ताइवान- चीन और अमेरिका

धरती के एक कोने पर चल रहे रूस और यूक्रेन युद्ध के कारण पूरी दुनिया का हिसाब-किताब गड़बड़ा गया है। सैकड़ों लोग अकाल मौत मारे गए हैं और लाखों जिंदगियों पर इस युद्ध का असर पड़ा है। और अभी ये नहीं पता कि इसका अंतिम परिणाम क्या होगा। पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका से उम्मीदें थीं कि वह इस युद्ध में रूस के खिलाफ उसका साथ देगा, लेकिन फिलहाल यूक्रेनी सैनिक और आम आदमी ही अपनी जान गंवा रहे हैं। अब जंग के ऐसे ही हालात एशिया में चीन और ताइवान के बीच बनने लगे हैं।

चीन की घुड़कियों के बावजूद अमेरिकी कांग्रेस की स्पीकर नैंसी पैलोसी ताइवान दौरे पर पहुंची। ऊंचे पद पर बैठे किसी अमेरिकी नेता की 25 सालों में यह पहली यात्रा है। जब नैंसी पैलोसी और एक अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल मलेशिया, द.कोरिया, जापान और सिंगापुर के दौरे के लिए निकला था, तो इसमें ताइवान पर पड़ाव की घोषणा नहीं थी। लेकिन अटकलें थीं कि नैंसी पैलोसी ताइवान जा सकती हैं। इस पर चीन ने सैन्य टकराव की धमकी दी थी। अगर अमेरिका इस धमकी से पीछे हटता तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी काफी किरकिरी होती। वैसे भी जिस तरह अफगानिस्तान में तालिबान का कब्जा फिर से कायम हुआ है, उसके बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अमेरिका की नीतियों और फैसलों पर सवाल उठने लगे हैं।

अलकायदा के मुखिया अल जवाहिरी को ड्रोन हमले में मारकर अमेरिका ने अपनी साख थोड़ा संभालने की कोशिश की है। अब ताइवान के साथ खुलकर खड़ा होकर वह विश्व में अपना दबदबा फिर से साबित करना चाहता है। हालांकि अमेरिका के इस कदम से दुनिया फिर से दो गुटों में बंटती दिख रही है। क्योंकि अब रूस और उत्तर कोरिया ने इस मामले में चीन का साथ दिया है। रूस ने नैंसी पैलोसी की इस यात्रा को उकसाने के रूप में देखा है, जबकि उत्तर कोरिया ने इसे ताइवान के मुद्दे पर बाहरी हस्तक्षेप माना है।

आपको बता दें कि चीन ताइवान को एक अलग देश न मानकर अपने से अलग हुआ एक प्रांत मानता है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग कह चुके हैं कि ताइवान का ‘एकीकरण’ पूरा होकर रहेगा। जबकि ताइवान ख़ुद को एक स्वतंत्र देश मानता है जिसका अपना संविधान है और निर्वाचित सरकार है। भौगोलिक दृष्टि से चीन के दक्षिण-पूर्वी तट से लगभग 100 मील दूर स्थित ताइवान एक द्वीप है।

1949 में माओत्से तुंग के नेतृत्व में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने तत्कालीन सत्ताधारी नेशनलिस्ट पार्टी कुओमिंतांग पर जीत हासिल कर अपनी सत्ता स्थापित कर ली थी। इसके बाद कुओमिंतांग के लोग ताइवान चले गए थे। तब से लेकर अब तक कुओमिंतांग ताइवान की सबसे अहम पार्टी बनी हुई है। ताइवान की अपनी निर्वाचित सरकार है, लेकिन दुनिया के केवल 13 देश ही ताइवान को एक अलग और संप्रभु देश मानते हैं। अमेरिका के भी ताइवान के साथ आधिकारिक तौर पर राजनयिक संबंध नहीं हैं।लेकिन अमेरिका ताइवान रिलेशंस एक्ट के तहत उसे हथियार बेचता है। इस क़ानून के मुताबिक अमेरिका ताइवान की आत्मरक्षा के लिए ज़रूरी मदद देगा। अमेरिका के आर्थिक और सामरिक हित जहां भी जुड़ते हैं, वहां इसी तरह के करार शक्ल ले लेते हैं। वैसे ताइवान ”फ़र्स्ट आइलैंड चेन” यानी ”पहली द्वीप शृंखला” नाम से कहे जाने वाले उन द्वीपों में गिना जाता है जो अमेरिकी विदेश नीति के लिए अहम माने जाने वाले क्षेत्रों के करीब हैं। अमेरिका की विदेश नीति के लिहाज़ से ये सभी द्वीप काफ़ी अहम हैं, इसलिए वह बिल्कुल नहीं चाहेगा कि ताइवान कभी चीन के कब्जे में जाए। क्योंकि ऐसा होता है तो फिर चीन पश्चिमी प्रशांत महासागर में अपना दबदबा बढ़ा सकता है, जिससे गुआम और हवाई द्वीपों पर मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकाने को भी ख़तरा हो सकता है।

ताइवान की धरती पर अमेरिकी प्रतिनिधि के कदम को चीन ने घोर आपत्तिजनक माना है और कहा है कि अमेरिका लगातार ‘वन चाइना पॉलिसी’ को चुनौती दे रहा है। वह ताइवान में अलगाववादियों की आज़ादी की मुहिम को हवा दे रहा है। चीन ने साफ कहा है कि अमेरिका का यह रुख़ आग से खेलने जैसा है और यह बहुत ही ख़तरनाक है। जो आग से खेलेंगे, वो ख़ुद जलेंगे। और इस धमकी को हकीकत में बदलते हुए चीन ने पेलोसी के ताइवान पहुंचने के बाद सैन्य अभ्यास की शक्ल में अपने युद्धपोतों और जहाजों को ताइवान के इर्द-गिर्द दिखाना शुरु कर दिया है। चीन के इस कदम का क्या असर होता है, फिलहाल कहना मुश्किल है। क्योंकि ताइवान सैन्य शक्ति के मामले में चीन से काफी पीछे है और वो सीधे उसका मुकाबला नहीं कर पाएगा। जबकि अमेरिका ताइवान का कितनी दूर तक साथ देता है, ये भी अभी पता नहीं।

अमेरिका अगर दो लोगों की लड़ाई में अपना फायदा ढूंढने में माहिर है, तो चीन की विस्तारवादी नीति से भी दुनिया वाकिफ है। भारत खुद इसका भुक्तभोगी है। गलवान में संघर्ष के बाद एलएसी के पास चीन पक्के निर्माण कर भारत के लिए खतरा पैदा कर ही रहा है इधर अपने कर्ज के बोझ तले श्रीलंका में हंबनटोटा बंदरगाह का इस्तेमाल कर वह भारत के सामने दोहरी चुनौती पेश कर रहा है।

ताइवान पर अमेरिका दबदबा दिखा रहा है, श्रीलंका पर चीन। दोनों अपनी सैन्य शक्ति से दुनिया में महाशक्तिमान होने का दावा कर रहे हैं। इन सबके बीच भारत के सामने अपनी विदेश नीति को फिर से परखने की जरूरत है कि पिछले कुछ सालों में गुटनिरपेक्षता के सिद्धांत से विचलित होकर, पुराने मित्र देशों की नाराजगी की कीमत पर सैन्य और सामरिक शक्तियों के आगे झुकने से हमारा क्या नुकसान हुआ है और आगे क्या हो सकता है। युद्धों में उलझती दुनिया में गांधी और नेहरू जैसे विचारकों और शांति स्थापना करने वाले एक मजबूत संगठन की जरूरत है।

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