राहुल गांधी का जज्बा..

पिछले लगभग दो दशकों से राहुल गांधी की छवि नौसिखिए राजनेता जैसी दिखाने के लिए मीडिया के कुछ सेलिब्रिटी पत्रकारों और संपादकों ने काफी मेहनत की। सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग के काम में लगाए गए लोगों ने भी इसमें खूब मदद की। उनके वीडियो और तस्वीरों को कभी काट-छांट करके, कभी छेड़छाड़ करके जनता के बीच इस तरह पेश किया गया, जिसमें राहुल गांधी कमअक्ल वाले दिखें, इसके लिए पप्पू जैसा शब्द भी उनके नाम के लिए इस्तेमाल किया गया। इसके बाद भी राहुल गांधी की भारतीय राजनीति में मौजूदगी से घबराहट होती रही तो फिर उनके चरित्र पर उंगलियां उठाई जा सकें, ऐसी तस्वीरें और वीडियो भी प्रचारित-प्रसारित किए गए। ठीक यही काम महात्मा गांधी और पं.नेहरू के साथ भी खूब किया गया और उनसे खौफ खाने वाले लोग अब भी ऐसा करने से बाज़ नहीं आते हैं।

इंदिरा गांधी और फिरोज गांधी, इंदिरा गांधी और संजय गांधी, इनके रिश्तों को लेकर भी बहुत सी मनगढ़ंत कहानियां भारतीय राजनीति के गलियारों में घूमती रही हैं। ये सिलसिला अब भी जारी है। बल्कि कुछ दलाल किस्म के पत्रकार इस पर प्राइम टाइम करने से भी पीछे नहीं हटते। देश के राष्ट्रपिता, पूर्व प्रधानमंत्रियों और वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ इस तरह की साजिश कई दशकों से चल रही है, क्योंकि इन लोगों की दूरदृष्टि, उदार सोच और लोकतंत्र की रक्षा के लिए सब कुछ दांव पर लगाने का जज्बा संकुचित मानसिकता के लोगों की समझ से परे है।

गुलामी के दौर में भी इस तरह के वैचारिक टकराव होते थे। अंग्रेजों को गांधीजी के सत्य और अहिंसा के सिद्धांत अपनी सत्ता में बाधा की तरह दिखते थे और गरीबों के लिए उनकी व्याकुलता पागलपन लगती थी। इसलिए चर्चिल जैसे विद्वान राजनेता ने गांधी के लिए अधनंगा फकीर जैसे अपमानजनक शब्द का इस्तेमाल किया था। उन्हें अंग्रेजों ने कई बार गिरफ्तार किया, उनके आंदोलनों को हिंसक तरीके से कुचलने की कोशिशें हुईं, लेकिन गांधीजी को अंग्रेज अपने आगे झुका नहीं पाए। यही हश्र अंग्रेजों का नेहरूजी के सामने हुआ। अंग्रेजी हुकूमत का विरोध करते हुए अपने जीवन के करीब 9 साल उन्होंने जेल में बिताए, लेकिन कभी भी डर कर पीछे नहीं हटे, सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। देश की आजादी के लिए गांधी-नेहरू की तरह अनगिनत लोगों ने बलिदान दिया है, लेकिन गांधी-नेहरू का भारतीय राजनीति पर एक अलग प्रभाव रहा, उनकी एक अलहदा छाप रही, क्योंकि उनकी व्यापक सोच और भारत के उत्थान के लिए उनका नजरिया अद्भुत रहा।

आजादी के बाद भारत को जिस तरक्की की राह पर बढ़ा, उसके पीछे नेहरू जी की दूरदृष्टि और विद्वता का योगदान रहा। उनके मार्गदर्शन में देश ने अर्थव्यवस्था, विज्ञान, चिकित्सा, शिक्षा, अधोसंरचना, जैसे तमाम क्षेत्रों में आत्मविश्वास से भरे कदम उठाए, जिसका नतीजा ये रहा कि तीसरी दुनिया के कई देश जब बदहाली से परेशान हैं या किसी विकसित देश के पिठ्ठू बनने को मजबूर हैं, तब भारत ने दुनिया में अपनी अलग पहचान बना ली है। अगर नेहरूजी ने भी सत्ता की खातिर या विरोधियों की आलोचना से बचने के लिए अलोकतांत्रिक और संकीर्ण मानसिकता से ओतप्रोत ताकतों के आगे झुकना मंजूर किया होता, अपने सिद्धांतों को राजनैतिक लाभ-हानि के तराजू में रखते हुए समझौते किए होते, तो भारत की तस्वीर इस वक्त विकासशील, लोकतांत्रिक देश की नहीं होती।

गांधी-नेहरू के सिद्धांत सत्यमेव जयते की तरह स्पष्ट थे और आज कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने उन्हीं के अंदाज में अपने विरोधियों को जवाब दिया है। संसद में पत्रकार सत्तापक्ष के वरिष्ठ नेताओं से ज्यादा राहुल गांधी से सवाल पूछने में यकीन रखते हैं। शायद उन्हें भी पता है कि सत्तापक्ष सवालों को पसंद नहीं करता। और राहुल गांधी से सवाल पूछने पर उन्हें किसी बात पर घेरने का मौका भी मिल सकता है। बहरहाल, गुरुवार को राहुल गांधी ने जिस तरीके से दो टूक बात कही, उससे उनकी छवि बिगाड़ने वाले पत्रकारों को निराशा हाथ लगी होगी। प्रवर्तन निदेशालय ने नेशनल हेराल्ड मामले में सोनिया गांधी से लगभग सौ और राहुल गांधी से लगभग डेढ़ सौ घंटों की पूछताछ की, लेकिन फिर भी एजेंसी के हाथ खाली हैं। इसके बाद ईडी ने नेशनल हेराल्ड के दफ्तर पर छापेमारी की और बुधवार को उसकी इमारत में स्थित यंग इंडिया के दफ्तर को सील किया। इसके साथ ही कांग्रेस मुख्यालय और राहुल गांधी के आवास के इर्द-गिर्द पुलिस बल की मौजूदगी देखी गई। 5 अगस्त को कांग्रेस महंगाई और बेरोजगारी के खिलाफ देशव्यापी विरोध प्रदर्शन करने वाली है।

दिल्ली में संसद से राष्ट्रपति भवन तक मार्च और प्रधानमंत्री आवास के घेराव की भी योजना बनाई गई है। हालांकि खबर है कि पुलिस इसकी इजाज़त नहीं दे रही है। इन तमाम हालात पर सवाल पूछे जाने पर राहुल गांधी ने साफ कहा कि सच्चाई को बैरिकेड नहीं किया जा सकता। लोकतंत्र की रक्षा और देश का सौहार्द्र बनाए रखना मेरा काम है, वो मैं करता रहूंगा। राहुल गांधी ने ये भी स्पष्ट कर दिया कि वे किसी से डरते नहीं हैं।

वैसे लोकतंत्र की आदर्श स्थिति तो यही है कि सिवाय कानून के और किसी चीज का भय नहीं होना चाहिए। मगर इस वक्त हालात ऐसे नहीं हैं। लोकतंत्र के नाम पर विधानसभाओं और संसद में पहुंचने वाले लोगों को डरा कर सत्ता पर बने रहने का खतरनाक खेला जा रहा है। जब खेल ही गलत है तो कोई नियम भी नहीं हैं। और जो इस खेल का हिस्सा बनने से इन्कार करता है, उसे किसी न किसी तरह दंडित किया जा रहा है। ऐसे में राहुल गांधी का निडरता का जज्बा न केवल कांग्रेसजनों के लिए बल्कि लोकतंत्र और सच्चाई में यकीन रखने वाले तमाम नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणादायक है।

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