खाद का राजनैतिक प्रचार..

भारत में सत्ता की फसल हासिल करने के लिए धर्म, जाति, महंगाई, भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों को खाद की तरह राजनीति में इस्तेमाल किया जाता रहा है। लेकिन अब शायद वो वक्त आ गया है जब असली खाद का राजनीतिकरण होगा। ‘एक राष्ट्र एक उर्वरक’ की अवधारणा को मूर्तरूप देते हुए उर्वरक मंत्रालय भारत सरकार ने सभी उर्वरक कम्पनियों को आदेश जारी किया है कि किसानों को सारे उर्वरक अब एक ही नाम से बेचे जाएंगे। उर्वरक पर सब्सिडी योजना अब प्रधानमंत्री भारतीय जनउर्वरक परियोजना (पीएमबीजेपी) के नाम से जानी जाएगी।

किसानों को यूरिया, डीएपी, एनपीके, एमओपी जैसे सब्सिडी में मिलने वाले सभी उर्वरक भारत ब्राण्ड के ही मिलेंगे, चाहे वे किसी भी कंपनी के हों। सरकार के मुताबिक देश भर के लाखों किसानों द्वारा खरीदी जाने वाली खाद की बोरियों पर एक ही तरह का नया प्रतीक चिह्न यानी लोगो और डिजाइन होगा। उर्वरक कंपनियों को अपनी पैकेजिंग में नया नाम प्रमुखता से प्रदर्शित करना होगा। नए पैकेजिंग मानकों के अनुसार, एक खाद बैग के सबसे ऊपर आधे हिस्से पर दो-तिहाई जगह का इस्तेमाल प्रधानमंत्री की योजना के रूप में सब्सिडी कार्यक्रम को बताने के लिए होगा। हो सकता है इसमें प्रधानमंत्री का फोटो भी दिखे। उर्वरक कंपनियां शेष जगह का इस्तेमाल अपने लोगो और ब्रांडिंग के साथ उत्पाद की जानकारी के लिए इस्तेमाल कर सकती हैं। लेकिन कंपनी का नाम बहुत छोटा करके दिया जाएगा।

कृषि प्रधान भारत में खेती के काम को अब अभिजात्य, शहरी, संपन्न तबका हिकारत से देखता है। इसी वजह से करोड़ों किसानों को बदहाली में जीवन बिताना पड़ता है। किसानों की आत्महत्याएं संपन्न तबके को विचलित नहीं करती। उनकी गरीबी और कर्ज के बोझ तले जीवन का दर्द शहरों से नजर नहीं आता। किसान अगर शहर आ जाएं, तो शहरी लोग अपनी आवाजाही में असुविधा की शिकायत करने लगते हैं, इसके उदाहरण किसान आंदोलन के वक्त देश ने देखे हैं।

लेकिन जब इन किसानों को वोट में तब्दील करने का वक्त आता है, तो फिर किसानों की भलाई के दावे किए जाने लगते हैं। हर चुनाव में राजनैतिक दलों के घोषणापत्रों में किसानों का ऋणमाफ या सिंचाई सुविधाओं और खाद पर सब्सिडी बढ़ाने जैसे वादे किए जाते हैं। सारी घोषणाओं और वादों के बावजूद किसानों के जीवन स्तर में कोई क्रांतिकारी सुधार देखने नहीं मिला है। फिर भी भारतीय राजनीति में खेती और किसान हमेशा से प्रमुख मुद्दा रहे हैं। कई दलों के चुनाव चिह्न और नाम भी खेती से ही जुड़े हैं। किसानों पर चल रही इस राजनीति के सिलसिले में अब खाद पर भी राजनीति शुरु हो गई है।

गौरतलब है कि भारत में लगभग 8 अरब रुपयों का उर्वरक बाजार है। कई निजी और सरकारी कंपनियां उर्वरक बनाती हैं, जिन्हें आम बोलचाल में खाद कहा जाता है। नाइट्रोजन युक्त और फास्फेट आधारित उर्वरक बनाने के 56 बड़े कारखाने हैं, जबकि 75 मध्यम और लघु इकाइयां ऐसे ही उर्वरक बनाती हैं। डाइ-अमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) जैसे प्रमुख उर्वरक की भारत में काफी मांग है और इसकी पूर्ति के लिए इसे काफी आयात भी करना पड़ता है। भारत यूरिया और डीएपी का दुनिया का सबसे बड़ा खरीदार है। अच्छी फसल के लिए ऐसी खादों की जरूरत पड़ती ही है और चूंकि इनकी कीमतों का खर्च किसान वहन नहीं कर सकते, इसलिए किसानों को खाद में सब्सिडी दी जाती है और ये सिलसिला आजादी के वक्त से चल रहा है।

भारत ने जब आजादी हासिल की थी, तब एकदम से खाद की जरूरत को पूरा करने के लिए तत्कालीन नेहरू सरकार ने आयात का फैसला लिया और किसानों को इस पर सब्सिडी दी। इसके बाद देश में अपने उर्वरक संयंत्र स्थापित हुए, लेकिन सब्सिडी का सिलसिला बदस्तूर जारी रहा। नेहरूजी के बाद जितने भी प्रधानमंत्री आए, सभी ने खाद सब्सिडी को राजनीति से दूर रखा। खुद प्रधानमंत्री मोदी ने 2014 से 2019 तक सब्सिडी योजना पर अपनी सरकार का प्रचार नहीं किया।

2019 से लेकर 2021 तक भी ऐसा कोई फैसला नहीं हुआ। लेकिन अब अपने दूसरे कार्यकाल के उत्तरार्द्ध में केंद्र की एनडीए सरकार ने फैसला लिया है कि तमाम तरह की उर्वरकों की बोरियों पर प्रधानमंत्री योजना का लोगो दिखाया जाएगा। एक देश-एक उर्वरक का नया मंत्र अब कृषि के क्षेत्र में आ गया है। हालांकि विविधताओं से भरे भारत में खेती भी विविधता वाली होती है। खेती के तरीकों से लेकर फसलों तक कई किस्में मौजूद हैं और हर फसल, हर खेती के लिए अलग तरह से सिंचाई और खाद की जरूरत है। इसलिए इसमें व्यावहारिक तौर पर किसी तरह की एकरूपता का ख्याल ही बेतुका है। लेकिन राष्ट्रवाद की इस नयी लहर में देश में हर बात एक जैसी करने की मुहिम छेड़ी जा चुकी है, जो अब खेती तक पहुंच गई है।

किसानों को अच्छी गुणवत्ता की खाद और उस पर सब्सिडी की जरूरत है, जिसे मुहैया कराना सरकार का दायित्व है। किसान को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसे यह सब किस नाम से दिया जा रहा है। लेकिन उर्वरक कंपनियों को इस बात से काफी फर्क पड़ सकता है कि उनके ब्रांड का नाम एक सीमित जगह पर आ जाएगा और बाकी जगह पर सरकार की योजना का प्रचार होगा। अब तक खाद निर्माता कंपनियां किसानों के बीच अपनी पैठ बढ़ाने के लिए कई तरह की गतिविधियां करती थीं, लेकिन अब उन्हें अपने प्रचार के लिए नए तरीके तलाशने होंगे, क्योंकि अब उनका मुकाबला सरकार के प्रचार से होगा। उर्वरक कंपनियां सरकार की इस नयी पहल पर किस तरह की प्रतिक्रिया देती हैं, देश के कृषि बाजार पर इसका क्या असर होगा और सबसे बड़ी बात 2024 के आम चुनाव से पहले खाद पर सब्सिडी का राजनैतिक इस्तेमाल सत्तारुढ़ दल को कितना फायदा पहुंचाएगा, ये देखना होगा।

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