इराक में  राजनैतिक अराजकता और हिंसा..

इराक एक बार फिर राजनैतिक अस्थिरता और हिंसा के मुहाने पर आकर खड़ा हो गया है। सोमवार को इराक के प्रभावशाली नेता और शिया धर्मगुरु मुक्तदा अल सदर ने जब ये ऐलान किया कि वे राजनीति छोड़ेंगे हालांकि उनके आंदोलन से जुड़े मजहबी संस्थान खुले रहेंगे तो उनके समर्थक सड़कों पर उतर आए। अमूमन ऐसा होता है कि अपने नेता की हार, उसे गलत तरीके से सत्ता से हटाने या उसके साथ हुए किसी किस्म के अन्याय के बाद उसके अनुयायी विरोध और हिंसा पर उतारू होते हैं। लेकिन इराक में अपने नेता के लिए समर्थन और समर्पण की एक नयी किस्म की मिसाल पेश की जा रही हैं। ऐसा क्यों हो रहा है, इसकी असल वजह शायद बाद में सामने आए। फिलहाल तो यही समझ आ रहा है कि मुक्तदा अल सदर के अनुयायी अब खुद को अकेला और दिशाहीन मान रहे हैं और इस बौखलाहट में वे सड़कों पर उतर आए हैं।

मुक्तदा अल सदर ने इऱाक की राजनीति में इस निर्णायक भूमिका तक पहुंचने के लिए लंबा सफर तय किया है। उनके पिता मोहम्मद सादिक और ससुर मोहम्मद बाकिर दोनों इराक के प्रभावशाली धर्मगुरु थे। दोनों को ही सद्दाम हुसैन ने मार डाला था। 2003 में जब अमेरिका ने सद्दाम हुसैन को फांसी पर लटका दिया उसके बाद मुक्तदा अल सदर ने अल सदरिस्ट आंदोलन की शुरुआत की, जिसमें हजारों लोग उनके साथ जुड़े। अपने आंदोलन में उन्होंने एक सेना भी खड़ी की, पहले इसका नाम जैश अल-मेहदी या मेहदी की सेना था, बाद में इसे बदलकर सरया अल-सलाम यानी शांति ब्रिगेड कर दिया गया।

बेरोज़गारी, बिजली कटौती और भ्रष्टाचार के मुद्दों पर उन्होंने आम जनता के बड़े वर्ग को अपने साथ जोड़ लिया। इसका नतीजा इराक के चुनावों में नजर आया। अक्टूबर 2021 में हुए संसदीय चुनाव में उनकी पार्टी 73 सीटों के साथ सबसे आगे रही थी, लेकिन, 329 सीटों वाली इराक़ी संसद में सरकार बनाने के लिए 165 सीटें होना ज़रूरी है। और मौलाना सदर ने अन्य दलों के साथ काम करने से इनकार कर दिया, इस कारण गठबंधन सरकार का गठन नहीं हो सका और फिलहाल देश की कमान निवर्तमान प्रधानमंत्री मुस्तफ़ा अल-कदीमी की सरकार के हाथों में है। इराक में पिछले 10 महीनों से न कोई राष्ट्राध्यक्ष है, न कोई मंत्रिमंडल। 2010 में भी इराक़ में ऐसी ही स्थिति बनी थी जब 289 दिनों के गतिरोध के बाद नूरी अल मलिकी दूसरी बार प्रधानमंत्री बने थे। लेकिन तब इस तरह की स्थिति नहीं बनी थी।

इस बार विरोधी का विरोध न होकर, समर्थन में विरोध का माहौल बना है, जो शायद एक तरह से मौलाना सदर का शक्ति परीक्षण है। सवाल ये है कि ये परीक्षण करवा कौन रहा है। क्या खुद मौलाना सदर इसके पीछे हैं या फिर किसी और तरह की अंतरराष्ट्रीय दखलंदाजी का रास्ता तैयार हो रहा है। गौरतलब है कि मुक्तदा सदर ईरान के विरोधी हैं, वे सद्दाम हुसैन के भी विरोधी रहे हैं, लेकिन अमेरिका के समर्थक वो नहीं हैं। 2003 में एक टीवी इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, ‘सद्दाम एक छोटा नाग था, लेकिन अमेरिका एक बड़ा नाग है।’ दुनिया ने देखा है कि उस वक्त किस तरह विनाशकारी हथियारों की तलाशी और बरामदगी के नाम पर अमेरिका ने इराक पर हमला किया था, सद्दाम हुसैन को इस के बाद मार डाला गया था।

दूसरे देशों में अमेरिका की दखलंदाजी की साजिश से एक बार फिर पर्दा उठा था। हालांकि इराक को अमेरिका इसके बाद भी अपने तरह से नहीं चला सका। मुक्तदा सदर जैसे सद्दाम हुसैन के विरोधी इराक में मजबूत हुए, लेकिन वे अमेरिका के पिठ्ठू नहीं बने। इराक़ के घरेलू मामलों में अमेरिका और ईरान का दख़ल ख़त्म करने के लिए उन्होंने ख़ुद को राष्ट्रवादी नेता के तौर पर पेश किया और जनता ने उनका साथ भी दिया। उनका जनता पर प्रभाव इतना है कि उनके आह्वान पर हजारों लोग सड़क पर आ सकते हैं और लौटने का आदेश देने पर लौट भी सकते हैं। इसका एक नमूना इसी जुलाई में देखने मिला था, जब उनके समर्थक संसद भवन में घुस गए थे। और जब मुक्तदा अल सदर ने अपील की कि वे सुरक्षित घर लौट जाएं, तो लोग लौट भी गए। लेकिन अब खुद मुक्तदा अल सदर ने कहा कि, ”मैंने पहले ही राजनीतिक मामलों में दख़ल न देने का फ़ैसला लिया था, लेकिन अब मैं अपने रिटायरमेंट और सदर समर्थक आंदोलन से जुड़े सभी संस्थानों को बंद करने का ऐलान करता हूं।” इसके बाद ही इराक में कई शहरों में हिंसा भड़क उठी है। बताया जा रहा है कि उनकी शांति ब्रिगेड और इराक की सेना के बीच संघर्ष हो रहा है, जिसमें कम से कम 20 लोग मारे जा चुके हैं और कई घायल हुए हैं।

हालात की गंभीरता को देखते हुए अंतरिम प्रधानमंत्री मुस्तफा अल-कदीमी ने मुक्तदा अल सदर से हिंसा रोकने के लिए दखल देने कहा, जिसके बाद मुक़्तदा अल-सद्र ने हिंसा रुकने और हथियारों के इस्तेमाल थमने तक उपवास करने का ऐलान किया है। उन्होंने अपने समर्थकों को संसद भवन के बाहर धरने से उठने और हिंसा रोकने के लिए 60 मिनट का वक्त देते हुए कहा कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो वे समर्थकों औऱ पार्टी दोनों को छोड़ देंगे। उनकी इस अपील का असर क्या पहले की तरह होता है, इसका पता जल्द ही चल जाएगा। लेकिन इराक एक बार फिर जिस तरह राजनैतिक उथल-पुथल के दौर में पहुंच गया है, वह न केवल इराकी जनता बल्कि समूची दुनिया के लिए चिंता की बात है। दुनिया के कई देशों में इस तरह की हिंसापूर्ण घटनाएं हो रही हैं और सरकारें अस्थिर हो रही हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ ऐसे हरेक मामले पर चिंता तो जाहिर करता है, लेकिन उसका कोई प्रभाव नजर नहीं आ रहा है। शांति और स्थिरता के समर्थक सभी नेताओं और देशों को अब इस पर विचार करना चाहिए कि आखिर ऐसी उथल-पुथल से फायदा किसे होता है और कौन सी ताकतें इन राजनैतिक हलचलों के पीछे हैं।

रहा सवाल इराक का, तो उम्मीद की जानी चाहिए कि मुक्तदा अल सदर अपने प्रभाव और ताकत का उपयोग इराक में शांति बहाली के लिए करेंगे।

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