इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को नहीं है लोकपाल बिल के समर्थन का नैतिक अधिकारः मार्कंडेय काट्जू

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टाइम्स नाउ पर 100 करोड़ का जुर्माना नहीं है वाज़िब” -मार्कंडेय काट्जू

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के स्व नियामक यानि खुद ही अपने आप पर नियंत्रण के तंत्र को मानने से इनकार करते हुए भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष न्यायमूर्ति मार्कंडेय काट्जू ने जोर दिया है कि इसे निश्चित तौर पर किसी नियामक के तहत आना चाहिए। काट्जू ने कहा कि अगर टेलीविजन चैनल प्रेस परिषद के तहत नहीं आना चाहते तो उन्हें प्रस्तावित लोकपाल जैसी किसी अन्य संस्था को चुनना चाहिए।

‘‘…आप बताएं कि आप किस नियामक प्राधिकार के तहत आना चाहते हैं क्योंकि आप भारतीय प्रेस परिषद को पसंद नहीं करते क्योंकि मौजूदा अध्यक्ष बेहद अवांछित और बुरा व्यक्ति है। आप बता सकते हैं कि लोकपाल जैसे किस नियामक निकाय के तहत आप आना चाहते हैं।’’ काट्जू ने राष्ट्रीय प्रेस दिवस पर ‘लोक जवाबदेही के औजार के रूप में मीडिया’ विषय पर एक परिचर्चा में ये बातें कहीं।
न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) काट्जू ने कहा कि अगर मीडिया कहता है कि वह आत्म नियमन करेगा तो वही सिद्धांत नेताओं और नौकरशाहों पर भी लागू हो सकता है। काट्जू ने कहा, ‘‘कोई नियामक तंत्र होना चाहिए। आप यह नहीं कह सकते कि आत्म नियमन होगा। उसका मतलब कुछ भी नहीं होता। आप ही एकमात्र संत हैं और बाकी सब पापी हैं। तब ये पेड न्यूज क्या है, (नीरा) राडिया टेप क्या है और यह सब क्या है?’’
उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश ने हालांकि यह स्पष्ट किया कि वह मीडिया के खिलाफ कठोर कदमों के इस्तेमाल के खिलाफ हैं। उन्होंने टाइम्स नाउ पर लगे 100 करोड़ के जुर्माने का जिक्र करते हुए कहा कि यह ठीक नहीं है।

गौरतलब है कि  देश के सबसे बड़े अंग्रेज़ी अखबार टाइम्स आफ इंडिया समूह से जुड़े चैनल टाइम्स नाऊ पर 100 करोड़ का जो जुर्माना निचली अदालत ने किया था उसे हाईकोर्ट ने बरकरार रखा है। बार बार माफी मांगने के बाद भी उनके ऊपर एक गलत फोटो दिखाने के आरोप में ट्रायल कोर्ट ने एक सौ करोड़ रूपये का जुर्माना ठोंक दिया था। चैनल वालों ने जब हाई कोर्ट में अपील की पेशकश की तो माननीय हाईकोर्ट ने कहा कि आप बीस करोड़ रूपया जमा कर दीजिये और अस्सी करोड़ रूपये के लिए गारंटी दे दीजिये तब अपील ली जायेगी। अब टाइम्स ग्रुप सुप्रीम कोर्ट गया हैं।

विष्फोट के मुताबिक यह केस बहुत ही दिलचस्प है। 2008 में किसी खबर के सन्दर्भ में सुप्रीम के कोर्ट के एक रिटायर्ड जज साहब की गलत तस्वीर लग गयी थी। यह तस्वीर 10-15 सेकण्ड ऑन एयर रही। गलती का एहसास तुरंत ही हो गया था। चैनल वालों ने माफी मांगना शुरू कर दिया और तीन चार दिन तक माफी मांगते रहे, फिर भी मुक़दमा हो गया था। ट्रायल कोर्ट ने माफी वाली बात को स्वीकार नहीं किया और एक सौ करोड़ रूपये का जुर्माना कर दिया। अपील के लिए जब हाई कोर्ट गए तब पता चला कि बीस करोड़ रूपये जमा करना पडेगा।

ज़ाहिर है कि कोई भी मीडिया कंपनी इतनी बड़ी रक़म जमा नहीं करेगी। वैसे भी मामला देश की सर्वोच्च अदालत तक जाना ही है तो पैसे जमा करने वाली बात बहुत समझ में नहीं आती। लेकिन यह सच्चाई है और इसका समाज के हर स्तर पर विवेचन किये जाने की ज़रुरत है। जहां तक अंग्रेज़ी न्यूज़ चैनल का प्रश्न है, उसको पास तो इतना जमा करने के लिए रक़म होगी  ही लेकिन अगर किसी छोटे अखबार या न्यूज़ चैनल  के ऊपर गलती और उसकी बाद माफी मांगने के बाद यह सज़ा होगी तो मीडिया की स्वतंत्रता को ख़त्म होने से कोई नहीं रोक सकता।

पत्रकारिता के क्षेत्र में काम करने वालों को यह मालूम रहता है कि अगर गलती हुई तो मानहानि के मुक़दमे दायर होंगें। इसीलिये हर ईमानदार पत्रकार कोशिश करता है कि गलती न हो और अगर गलती हो जाए तो फ़ौरन माफी मांग ली जाए। देश के लगभग सभी बड़े मीडिया संस्थाओं से गलती हो चुकी है और जब गलती के लिए माफी मांग ली जाती है तो आमतौर पर पीड़ित पक्ष मुक़दमे नहीं दायर करता है।

अगर किसी ने मुक़दमा दायर कर भी दिया तो दो बातें होती हैं। या तो अदालत मीडिया  संस्थान की माफी को स्वीकार कर लेती है और फैसला कर देती है। अगर गलत सूचना के तुरंत  बाद माफी नहीं माँगी गयी है तो कोर्ट का फैसला आ जाता है कि जिस प्रमुखता से खबर को प्रकाशित और प्रचारित किया गया था, उसी प्रमुखता से गलत खबर के लिए माफी माँगी जाए।लेकिन अगर मीडिया हाउस ऐसा नहीं करता तो उसके ऊपर जुर्माना होता है।  जैसा कि जस्टिस काट्जू भी मानते हैं कि जब चैनल ने माफी भी मांग ली तो अब उसे किस बात के लिए दंड का भागीदार बनाया जा रहा है?

 

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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