जुल्म का अंधेरा, जमानत का उजाला..

हम जिस स्वतंत्रता का आनंद लेते हैं, वह संघर्ष का परिणाम है। भारतीय नागरिकों की स्वतंत्रता उनसे नहीं छीनी जानी चाहिए। ये बातें किसी राजनेता या कानून के जानकार ने नहीं कहीं हैं, बल्कि ये उद्गार हैं 9 बरस की मेहनाज़ कप्पन के। आजादी के जिस अमृतकाल को आज पूरे देश में प्रायोजित ढंग से मनाया जा रहा है, उसी आजादी के दिन पर अपने सरकारी स्कूल में एक भाषण के दौरान मेहनाज़ कप्पन ने अपने साथियों और तमाम लोगों को आजादी का महत्व बताया। मेहनाज़ ने खुद का परिचय देते हुए कहा था कि ‘मैं मेहनाज़ कप्पन हूं। पत्रकार सिद्दीक कप्पन की बेटी, भारत का ऐसा नागरिक जिसकी स्वतंत्रता छीन कर उसे एक अंधेरे कमरे में रहने को मजबूर किया गया है।’ 15 अगस्त को दिया गया यह भाषण काफी वायरल हुआ था। तब तक सिद्दीक कप्पन की रिहाई या जमानत को लेकर कोई उम्मीद भी दिखाई नहीं दे रही थी।

गौरतलब है कि 2020 में हाथरस में एक दलित लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार का भयानक अपराध हुआ था। और इतनी नृशंसता काफी नहीं थी, कि बलात्कार की शिकायत को दर्ज करने में लापरवाही बरती गई। इस गंभीर अपराध को छेड़खानी दिखाने की कोशिश की गई। पीड़िता के साथ एक आरोपी के संबंध स्थापित करने का कुत्सित प्रयास हुआ। पीड़िता की गंभीर हालत के बावजूद उस के इलाज में देर की गई। एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल पीड़िता को ले जाया गया और आखिरकार दिल्ली के सफरदरजंग अस्पताल में पीड़िता ने अंतिम सांस ली। इसके बाद उसके घरवालों को अंधेरे में रखकर पीड़िता का अंतिम संस्कार पुलिसवालों ने ही कर दिया। इस पूरे मामले को सिलसिलेवार तरीके से देखें तो सरकार और प्रशासन की अक्षम्य लापरवाही और संवेदनहीनता कदम-कदम पर दिख जाएगी। लेकिन कानून का जोर उन पर चला जो इस मामले में पीड़िता को इंसाफ देने की आवाज़ उठा रहे थे। सिद्दीक कप्पन भी उन्हीं में से एक थे।

मलयालम समाचार पोर्टल ‘अझीमुखम’ के संवाददाता और केरल यूनियन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स की दिल्ली इकाई के सचिव सिद्दीक कप्पन को 5 अक्टूबर, 2020 को उस वक्त तीन अन्य लोगों के साथ गिरफ्तार किया गया था, जब वे हाथरस मामले की रिपोर्टिंग के लिए जा रहे थे। उप्र पुलिस ने उन पर आरोप लगाया था कि वह कानून व्यवस्था खराब करने के लिए हाथरस जा रहे थे। श्री कप्पन को गिरफ्तार करके उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए (देशद्रोह), 153ए (समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देना) और 295ए (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना), यूएपीए की धारा-14 और 17 तथा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम धारा की 65, 72 और 76 के तहत मामला दर्ज किया गया था। सिद्दीक कप्पन पर पीएफआई से जुड़े होने का भी आरोप लगाया गया, जबकि सरकार ने खुद माना है कि यह प्रतिबंधित संगठन नहीं है। उत्तर प्रदेश सरकार ने इसी महीने उनकी जमानत का विरोध करते हुए आरोप लगाया था कि उनके पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया यानी पीएफआई के साथ गहरे संबंध हैं, जो एक प्रतिबंधित संगठन नहीं है। अब सवाल ये है कि अगर कोई संगठन कानूनन प्रतिबंधित नहीं है, तब उसके साथ किसी भी तरह के ताल्लुक रखना गैरकानूनी कैसे हो सकता है। पुलिस प्रशासन यह भी साबित नहीं कर पाया कि हाथरस मामले में पड़ताल करने जा रहे सिद्दीक कप्पन पर किस आधार पर दंगे भड़काने या देशद्रोह का इल्जाम लगाया जा सकता है।

हाथरस मामले में पीड़िता से लेकर पत्रकार कप्पन तक, जिस तरह कानून के साथ खिलवाड़ किया गया है, वह एक गंभीर मुद्दा है। पुलिस से पूछा जा सकता है कि जिस कानून व्यवस्था को बनाए रखने के लिए सिद्दीक कप्पन को गिरफ्तार किया गया, वह उस वक्त क्यों नहीं दिखाई दी, जब एक लड़की को सामूहिक बलात्कार का शिकार बनाया गया, जब उसके इलाज और इंसाफ की राह में बाधाएं डाली जा रही थीं, जब उसे मानवीय गरिमा के साथ अंतिम संस्कार का हक भी नहीं मिला। सवाल तो ये भी होना चाहिए कि एक नागरिक को बिना किसी ठोस सबूत के किस वजह से लगभग दो साल तक सलाखों के पीछे रखा गया। पिछले दो सालों तक ऐसे कई जरूरी सवालों को दबा कर ही रखा गया था। गनीमत है कि अब देश की सर्वोच्च अदालत ने इस पर अपनी महत्वपूर्ण राय और फैसला दिया।

सिद्दीक कप्पन ने अपनी जमानत के लिए जब सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई तो अदालत ने उन्हें सशर्त जमानत देते हुए उत्तरप्रदेश सरकार से पूछा कि ‘हर व्यक्ति को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है। वह यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि पीड़ित को न्याय की जरूरत है। क्या यह कानून की नजर में अपराध है।’ आपको बता दें कि श्री कप्पन की जमानत का विरोध करते हुए दलील दी गई थी कि उनके पास कुछ ऐसा साहित्य मिला है, जो हाथरस की लड़की के लिए न्याय मांगने से संबंधित था, इस पर अदालत ने सवाल किए कि ‘हाथरस की पीड़िता के लिए न्याय चाहिए’ जैसे विचार को प्रसारित करना कैसे कानून की नजर में अपराध है। सामान्य समझ वाले ऐसे सवाल अगर देश की सर्वोच्च अदालत को उठाने पड़ रहे हैं, तो यह मान लेना चाहिए कि हम नैतिक तौर पर पतन के सबसे भयावह समय से गुज़र रहे हैं।

सिद्दीक कप्पन जमानत मिलने के बाद अब खुली हवा में सांस ले पाएंगे। हालांकि उनके और उनके परिवार के लिए इस मुश्किल में डटकर खड़े रहना आसान नहीं था। लेकिन उनकी रिहाई के लिए केरल यूनियन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट ने लगातार लड़ाई लड़ी और आखिरकार उसमें उन्हें सफलता मिली। मेहनाज़ कप्पन के पिता अब जेल से बाहर हैं, लेकिन जिस अंधेरे कमरे का जिक्र मेहनाज़ ने किया, उसमें अभी बहुत से ऐसे लोग कैद हैं, जो अपनी विचारधारा या सत्ता से मुठभेड़ के जोखिम के कारण वहां पहुंचे हैं। उन्हें स्वतंत्रता का अधिकार कब मिलेगा, यह बड़ा सवाल है।

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