गुलामनबी आजाद को छोड़ें, लेकिन उनके उठाए मुद्दे नहीं..

-सुनील कुमार।।

लेकिन फिलहाल हम गुलाम नबी आजाद नाम के इंसान से परे, उनकी कही हुई बातों पर चर्चा करना चाहते हैं जो कि महज उनके दिमाग में ही नहीं है, बहुतों के दिमाग में है। दो बरस पहले जिस तरह कांग्रेस के 23 प्रमुख नेताओं के, जी-23 समूह ने सोनिया गांधी को एक चिट्टी लिखकर पार्टी की दशा और दिशा पर सवाल खड़े किए थे, कुछ मांगें रखी थीं, और कुछ सलाह दी थी, उसमें आजाद अकेले नहीं थे। उस चिट्ठी में दस्तखत करने वाले लोगों मेें से दो-चार अब पार्टी में नहीं हैं, और एक-दो शायद पार्टी के पदाधिकारी बना दिए गए हैं, लेकिन उस चिट्ठी पर अफसोस जाहिर करने वाले भी कोई नहीं है। जिन्होंने उसे लिखा था वे उसके साथ कायम हैं। उस चिट्ठी पर उस वक्त इसी जगह पर लिखना हो चुका था, इसलिए आज उसे दुहराने के बजाय आज गुलाम नबी आजाद के उठाए गए मुद्दों पर चर्चा की जानी चाहिए। इन मुद्दों पर चर्चा आजाद के किसी हक को लेकर नहीं होनी चाहिए, बल्कि कांग्रेस पार्टी के भले के लिए बात होनी चाहिए। और ईमानदारी की बात तो यह है कि पिछले लोकसभा चुनाव को हारने के बाद राहुल गांधी ने जिस तरह पार्टी और अपने खुद के भले के लिए अध्यक्ष पद छोड़ा था, और उनके परिवार से बाहर के किसी को अध्यक्ष बनाने की मांग की थी, उस पर पार्टी के ही बहुत से चापलूस नेताओं ने अमल नहीं होने दिया। उसका नतीजा आगे देखने मिला जब कांग्रेस ने एक-एक करके तकरीबन तमाम राज्य खो दिए, और अपनी बुनियाद, उत्तरप्रदेश में तो अब उसका नामलेवा भी नहीं दिखता है। ऐसी नौबत में भी अगर आज आधी सदी पार्टी में गुजारने वाले, छोड़क़र जा रहे एक नेता के उठाए मुद्दों को अगर उसके नाम की तख्ती सहित कचरे की टोकरी में डाल दिया जाएगा, तो पार्टी को न अपने भविष्य की फिक्र है, न ही अपने वर्तमान की।

गुलाम नबी आजाद ने जो लिखा है, वह बात कांग्रेस के बड़े-बड़े नेता बंद कमरों में करते हैं, और जब उन्हें घुटन अधिक होती है, किसी दूसरी पार्टी में संभावना अधिक दिखती है, तो वे वहां भी चले जाते हैं। भारत की आज की राजनीति में इस आवाजाही में कुछ भी अटपटा नहीं है, और हो सकता है कि कांग्रेस से अभी लोगों का जाना जारी भी रहे। इसलिए भी इस पार्टी को अपने बचे हुए जनाधार, बचे हुए नेताओं, बची हुई इज्जत, और बची हुई संभावना की फिक्र करते हुए आजाद की लिखी बातों पर सोचना चाहिए। यह कहते हुए हम पल भर के लिए भी यह नहीं मानते कि कांग्रेस के भीतर के जिस चापलूस और चाटुकार गिरोह का आजाद ने विरोध किया है, वे खुद भी संजय गांधी के वक्त से ऐसे ही गिरोह के सदस्य नहीं थे। लेकिन पार्टी छोड़ते वक्त श्मशान वैराग्य की तरह, या कि निकलते हुए चेहरा छुपाने के लिए तोहमतों का जो नकाब उन्होंने ओढ़ा है, उस पर चर्चा कांग्रेस को अपने भले के लिए करनी चाहिए, गुलाम नबी आजाद तो अपने भले की फिक्र खुद कर लेंगे।

उन्होंने चिट्टी में लिखा है कि कांग्रेस आज अपरिपक्व लोगों के हाथों में है, और इसकी सबसे बड़ी मिसाल है कि राहुल गांधी ने मीडिया के सामने (मनमोहन सिंह सरकार के) एक सरकारी अध्यादेश को फाडक़र फेंका था, जिसे कि कांग्रेस के अनुभवी नेताओं ने गहन विचार-विमर्श करके तैयार किया था। उन्होंने इस हरकत को बचकाना करार देते हुए कहा- इस हरकत की वजह से प्रधानमंत्री और भारत सरकार की गरिमा को भारी ठेस पहुंची। आजाद की लिखी हुई यह बात थोड़ी सी अधूरी भी है। वह अध्यादेश अकेले कांग्रेस पार्टी का नहीं था, वह यूपीए मंत्रिमंडल द्वारा मंजूर था जिसमें दूसरी पार्टियां भी शामिल थीं, और किसी भी एक पार्टी के किसी भी नेता को उसे फाडक़र फेंकने का हक नहीं था, जिसके बाद कि उसकी इस मनमानी को सरकार को मानना भी पड़ा था। यह पूरे गठबंधन का अपमान था।

लोगों को यह याद रहना चाहिए कि 2019 का आम चुनाव हारने के बाद जब कांग्रेस पार्टी के भीतर एक चिंतन शिविर करने की बात उठी, तो राजस्थान में मई के महीने में हुए इस आयोजन में उसका नाम ही बदलकर नवसंकल्प चिंतन शिविर कर दिया गया था। जरूरत चिंतन की थी, लेकिन आयोजन को नवसंकल्प का मौका बना दिया गया था, उसमें हारे हुए चुनाव के बारे में कोई भी चर्चा नहीं हुई थी, बस आगे क्या-क्या करना है वही बात हुई थी। लोगों को यह भी याद होगा कि उसमें राहुल गांधी ने बिना किसी प्रसंग के क्षेत्रीय पार्टियों के खिलाफ बहुत कुछ कहा था, और उससे कांग्रेस के साथीदल हक्का-बक्का भी रह गए थे।

गुलाम नबी आजाद ने साफ-साफ लिखा है कि सोनिया गांधी महज नाम की अध्यक्ष हैं, और सारे महत्वपूर्ण फैसले राहुल गांधी कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि जब पार्टी के 22 बड़े नेताओं ने पार्टी की बदहाली की तरफ सोनिया गांधी का ध्यान खींचने के लिए चिट्ठी लिखी, तो चाटुकारों की मंडली ने उन पर हमला बोला, उन्हें विलेन बनाने की कोशिश की, बहुत बुरी तरह अपमानित किया गया, इन्हीं के इशारे पर जम्मू में उनका जनाजा निकाला गया, और जिन लोगों ने यह काम किया उनकी तारीफ पार्टी के महासचिवों और राहुल गांधी ने की। उन्होंने गांधी परिवार के लिए कानूनी मामले लडऩे वाले पार्टी के एक बहुत पुराने और वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल पर भी चापलूसों द्वारा हमला करने का जिक्र चिट्ठी में किया है। उन्होंने यह भी लिखा है कि यह दुर्दशा इसलिए हुई क्योंकि पार्टी के ऊपर एक ऐसे आदमी (राहुल गांधी) को थोप दिया गया है जो गंभीर नहीं है।

इन बातों को गुलाम नबी आजाद के दस्तखत से हटाकर देखें, तो इनमें कुछ भी नाजायज और अटपटा नहीं है। कांग्रेस पार्टी अगर यह कहती है कि वह ऐतिहासिक चुनौती से गुजर रही है, गरीबों के लिए लड़ रही है, साम्प्रदायिकता और तानाशाही के खिलाफ लड़ रही है, और ऐसे में पार्टी छोडक़र जाना इन तमाम सिद्धांतों से गद्दारी है, तो पार्टी को यह भी सोचना चाहिए कि ऐसी ‘गद्दारी’ की नौबत न आने देने के लिए उसने क्या किया है? जी-23 नेताओं ने पार्टी को जो चिट्ठी लिखी उसकी तकरीबन तमाम ही जायज बातों में से किस पर कुछ किया गया? अभी-अभी एक अलग इंटरव्यू में कांग्रेस के एक और बड़े नेता पृथ्वीराज चव्हाण ने कहा कि उन्हें कई सालों से राहुल गांधी से मिलने का समय नहीं मिल पाया है। कुछ ऐसी ही बात पंजाब के मुख्यमंत्री रहे कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कही थी। अब अगर बिना किसी ओहदे पर रहते हुए अगर पार्टी के तमाम फैसले राहुल गांधी ही कर रहे हैं, और वे बरसों तक पार्टी के बड़े नेताओं को मिलने का समय भी नहीं दे रहे हैं, वे नियमित रूप से अनियमित रहने वाले पार्टी नेता हैं, तो ऐसे में कोई किस उम्मीद से इस कांग्रेस में रह सकते हैं? आज भारत की चुनावी राजनीति ओवरटाईम करने वाले मोदी-शाह के मुकाबले की है, और यह राजनीति पार्टटाईम काम से नहीं चल सकती है।

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