बेटी-भांजी के नारों और माथे पर तिलक के मायने क्या, अगर इतना भ्रष्टाचार..

-सुनील कुमार।।

करीब पन्द्रह बरस के मुख्यमंत्री वाले शिवराज सिंह चौहान के मध्यप्रदेश में भ्रष्टाचार देखने लायक रहता है। लोगों को व्यापमं का भ्रष्टाचार याद है जिसमें राज्यपाल, मंत्री, बड़े-बड़े अफसर, बड़े-बड़े दलाल फंसे हुए मिले, और राज्यपाल अपने कार्यकाल के बाद किसी कार्रवाई का शिकार होते, इसके पहले वे गुजर भी गए। हजारों लोगों के साथ इस भ्रष्टाचार में बेईमानी हुई, इसके दर्जन भर गवाह और आरोपी संदिग्ध हालात में मारे गए। ऐसे और भी बहुत से मामले समय-समय पर हुए, लेकिन अभी ताजा मामला किसी राजनीतिक आरोप से उपजा हुआ नहीं है, यह मध्यप्रदेश के महालेखाकार की रिपोर्ट से उजागर हुआ है जिसमें यह पाया गया है कि 110 करोड़ रूपये का पोषण आहार बच्चों और गर्भवती या दूध पिलाती महिलाओं को बांटने के बजाय फर्जीवाड़े में गायब कर दिया गया। लाखों ऐसे बच्चे जो स्कूल नहीं जाते उनके नाम पर भी करोड़ों का राशन बांट दिया गया। स्कूलों में फर्जी हाजिरी दिखाई गई, और नियमित रूप से उनके नाम पर सत्ता पर काबिज लोग खाते रहे। अब आज तो राज्य की तरह ही केन्द्र में भी भाजपा की सरकार है, और केन्द्र सरकार के नियुक्त महालेखाकार पर यह आरोप भी नहीं लगाया जा सकता कि वह विपक्षी पार्टी की सरकार को परेशान करने की नीयत से यह गड़बड़ी उजागर कर रहा है।
महालेखाकार की ऑडिट रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है कि यह पोषण आहार जिन ट्रकों से पहुंचाने के बिल लगाए गए हैं वे मोटरसाइकिल और स्कूटरों के नंबर निकले हैं, और पानी के टैंकरों के भी। भ्रष्टाचार करने वाले इस हद तक दुस्साहसी हैं कि उन्होंने पहले कई बार पकड़ी जा चुकी इस तरकीब से भी परहेज नहीं किया। कई जिलों में जितना पोषण आहार पहुंचा बताया गया, उससे हजारों टन कम बांटना बताया गया, यानी सरकार के कागजों में ही 62 करोड़ रूपये दाम का 10 हजार टन पोषण आहार गायब मिला। कई जगहों पर कोई रजिस्टर नहीं मिला, कई जगहों पर दसियों हजार टन घटिया क्वालिटी का पोषण आहार बांटा गया, और अफसरों ने इसके सैकड़ों करोड़ रूपये भुगतान भी कर दिए। जिन गाडिय़ों के नंबर दिए गए उनमें ट्रक बिल्कुल नहीं मिले। एजी की जांच में यह भी मिला कि जिन कारखानों में यह पोषण आहार बनाना बताया गया, उनमें बिजली की कुल खपत ही इतने उत्पादन के आधे से भी कम मिली, यानी पोषण आहार बना ही नहीं, और उसे गरीबों में बांटने तक का फर्जी हिसाब-किताब बना दिया गया। ऐसा ही एक दूसरा मामला मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के अपने विदिशा जिले का भी सामने आया है जिसमें उनके खुद के नाम की मुख्यमंत्री कन्या विवाह योजना का पैसा नेता-अफसर, और दलालों के खातों में चले गया।
सरकार में भ्रष्टाचार बहुत अनोखी बात नहीं है, और मध्यप्रदेश जैसे बड़े राज्य में किसी योजना में 110 करोड़ का भ्रष्टाचार तो बिल्कुल भी बड़ा नहीं है लेकिन यह भ्रष्टाचार किन लोगों के हक पर हो रहा है वह बड़ा मुद्दा है। कुपोषण के शिकार सबसे गरीब जच्चा-बच्चा के हक पर अगर सरकार संगठित और योजनाबद्ध तरीके से डाका डालती है, तो वह बांध निर्माण के भ्रष्टाचार के मुकाबले अधिक बड़ी हैवानियत है। और फिर यह भ्रष्टाचार ऐसे राज्य में और अधिक शर्मनाक है जहां पन्द्रह बरस के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपने इस चौथे कार्यकाल में अपने आपको प्रदेश की लड़कियों का मामा कहलाते नहीं थकते हैं, किसी को बहन कहते हैं, किसी को भांजी मानते हैं, और ईश्वर के ऐसे भक्त हैं कि साल में 365 दिन उनके माथे पर तरह-तरह के तिलक सजे रहते हैं, वे अपनी पत्नी के साथ तरह-तरह की पूजा में बैठे दिखते हैं। अब मध्यप्रदेश में अगर सबसे गरीब लोगों के जिंदा रहने के हक पर इतना बेशर्म डाका डाला जा रहा है, तो तरह-तरह के रिश्तों के नारे और देवताओं के जयकारे का क्या मतलब है? यह नौबत देखकर लगता है कि सरकार से बेहतर तो वे लुटेरे रहते हैं जो अगर लूटते हैं तो कम से कम चेहरे पर कपड़ा बांधे रहते हैं, कम से कम चाकू दिखाकर लूटते हैं, और जिन्हें लूटते हैं, उन्हें बहन-बेटी-भांजी नहीं बताते हैं।
मतलब यह है कि किसी भी तरह का धर्म और किसी भी तरह के रिश्तों के दावे लोगों को न भ्रष्ट बनने से रोकते, न जुर्म करने से। समाज के सबसे गरीब के खाने-पीने के हक को छीनकर अपना घर भरने वाले सत्ता पर बैठे लोग अगर इतने संगठित हैं, तो उन पर यह कानूनी रोक लगनी चाहिए कि वे किसी को बहन-बेटी न बुला सकें। एक तरफ तो शिवराज सिंह चौहान आए दिन लड़कियों के भलाई के नाम पर तरह-तरह की योजनाएं शुरू करते हैं, कहीं वे लाड़ली लक्ष्मी योजना चलाते हैं तो कहीं बेटी बचाओ अभियान। अब कुपोषण के शिकार मां-बेटी ऐसे में कैसे बचेंगी अगर उन्हें ‘पहुंचायाÓ गया फायदा खुद सत्ता की जेबों में पहुंचे। और दिलचस्प बात यह भी है कि इस विभाग के मंत्री अभी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान खुद ही हैं।
हिन्दुस्तान जैसे लोकतंत्र में भ्रष्टाचार पर सजा के पैमाने तय करते समय यह भी ध्यान रखना चाहिए कि कितने कमजोर पर कितने ताकतवर का भ्रष्टाचार हो रहा है। अगर रोजी का कोई मजदूर किसी मंत्री या अफसर के बंगले से कुछ चुरा ले तो उसकी सजा बहुत मामूली हो सकती है। लेकिन अगर समाज के सबसे कमजोर तबके की बुनियादी जरूरतों को मंत्री-अफसर, और ठेकेदार जालसाजी से चुरा रहे हैं, तो इसकी सजा भी बहुत बड़ी होनी चाहिए, और इसके जुर्माने की शक्ल में इनकी दौलत भी छीनी जानी चाहिए। एक सरीखी सजा ऐसे मामलों मेें कोई इंसाफ नहीं हो सकती। जब तक ऐसे मामले की पूरी जांच नहीं हो जाती, विभाग के प्रभारी मंत्री को खुद होकर इस विभाग को छोड़ देना चाहिए, लेकिन इस किस्म का आदर्श हिन्दुस्तान में दिखना अब मुमकिन नहीं दिखता है।

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