रिलेशनशिप टिप की वजह

-सुनील कुमार॥

हिन्दी में बहुत पहले, आज से चालीस बरस पहले, एक पत्रिका अपने एक कॉलम के लिए हम लोगों को बड़ा खींचती थी। कहने के लिए युवा वर्ग के लिए छपने वाली इस पत्रिका में ‘मैं क्या करूं?’ नाम का एक कॉलम छपता था जिसमें लोग अपनी नौजवानी की दिक्कतों या उलझनों का जवाब चाहते थे। उस वक्त के हिसाब से उस कॉलम के सवाल भी कुछ अधिक हिम्मती रहते थे, और शायद जवाब भी। खैर, उस वक्त वैसा एक ही कॉलम हिन्दी में था, इसलिए उसे पढऩे का इंतजार रहता था। बाद में अंग्रेजी पढऩे के साथ-साथ समझ आया कि अंग्रेजी के पत्र-पत्रिकाओं में तो वैसे कॉलम का चलन आम हैं, और जिनकी कोई उलझन नहीं रहती है, वे भी वैसे कॉलमों को पढ़ते हैं। दूसरों की जिंदगी की निजी दिक्कतों को सुनना, और फिर उसे सुलझाने का सुझाव भी पढऩा, बहुत से लोगों के लिए बहुत दिलचस्पी का होता है। हालांकि कुछ परामर्शदाता ऐसे भी हैं जो कि ऐसा कॉलम लिखने के खिलाफ रहते हैं कि जिन लोगों की जिंदगी में ऐसी कोई समस्या या उलझन नहीं रहती है, वे भी उससे अपने आपको जोड़ लेते हैं, और अपने लिए वैसी कोई काल्पनिक समस्या सच मान बैठते हैं। फिलहाल अंग्रेजी में ऐसे कॉलम धड़ल्ले से चलते हैं, और इनमें संबंधों की जटिलताओं पर परामर्श से लेकर लोगों की सेक्स-जिंदगी की दिक्कतों पर सुझाव तक रहते हैं।

अभी पिछले कुछ हफ्तों से मैंने अपने फेसबुक पेज पर रिलेशनशिप-टिप नाम का एक सिलसिला शुरू किया है जिसमें गिने-चुने बीस-पच्चीस शब्दों में कोई एक ऐसी सलाह रहती है जिसके बारे में लोगों को सोचना चाहिए। यह किसी मनोवैज्ञानिक-परामर्शदाता विशेषज्ञता से उपजी हुई सलाह नहीं रहती है, लेकिन यह आम जिंदगी में खुद के जिए हुए, और दूसरों से सुने हुए से बनी धारणाएं हैं जो कि मैं दूसरों के सोचने-विचारने के लिए सामने रख देता हूं। लेकिन इससे किसी की उलझन सुलझे या न सुलझे, खुद मेरे लिए इससे अभूतपूर्व उलझनें पैदा हो रही हैं, क्योंकि आसपास के कई तरह के लोग लिखी गई एक-एक बात को मेरे उनसे रिश्तों पर कही गई बात मान ले रहे हैं, या उनके किसी और से रिश्ते के बारे में कही गई बात!

अब बात व्यक्तिगत रूप से कुछ खतरे की हो जाती है, कई संबंध और कई दोस्तियां खोने का खतरा खड़ा हो जाता है, कई लोगों से बातचीत में तनाव की नौबत आ जाती है, कुछ लोगों ने इसे साफ-साफ उनकी बेइज्जती मान लिया है, और कुछ ने यह संदेश भी भेजा कि उन्हें बेईमान-धोखेबाज लिखते हुए मुझे कोई शर्म नहीं आई? एक दोस्त ने फेसबुक पर ही यह लिखा कि उसे यह हैरानी है कि मेरे परिवार ने अब तक मुझे घर से निकालकर बाहर फेंका क्यों नहीं है? जितने मुंह, उतनी बातें।

अब बिना किसी खास उलझन के जब इस तरह की सुलझन लिखने का शौक चर्राया है, तो कुछ खतरे तो होना जायज ही था। और फिर यह किसी के पूछे गए सवाल के जवाब में लिखने के बजाय, मसीहाई अंदाज में दी गई नसीहत अधिक थी, तो मसीहा को सलीब पर तो ठुकना ही था, और वही हो भी रहा है।

दरअसल संबंधों को लेकर हिन्दुस्तान के अधिकतर लोगों के बीच बहुत खुली बातचीत का सिलसिला कम रहता है। लोग निजता खत्म हो जाने के डर से आसपास के लोगों से भी बहुत खुलासे से बहुत सी बातें नहीं करते। इसके अलावा सेक्स और प्रेमसंबंधों जैसे मुद्दे अभी भी अधिकतर लोगों के लिए वर्जित-विषय जैसे हैं, और उन पर भी बहुत चर्चा नहीं होती है। बहुत से प्रेमी-जोड़े भी ऐसे रहते हैं, जो आपस में जो करते भी हैं, जो जीते भी हैं, उस पर वे खुलकर चर्चा नहीं करते। यहां तक कि बात तो दो लोगों के बीच की है, लेकिन असल जिंदगी में दो लोग हमेशा ही दो नहीं रहते, और बहुत से लोगों की जिंदगी में एक तीसरे किसी के आने से कम या अधिक वक्त के लिए यह एक त्रिकोण बन जाता है, और उससे कैसे निपटना है इसका अंदाज बहुत से लोगों को नहीं रहता। वे लोग तो फिर भी खुशकिस्मत रहते हैं जिनके पास कोई राजदार ऐसी दिक्कत और परेशानी की बात करने के लिए रहते हैं, लेकिन वे भी अपनी जिंदगी के पूर्वाग्रहों पर टिकी हुई सलाह ही दे पाते हैं, उनकी सलाह भी किसी पेशेवर परामर्शदाता जैसी नहीं रहती है, और अक्सर ही वह काम की होने के बजाय बर्बाद करने वाली अधिक रहती है। लोगों को ऐसी किसी सलाह के लिए किसी से बात करते समय यह भी सोचना चाहिए कि हर शुभचिंतक अच्छे सलाहकार हों, यह जरूरी तो नहीं।

ऐसे में मुझे सूझा कि किसी एक व्यक्ति के निजी संबंधों से परे, किसी के भी किसी भी तरह के संबंधों को लेकर क्या सावधानी की ऐसी कोई बातें लिखी जा सकती हैं जो कि लोगों को समय रहते सोचने का मौका दे, सोचने पर मजबूर करे, और यह किसी सलाह या इलाज की तरह न होकर, एक रिमाइंडर की तरह रहे, और लोगों को याद दिलाए कि मुझे याद रखना। अपनी खुद की उम्र का खासा बड़ा हिस्सा गुजारने के बाद मेरे पास खुद के लिए ऐसी किसी चेकलिस्ट की जरूरत कम है, लेकिन ऐसी चेकलिस्ट बनाने के लिए तजुर्बा बड़ा लंबा है कि लोगों को संबंधों के बारे में क्या-क्या सोच लेना चाहिए।

इन बातों की चर्चा कई लोगों के मुंह में बड़ा कड़वा स्वाद छोड़ जा रही है, क्योंकि सावधानियां किसी को नहीं सुहातीं। अगर किसी से घर-दफ्तर में आग बुझाने के सामान तैयार रखने को कहा जाए, तो लोग आमतौर पर ऐसा समझ लेते हैं कि ऐसे सलाहकार उनके बुरे की ही बात सोचते हैं। लेकिन हकीकत तो यह है कि अगर किसी बुरी नौबत से सचमुच ही बचना है, तो वक्त रहते उसके बारे में सोचकर, उसकी कल्पना करके, उस हिसाब से तैयारी करके रखना होता है। जीवन बीमा तभी तक कराया जा सकता है, जब तक जीवन रहता है, जिसका कोई फायदा मरने के बाद बाकी परिवार को मिलता है, उसे मरने के बाद नहीं किया जा सकता। इसलिए आपसी रिश्तों में तनाव आ जाने के बाद उन तनावों की कल्पना का कोई फायदा नहीं रह जाता, तब तो वह कल्पना नहीं हकीकत हो चुकी रहती है। इसलिए संबंधों को लेकर आत्ममंथन, आत्मविश्लेषण, और मूल्यांकन जैसे काम बिगाड़ आने के पहले ही काम के रहते हैं, सब कुछ बिगड़ जाने के बाद कुछ भी बच जाना मुमकिन नहीं रहता।

इसलिए लोगों को अपने संबंधों के अपने अच्छे दिनों के चलते हुए ही बुरे दिनों की आशंका किए बिना, वैसी किसी नौबत के आने पर क्या करना चाहिए इस बारे में सोच जरूर लेना चाहिए। अब इस बात को एक मिसाल के साथ समझा जाए तो वह यह है कि आज हिन्दुस्तान में हर दिन पुलिस के पास दर्जनों या सैकड़ों ऐसी शिकायतें पहुंचती हैं कि किसी ने उनकी अंतरंग तस्वीरें, या नग्न या अश्लील वीडियो वायरल कर दिए हैं। इनमें से अधिकतर मामलों में ये वीडियो और ये तस्वीरें लोगों की खुद ही अपने साथी को दी हुई रहती हैं, और रिश्ते खराब हो जाने पर इनका नाजायज इस्तेमाल होने लगता है। अंग्रेजी में इसके लिए रिवेंज-पोर्न शब्द खासे अरसे से चल रहा है, इसका हिन्दी तरजुमा बदले का सेक्स-वीडियो जैसा कुछ हो सकता है। अब जब सब कुछ अच्छा चलते रहता है, उस वक्त लोगों को यह सूझ भी नहीं सकता कि भर्ती के अपने उस वक्त के सबसे प्यारे इंसान के साथ शेयर की गई इन निजी चीजों का कोई बेजा इस्तेमाल भी कभी हो सकता है, लेकिन सच तो यह है कि इनमें से बहुत सी चीजें किसी तीसरे-चौथे तक पहुंचती हैं, और कुछ चीजें सोशल मीडिया पर भी चली जाती हैं। अब अगर मेरी सुझाई गई बातों से लोगों को अपनी तस्वीरें और वीडियो साझा करते वक्त एक बार फिर सोचना सूझता है, तो इससे उनका भला ही हो सकता है।

मेरी सुझाई हुई हर बात यहां लिखने के लिए आज की इस जगह से कई गुना अधिक जगह लग सकती है, और लोगों को यह अटपटा भी लग सकता है कि एक उम्रदराज अखबारनवीस छिछोरेपन की लगतीं इन बातों को क्यों लिख रहा है, फिर यह भी है कि मुफ्त में दी गई सलाह की कोई इज्जत तो होती नहीं है, फिर भी जैसे बिना किसी मांग के भी कोई पेड़ फल, पत्ते, फूल देते रहते हैं, उसी तरह मैं अपने को सूझी गई बातें साझा करते रहता हूं। किसी के काम आए तो ठीक, और काम न आए, तो ये बातें मेरी डायरी सरीखी दर्ज होती चल रही हैं।

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