क्या असर करती है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप उसे किस चीज के लिए, किस तरह से इस्तेमाल करते हैं। गांधीजी अहिंसा के पुजारी थे और लाठी उनके चलने का सहारा। लेकिन यही लाठी कुछ लोग दबंगई के लिए इस्तेमाल करते हैं, तो इसमें दोष लाठी का नहीं, लोगों की मानसिकता का है।
देश में जब से सूचना क्रांति आई है और मोबाइल, इंटरनेट के कारण सूचनाओं की पहुंच तीव्र हुई है, तब से बहस का एक मुद्दा यह भी रहा है कि नौजवानों और बच्चों के हाथों में मोबाइल से क्या वो बिगड़ रहे हैं। अभी लखीमपुर बलात्कार मामले में सत्तारुढ़ दल के एक नेता ने टीवी चैनल की बहस में खुलकर कहा कि मोबाइल के कारण लड़कियों की जान-पहचान दूसरे लोगों से होती है, वो उनसे मिलने की योजना बनाती हैं और फिर बलात्कार होता है। जबकि हकीकत ये है कि बलात्कार उन मासूम बच्चियों का भी होता है, जो मोबाइल पकड़ने लायक भी नहीं होती। पुरुषों की गलत सोच को जायज ठहराने के लिए लड़कियों की आजादी, पढ़ने और नौकरी करने या अपनी मर्जी से जीवन जीने को गलत साबित करने की लगातार कोशिश होती है। कई खाप पंचायतें लड़कियों के जींस पहनने या मोबाइल रखने पर पाबंदी का फरमान जारी कर चुकी हैं। अब चंडीगढ़ की घटना से एक बार फिर लड़कियों के लिए आगे पढ़ने में बाधाएं आ सकती हैं।
इस मामले में मुख्य आरोपी और पीड़ित दोनों लड़कियां हैं। आरोपी का असली मकसद क्या था, क्या किसी के दबाव में उसने ऐसा किया, क्या इसके पीछे किसी बड़े गिरोह का हाथ है, ऐसे कई सवालों के जवाब तलाशने के लिए ईमानदार और निष्पक्ष जांच की जरूरत है। लेकिन इसके साथ एक सवाल ये खड़ा हो गया है कि अब उस विश्वविद्यालय में पढ़ रही छात्राओं पर इस घटना का क्या असर होगा। 18 साल पहले दिल्ली के एक नामी स्कूल में ऐसा ही एक एमएमएस कांड हुआ था, जिसकी गूंज पूरे देश में सुनाई दी थी। तब मोबाइल फोन में कैमरों का फीचर नया-नया था और चंद लोगों तक ही उनकी पहुंच थी। उस वक्त पीड़िता को उसके मां-बाप ने विदेश भेज दिया था। लेकिन हर लड़की के अभिभावक इतने सक्षम नहीं होते कि वे अपनी बेटी की सुरक्षा के लिए उसे बाहर भेज दें। और यह कोई समाधान भी नहीं है। लड़कियों को किसी भी तरह के अपराध से बचाने के लिए जरूरी यह है कि समाज अपनी मानसिकता में बदलाव लाए। साथ ही नयी पीढ़ी में आ रहे बदलावों को समझने की कोशिश करे। पिछले 20-25 सालों में दुनिया में बहुत तेजी से चीजें बदली हैं। नयी पीढ़ी ने उन बदलावों को जिया और आत्मसात किया है। लेकिन इससे पहले के लोग उन बदलावों के साथ अब तक सहज नहीं हो पाए हैं। इसलिए अपने मूल्यों और परंपराओं को बनाए रखने के लिए तरह-तरह की पाबंदियों की हिमायत की जाती है। जिसे आज के बच्चे सहज स्वीकार नहीं कर पाते और फिर विद्रोह, टकराव या इस तरह के अपराध होते हैं।
उम्मीद की जाना चाहिए कि इस घटना के बाद उस विश्वविद्यालय की छात्राओं की पढ़ाई पर कोई असर नहीं आए और जो बच्चियां हॉस्टल में रह रही थीं, वे भी अपनी पढ़ाई जारी रख सकें।

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