गिरती साख के बीच आयकर के छापे

कांग्रेस नेता राहुल गांधी की कन्याकुमारी से कश्मीर की पैदल यात्रा गुरुवार को प्रारम्भ हो गयी, तो वहीं दूसरी तरफ बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार विपक्षी एकता की मुहिम के तहत देश के प्रमुख गैर भाजपायी दलों के नेताओं से मेलमिलाप में जुटे हुए हैं। ऐसे में बुधवार का दिन आयकर विभाग के लिये बेहद सक्रियता का रहा। देश के 79 से ज्यादा छोटे सियासती दलों के खिलाफ आयकर विभाग ने इस बिना पर कार्रवाइयां की हैं कि ये पार्टियां संदेहास्पद लेन-देन के साथ आयकर छूटों का लाभ तो ले रही हैं परन्तु चुनाव आयोग को खर्चों का विवरण नहीं दे रही हैं।

उत्तर प्रदेश, हरियाणा, मध्यप्रदेश के ऐसे छोटे-मोटे दलों पर 100 से अधिक कार्रवाइयां की गयीं। विभाग का आरोप है कि इन्होंने 2018-19 और 2019-20 के दौरान तकरीबन 1000 करोड़ रुपये की कर सम्बन्धी छूटों का लाभ लिया। आयोग का कहना है कि 2019 के आम चुनाव में 623 पंजीकृत गैर मान्यता प्राप्त पार्टियों ने उम्मीदवार उतारे थे। इन्होंने खर्चों का ब्यौरा नहीं दिया। इतना ही नहीं, 1700 दल चुनाव तो लड़े नहीं परन्तु उन्होंने भी करोड़ों रुपयों की टैक्स चोरी की।

दोषियों पर छापों एवं कार्रवाइयों का स्वागत है और उससे किसी को कोई शिकायत नहीं है। और तो और, साफ-सुथरी निर्वाचन प्रणाली में भरोसा रखने वाला हर कोई चाहता है कि चुनावों में होने वाले अवैध धन का उपयोग रुके। लोकतांत्रिक लोग, संगठन एवं सिविल सोसायटियां लम्बे समय से मांग भी करती आई हैं कि धन बल का उपयोग सीमा के भीतर हो। इसे चुनाव सुधार का एक अनिवार्य हिस्सा तो माना गया लेकिन कभी इस पर गंभीरतापूर्वक काम नहीं हुआ। केन्द्र की सत्ता पर काबिज और पिछले कुछ समय से भारतीय राजनीति की केन्द्रीय शक्ति बन चुकी भारतीय जनता पार्टी ने इस समस्या को ऐसे अधिक गम्भीर बना दिया कि उसने इन सभी एजेंसियों को ही अपने चुनावी हथियार बना दिये हैं। चुनाव आयोग के साथ ही जांच एजेंसियों का काम भाजपा-विरोधी दलों को निशाने पर लेते रहने का है। आयकर (आईटी), केन्द्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) का उपयोग न केवल विपक्षी दलों के विधायकों-सांसदों-नेताओं को डराने के लिये होता है वरन राज्यों की निर्वाचित सरकारों को गिराने में तक खुल्लमखुल्ला होने लगा है।

महंगाई, बेरोजगारी, भुखमरी, भ्रष्टाचार, कोविड का कुप्रबंधन, गिरती जीडीपी, मुद्रास्फीति, निजीकरण आदि के कारण लोगों के बीच असंतोष लगातार बढ़ता जा रहा है। अनेक नाकामियों के कारण मोदी एवं भाजपा सरकार की लोकप्रियता घटती जा रही है। राहुल के सवालों से भाजपा घिरती जा रही है। बिहार में नीतीश के साथ गठबन्धन टूटने से वह आहत तो है ही, तीन माह बाद होने वाले विधानसभा चुनावों में उसके हाथों से गुजरात के निकल जाने का डर भी उसे सता रहा है। सतत मजबूत होती कांग्रेस एवं विपक्षी एकता के मद्देनज़र 2024 का चुनाव उसके लिये एक बड़ी चुनौती माना जा रहा है। चुनाव हारकर भी सरकार बनाने में माहिर भाजपा के लिये ऐसे में निश्चित ही छोटे दल कहीं न कहीं काम आ सकते हैं। हालांकि फिलहाल इनकी ऐसी कोई बड़ी ताकत नहीं है पर वोटरों के लिहाज से वे उपयोगी पड़ सकते हैं। इसलिये इन छापों का भाजपा के राजनैतिक हितों से कनेक्शन होने से इंकार नहीं किया जा सकता।

इन छापों में कितनी सच्चाई है, यह अभी तो कहना मुश्किल है पर इतना अवश्य कहा जा सकता है कि ये निष्पक्ष या वास्तविक जांच के लिये कतई नहीं मारे गये हैं।
कोई यह न कहे कि ये छापे तो चुनाव आयोग के निर्देश पर मारे गये हैं। सभी जानते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में केन्द्रीय चुनाव आयोग की अपनी विश्वसनीयता ही संदेह के घेरे में है। आयोग स्वतंत्र व निष्पक्ष निर्णय लेने का अपना विवेक एवं साहस कभी का खो चुका है। निर्वाचन का कैलेंडर बनाने से लेकर नतीजे आते तक चुनाव अधिकारी सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी की सुविधा का केवल ख्याल ही नहीं रखते बल्कि ऐसा वातावरण बनाते हैं जिससे भाजपा का जीत का मार्ग सुगम हो। फिर इसके लिये चाहे उसे एक दौर में हो सकने वाला मतदान कई चरणों में कराया जाना हो अथवा चेहरे व पार्टियां देखकर आने वाली आचार संहिता के उल्लंघन वाली शिकायतों पर फैसले ही क्यों न हो।

चुनाव आयोग एवं जांच एजेंसियों को अपनी विश्वसनीयता फिर से पाने के लिये काफी मेहनत करनी होगी।

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