दान में केला एक और फोटो दर्जन भर दाताओं का..


-सुनील कुमार।।

चारों तरफ से बुरी खबरों के बीच चंडीगढ़ से एक अच्छी खबर आई है कि वहां पीजीआई से पहले जुड़े रहे किसी एक व्यक्ति ने अपना नाम उजागर किए बिना इस मेडिकल इंस्टीट्यूट को दस करोड़ रूपये दान किए हैं। समाचारों में बताया गया है कि इस पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन के रीनल ट्रांसप्लांट सेंटर में अगस्त में 24 किडनी ट्रांसप्लांट हुए थे, और इनमें से एक मरीज इस दानदाता का रिश्तेदार था। आज हिन्दुस्तान में किडनी ट्रांसप्लांट के लिए लोगों को दानदाता ढूंढते बरसों इंतजार करना पड़ता है, एक-एक, दो-दो बरस तक कानूनी कागज पूरे नहीं होते, और कई महीनों की जांच के बाद अस्पताल में उनकी बारी आती है। ऐसे में चंडीगढ़ के इस सबसे बड़े सरकारी अस्पताल को बिना किसी शोहरत की उम्मीद के मिला इतना बड़ा दान बाकी लोगों के लिए भी एक मिसाल बन सकता है।

दुनिया में दान की परंपरा कई देशों में धर्म के साथ जुड़ी रही है। चर्च में लोगों के सदस्य बनने और दान देने का रिवाज हिन्दू मंदिरों के मुकाबले अधिक औपचारिक है, और वह पैसा दुनिया के बहुत से देशों में जाता भी है। दूसरी तरफ कई धर्मों में लोग दान तो करते हैं, लेकिन उनका पैसा या तो मंदिरों और मठों में कैद रह जाता है, वहां सोने की शक्ल में तिजौरियों में बंद रहता है, और उनका किसी भी तरह का सामाजिक इस्तेमाल नहीं हो पाता। हिन्दुस्तान में धर्म से परे दान की परंपरा बड़ी सीमित है। देश के कुछ बड़े कारोबारियों ने अपनी सारी दौलत का एक बड़ा हिस्सा समाजसेवा के लिए देने की घोषणा की है, और अजीम प्रेमजी जैसे अरबपति लगातार खर्च कर भी रहे हैं। अजीम प्रेमजी और नारायण मूर्ति जैसे लोग आम मुसाफिर विमानों में इकॉनॉमी क्लास का सस्ता सफर करते हैं, और अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा जनसेवा में लगाते हैं। दूसरी तरफ इस देश को लूटने के अंदाज में काम करने वाले कई चर्चित और विवादास्पद कारोबारी दान के नाम पर दो-चार दाने समाज की तरफ फेंक देते हैं, और अपनी दौलत दिन दूनी रात चौगनी बढ़ाते रहते हैं।

हिन्दुस्तान में ढेर सारे जनसंगठन, धार्मिक और सामाजिक संस्थाएं, तरह-तरह के अंतरराष्ट्रीय क्लबों के भारतीय यूनिट दान के नाम पर जो कुछ करते हैं, उससे कई गुना अधिक प्रचार अपने लिए जुटाते हैं। बहुत से धार्मिक और सामाजिक संस्थानों के लोग अस्पतालों में जाकर मरीजों को एक-एक फल देकर साथ में दर्जन-दर्जन भर लोग फोटो खिंचवाते हैं, और उसे अखबारों में छपवाते हैं। अधिकतर संगठन अपने बैनर तैयार रखते हैं, और आधा दर्जन घड़े लेकर कोई प्याऊ भी शुरू किया जाता है, तो उसके पीछे बैनर लेकर एक दर्जन लोग फोटो खिंचवाने लगते हैं, और फिर उसे सोशल मीडिया पर फैलाते हैं। दान का आकार प्रचार के आकार से किसी तरह भी अनुपात में नहीं रहता। फिर दान तो वह होना चाहिए जो अपनी जरूरतों में कटौती करके, अपने साधनों को निचोडक़र दूसरे लोगों की जरूरत के लिए दिया जाए। यहां तो लोग अपने जेब खर्च जितना दान देते हैं, और किसी महान दानदाता जितनी शोहरत जुटाते हैं। सोशल मीडिया पर ऐसे दानदाताओं की नीयत का मखौल भी उड़ते रहता है, और उनकी तस्वीरों की लोग खिल्ली भी उड़ाते हैं। लेकिन दानदाताओं की अपार सहनशक्ति होती है, जो वे फिर कुछ दिनों में बाजार में सबसे सस्ता मिलने वाला फल लेकर और फोटोग्राफर लेकर अस्पताल रवाना हो जाते हैं, और घंटे भर में दान की संतुष्टि पाकर प्रचार में जुट जाते हैं।

दान के प्रचार में हम बहुत बुराई भी नहीं मानते क्योंकि बिलगेट्स जैसे बड़े कारोबारी ने जब अपनी दौलत का आधा हिस्सा समाजसेवा में देने का फैसला लिया, उस बारे में दुनिया को बताया, तो उनकी देखादेखी, और उनकी प्रेरणा से दुनिया के बहुत सारे दूसरे कारोबारियों ने भी इस तरह का संकल्प लिया, और समाज को वापिस देना शुरू किया। इसलिए नेक काम का प्रचार दूसरे लोगों को नेक काम के लिए प्रेरित भी करता है। लेकिन इसका एक अनुपात रहना चाहिए। हिन्दुस्तान में बहुत ही सीमित दान और असीमित प्रचार दिखता है, और खटकता भी है।

हाल ही के बरसों में जब देश में कोरोना फैला, और सरकार ने कारोबारियों से दान की उम्मीद की, तो देश के दो सबसे बड़े कारोबारियों ने अपनी एक-एक घंटे की कमाई भी शायद दान में नहीं दी। दूसरी तरफ टाटा एक ऐसा उद्योग समूह था जिसने डेढ़ हजार करोड़ रूपये से अधिक दान दिया था। इस तरह की बातों को समाज के बीच चर्चा का सामान भी बनाना चाहिए, जब तक सोशल मीडिया पर, और जनता के बीच इस तरह की तुलना करके बातचीत नहीं होगी, तब तक तो घंटे भर की कमाई देने वाले लोग भी अपने प्रचारतंत्र से अपनी महानता दिखाते रहेंगे। दान और समाजसेवा को लेकर इस देश में जागरूकता की जरूरत है, और इससे जुड़े सवाल उठाने के लिए जनता में जनजागरण की जरूरत है।

Facebook Comments
(Visited 19 times, 1 visits today)

Leave a Reply

Your email address will not be published.

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.