बुलडोजर के मुकाबिल लेखनी

शीश झुकाने को कहते हैं क्या कह दें।
पैर दबाने को कहते हैं क्या कह दें।।
फेंक रहे हैं जाल प्रलोभन का हम पर,
आग लगाने को कहते हैं क्या कह दें।
मर कर और मार कर बेबस लोगों को,
धर्म बचाने को कहते हैं क्या कह दें।

या फिर

ग़रीबों का बजट है या कसाई का गंडासा है।
सभी की गर्दनें काटीं हताशा ही हताशा है।।
बड़ी उम्मीद थी इनसे मिलेंगी सब्ज सुविधाएं,
मगर इन जेबकतरों से मिली ख़ाली निराशा है।
रियायत दी गई सारी बड़े उद्योगपतियों को,
बजट में प्यार उन पर ही लुटाया बेतहाशा है।।

सरल भाषा में देश की, आम आदमी की तकलीफों और सत्ता की चालाकियों की पोल खोल कर रख देने वाली ऐसी कई रचनाओं के रचनाकार महेश कटारे सुगम पर अब प्रशासन की नजरें टेढ़ी हो गई हैं। मध्यप्रदेश के बीना शहर की नगरपालिका ने हिंदी और बुंदेली के लोकप्रिय कवि महेश कटारे सुगम के मकान को तोड़ने का नोटिस दिया है। बीना में चंद्रशेखर वार्ड नंबर 7 की माथुर कॉलोनी में 2011 से महेश जी अपने परिवार के साथ रह रहे हैं। लेकिन अचानक 11 साल बाद 4 अगस्त, 2022 को उनके बेटे प्रभात कटारे के नाम से एक नोटिस नगरपालिका की ओर से मिलता है कि उनका मकान अवैध तरीके से बना है। इसके लिए उन्हें नगरपालिका अधिनियम 1961 की धारा 187 (8) के अंतर्गत दण्डनीय अपराध करार देते हुए पेश होने का हुकुम जारी किया गया।

नोटिस में कहा गया कि श्री कटारे घर से जुड़े सारे जरूरी कागजात पेश करें, अन्यथा उनके मकान को ढहा दिया जाएगा और इसका खर्च भी उन्हीं से वसूला जाएगा। इस बारे में महेश कटारे सुगम ने बताया कि यह मकान उनकी पत्नी मीरा कटारे के नाम पर है। और 2011 में उन्होंने इस मकान को बनाने के लिए नगरपालिका से अनापत्ति प्रमाणपत्र लिया था, उनके मकान का नक्शा पारित हुआ था और तब से अब तक वे नगरपालिका को सारी कर अदायगी भी कर रहे हैं। तो सवाल ये है कि जब मकान मीरा कटारे के नाम पर है, तो फिर प्रभात कटारे के नाम से नोटिस क्यों आया। जब नगरपालिका ने पिछले 11 सालों से सारे कर वसूले हैं, तो क्या यह वसूली अवैध थी। क्योंकि अब नगरपालिका उसी मकान को अवैध बता रही है। वैसे इन सवालों का एक ही जवाब है कि महेशजी की रचनाओं और सत्ता के दबाव में आए बिना खरी-खरी लिखने वाली उनकी आदत नगरपालिका को चुभने लगी थी।

बकौल महेश कटारे माथुर कॉलोनी में हजार से अधिक मकान अवैध तरीके से बने हैं। उनका अपना मकान जब 2011 में बन कर तैयार हुआ, तो उन्होंने नगरपालिका में सड़क, बिजली, पानी, नाली जैसी बुनियादी सुविधाओं को दुरुस्त करने के लिए एक शिकायती पत्र भेजा और जनता के समर्थन से नगरपालिका सो रही भैया, बीना नगरी रो रही भैया जैसी पंक्तियां लिखीं, जो शायद अधिकारियों को खटक गई। श्री कटारे ने सीएम हेल्पलाइन और स्थानीय अधिकारियों तक अपनी शिकायतें पहुंचाईं। उनके मुताबिक नगरपालिका से एक अधिकारी उनके पास गया था और उनसे काम पूरा करने के वादे के साथ शिकायत वापस लेने कहा था। महेश कटारे ने जिस दिन अपनी शिकायत वापस ली, उसके अगले ही दिन नगरपालिका का नोटिस उन तक पहुंच गया।

उत्तरप्रदेश की राह पर चलते हुए मध्यप्रदेश भी प्रशासन की भुजाएं बुलडोजर का दम दिखाने के लिए फड़क रही हैं। पिछले कुछ महीनों में सीधी कार्रवाई के नाम पर बुलडोजर चलते लोगों ने देखा है। लेकिन अब बुलडोजर को उस जनकवि की दिशा में मोड़ दिया गया है, जिस की पैनी लेखनी से अक्सर सत्ता के नापाक इरादों की परत जनता के सामने उतर चुकी है।

हिंदी अकादमी सम्मान, जनकवि मुकुट बिहारी सरोज स्मृति सम्मान ग्वालियर, सहभाषा सम्मान दिल्ली, दुष्यंत कुमार सम्मान भोपाल, नागार्जुन- आलोक स्मृति सम्मान गया बिहार, आर्य स्मृति सम्मान किताबघर दिल्ली, कमलेश्वर कथा स्मृति सम्मान मुम्बई, लोक साहित्य अलंकरण जबलपुर, मान बहादुर लहक सम्मान आदि अनेक सम्मानों से सम्मानित और 31 संकलनों के रचयिता के साथ ऐसे व्यवहार से लेखक बिरादरी में काफी आक्रोश देखा जा रहा है। यह आक्रोश जरूरी तो है ही, आत्मविश्लेषण का मौका भी इसमें छिपा है कि लेखनी को हथियार बताने वाले लोग सोचें कि उनके एक सहयात्री के साथ ऐसा व्यवहार क्यों किया गया। अगर वाकई कुछ गैरकानूनी हुआ है, तो फिर कानून की नजर में सब समान हैं, वाला सिद्धांत लगाते हुए नोटिस देने पर कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। लेकिन इस मामले में सत्ता की आलोचना का असर नजर आ रहा है।

सफदर हाशमी, अवतार सिंह संधू पाश अपनी रचनाधर्मिता के कारण हत्यारों का निशाना बने। परसाईजी पर संकीर्ण मानसिकता के लोगों ने हमला किया। अब लोगों को खबरदार करने वाले एक कवि के साथ नोटिस और ध्वस्तीकरण का खेल खेला जा रहा है। ऐसी घटनाएं तब तक नहीं रुकेंगी, जब तक जनता खुद अपने पक्षधर साहित्यकारों के साथ खड़ी दिखाई नहीं देगी। बेशक साहित्य समाज का आईना है, लेकिन जनता भी कभी उस आईने में झांकने की कोशिश करे और खुद फर्क देखे कि कौन सी लेखनी उसकी पीड़ा को मुखर कर रही है और कौन सी लेखनी चाटुकारिता की स्याही में डूबी हुई है। जब जनता साहित्य और साहित्यकारों के सम्मान के लिए जागरुक रहेगी तो सत्ता को भी सावधान होना ही पड़ेगा।

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