कनाडा जाकर पोप ने मांगी आदिवासियों से माफी, और जाहिर की ऐतिहासिक शर्म..

-सुनील कुमार॥

दुनिया में कैथोलिक ईसाई लोगों के सबसे बड़े धर्मगुरू पोप अभी कनाडा पहुंचे। और जैसा कि पहले से तय था उन्होंने वहां के मूल निवासियों से इस बात के लिए माफी मांगी कि पिछली डेढ़ सदी में कैथोलिक चर्च और उसकी चलाई स्कूलों ने डेढ़ लाख के करीब आदिवासी बच्चों को उनके परिवार से दूर करके उन्हें ‘शहरी, शिक्षित, और सभ्य’ बनाने के लिए उन्हें अपनी स्कूलों में बंधुआ सा रखा। कनाडा के इतिहास में 1870 से 1996 के बीच मूल निवासियों के बच्चों को जबर्दस्ती उनके घरों से ले जाकर इस तरह उनका ‘विकास’ किया जाता था। और एक जांच रिपोर्ट बताती है कि इनमें से तीन हजार बच्चे इन स्कूलों में मर भी गए, जिन्हें इस जांच रिपोर्ट ने मूल निवासियों का सांस्कृतिक-जनसंहार करार दिया था। पोप फ्रांसीस ने आदिवासी समुदाय से ऐसी ही एक आवासीय-स्कूल की जमीन पर आमंत्रित आदिवासियों से माफी मांगते हुए कहा कि उन्हें चर्च के लोगों के इस किए हुए का बहुत दुख है, और उन्होंने इसके लिए माफी मांगी। यहां पर आदिवासी समुदायों के ऐसे लोग मौजूद थे जो कि चर्च की आवासीय-स्कूलों में कैद करके रखे गए थे, और जो आज भी जिंदा हैं। उन लोगों ने पोप की माफी पर तसल्ली जाहिर की, इनमें से कई लोग इस मौके के लिए दूर-दूर से पहुंचे थे। पोप ने कैथोलिक चर्च की तरफ से दुख और शर्मिंदगी का इजहार किया, और कहा कि वह स्कूल प्रथा भयानक गलती थी, और आदिवासियों के खिलाफ बहुत से ईसाई लोगों द्वारा की गई दुष्टता के लिए उन्होंने माफी मांगी। वहां पहुंचे मूल निवासियों में कई लोगों का कहना था कि यह माफी नाकाफी है, और पोप को इससे अधिक कुछ कहना चाहिए।

दुनिया में सभ्यता वही होती है कि लोग अपनी गलतियों, और खासकर अपने किए गलत कामों पर अफसोस जाहिर करना सीखें, और माफी मांगना सीखें। दुनिया का इतिहास ऐसी सभ्य संस्कृतियों से भरा हुआ है। लोगों को याद होगा कि ऑस्ट्रेलिया में भी शहरी, गोरे, ईसाई लोगों ने वहां के मूल निवासियों के साथ ऐसा ही किया था, और उनके बच्चों को सभ्य बनाने के नाम पर गांव-परिवार से दूर करके शहरी, ईसाई, आवासीय-स्कूलों में उन्हें रखा था जिससे कि वे अपनी संस्कृति से कट गए थे। सदियों के ऐसे शोषण के बाद अभी कुछ बरस पहले ऑस्ट्रेलिया की संसद ने इन समुदायों के प्रतिनिधियों को सदन के भीतर आमंत्रित किया, और फिर पूरी संसद ने खड़े होकर इनसे समाज की की हुई ज्यादती के लिए माफी मांगी थी। ऑस्ट्रेलिया में इसे स्टोलन जनरेशन कहा जाता था, यानी मूल निवासियों से चुराई गई (उनके बच्चों की) पीढ़ी। दुनिया के इतिहास में ऐसा कई देशों के साथ भी हुआ है जिन पर ज्यादती करने वाले दूसरे देशों ने उनसे माफी मांगी है। लेकिन ऐसी शर्मिंदगी जाहिर करने के लिए, और माफी मांगने के लिए लोगों का सभ्य होना जरूरी होता है।

हिन्दुस्तान के इतिहास को देखें, तो अंग्रेजों ने तो अपने जलियांवाला बाग जैसे जुल्म और जुर्म के लिए भी माफी नहीं मांगी थी, और नतीजा यह हुआ था कि एक हिन्दुस्तानी क्रांतिकारी उधम सिंह ने लंदन जाकर जलियांवाला बाग के अंग्रेज खलनायक जनरल डायर को सार्वजनिक रूप से गोली मार दी थी। हिन्दुस्तान के भीतर जो ताकतें, और जो संगठन गांधी की हत्या के पीछे थे, उसके लिए जिम्मेदार थे, उन्होंने कभी भी उस जुर्म के लिए माफी नहीं मांगी। बल्कि अब तो ये संगठन गोडसे से लेकर सावरकर तक के महिमामंडन में लगे हुए हैं, और उसके लिए भी गांधी स्मृति के प्रकाशन का इस्तेमाल कर रहे हैं। देश में ऐसे और भी जो-जो ऐतिहासिक जुर्म हुए हैं, उनके लिए माफी मांगने का कोई इतिहास नहीं रहा है। इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं, और उनके बेटे संजय गांधी की असंवैधानिक सत्ता देश को कुचल रही थी। लेकिन आपातकाल की ज्यादतियों को लेकर कांग्रेस पार्टी ने कोई सार्वजनिक माफी मांगी हो ऐसा याद नहीं पड़ता। बल्कि इन शब्दों से इंटरनेट पर ढूंढने पर 2015 का कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद का यह बयान सामने आता है कि आपातकाल के लिए कांग्रेस को माफी मांगने की कोई जरूरत नहीं है। उनका तर्क है कि इसके बाद लोगों ने इंदिरा गांधी को फिर प्रधानमंत्री चुन लिया था, और अगर हम (कांग्रेस) इसके लिए माफी मांगते हैं, तो देश की जनता को भी माफी मांगनी पड़ेगी कि उसने इसके बाद भी इंदिरा गांधी को क्यों चुना। कांग्रेस के एक बड़े नेता, जो कि एक वकील भी हैं, उन्होंने एक लंबे-चौड़े बयान में कई तरह से इस बात की वकालत की थी कि कांग्रेस को इमरजेंसी पर माफी मांगने की कोई जरूरत नहीं है।

माफी तो इंदिरा गांधी के कत्ल के लिए सिक्ख पंथ के उस वक्त के उग्रवादियों की तरफ से भी किसी ने नहीं मांगी थी, बल्कि उसे जीत के जश्न की तरह मनाया गया था। इसके पहले जब स्वर्ण मंदिर से हथियारबंद आतंकियों को निकालने के लिए ऑपरेशन ब्लू स्टार चलाया गया था, तो एक धर्मस्थान पर घुसने के लिए केन्द्र सरकार और कांग्रेस पार्टी से माफी की मांग की गई थी। अनगिनत हत्याएं करके भाग-भागकर स्वर्ण मंदिर में रहने वाले भिंडरावाले के आतंकियों को हटाने के लिए उस वक्त जो कार्रवाई सरकार को मुनासिब लगी थी, उसने की थी, और भिंडरावाले के हत्यारे-आतंक पर चुप रहने वाले सिक्ख नेताओं ने स्वर्ण मंदिर पर कार्रवाई के खिलाफ जुबानी हमला बोल दिया था, और नतीजा इंदिरा गांधी की हत्या तक पहुंचा था। इसके तुरंत बाद देश भर में सिक्ख विरोधी दंगे हुए थे, और यह बात आज तक जारी है कि कांग्रेस ने उस पर पर्याप्त माफी मांगी है या नहीं। जबकि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सिक्ख विरोधी दंगों के लिए देश से माफी मांगी थी, जिसे बाद में लीक हुए एक अमरीकी कूटनीतिक संदेश में कहा गया था कि बीस बरस में किसी भारतीय नेता ने ऐसा करने की इच्छाशक्ति नहीं दिखाई थी।

हिन्दुस्तान में ऐतिहासिक जुल्म और ज्यादती के और भी मामले हैं, 1992 में बाबरी मस्जिद को गिराया गया, और गिराने वालों ने सामने मंच पर खड़े होकर, माईक से फतवे जारी करके यह काम किया, इसके ठीक पहले अटल बिहारी वाजपेयी ने मैदान को समतल कर देने जैसी कोई बात सार्वजनिक रूप से कही थी, अडवानी ने इसके पहले रथयात्रा निकाली थी जिसमें उनके साथ आज के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी मौजूद थे। लेकिन बाबरी मस्जिद गिराने के लिए किसी ने माफी नहीं मांगी, जिसके बाद कि देश भर में हुए दंगों और आतंकी हमलों में सैकड़ों मौतें हुई थीं। 2002 में गुजरात में हिन्दुओं से भरे रेल डिब्बे जला दिए गए, और उसके बाद मानो इसके जवाब में हिन्दू उग्रवादियों ने छांट-छांटकर हजारों मुस्लिमों को तीन दिनों तक मारा, और मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार दूसरी तरफ मुंह मोड़े बैठी रही। अपनी सरकार के चलते राजधर्म की ऐसी अनदेखी पर मोदी ने कभी माफी नहीं मांगी। बल्कि आज जो संयुक्त विपक्ष के राष्ट्रपति पद प्रत्याशी थे, उन यशवंत सिन्हा के नाम के साथ गुजरात दंगे टाईप करके देखें तो पहली हैडिंग 2014 की दिखाई पड़ती है जिसमें यशवंत सिन्हा का बयान है कि गुजरात दंगों के लिए माफी न मांगकर मोदी ने सही किया। आज जरूर यशवंत सिन्हा की हार पर देश के बहुत से लोगों को अफसोस हो रहा है जो कि भाजपा की उम्मीदवार को हराना चाहते थे, लेकिन 2014 में जब यशवंत सिन्हा भाजपा के नेता थे, वे प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी के बारे में दमखम से यह बात कह रहे थे, और उन्होंने यह भी कहा था कि कोई भी व्यक्ति इस बात को लेकर जरा भी विचलित नहीं है कि 2002 में गुजरात में क्या हुआ था, ठीक उसी तरह जिस तरह कि वे भूल गए हैं कि 1984 में सिक्खों के साथ क्या हुआ था।

माफी मांगने के लिए लोगों में लोकतांत्रिक समझ होना जरूरी है, दूसरे लोगों के हक और अपनी जिम्मेदारी की बुनियादी समझ होना जरूरी है। आज भी इस हिन्दुस्तान में संघ परिवार के संगठन उत्तर-पूर्वी राज्यों से आदिवासी परिवारों की बच्चियों को लाकर देश भर में जगह-जगह बनाए गए शबरी आश्रमों में रख रहे हैं, और उनकी संस्कृति, उनके धर्म से उन्हें परे ले जाकर उनका शहरी, हिन्दूकरण कर रहे हैं। यह ठीक उसी तरह का काम है जिसके लिए सैकड़ों बरस बाद ऑस्ट्रेलिया और कनाडा में वहां की संसद, सरकार, और ईसाई धर्मप्रमुख माफी मांग रहे हैं, शर्मिंदगी जाहिर कर रहे हैं। हिन्दुस्तान में तो बस्तर जैसे आदिवासी इलाकों में आदिवासियों के साथ क्या तो भाजपा सरकार, और क्या तो कांग्रेस सरकार, सबके राज में जिस तरह के जुल्म हो रहे हैं, उसके लिए आदिवासियों से माफी मांगने की सभ्यता इस देश में जाने कब विकसित हो सकेगी। कई मामलों में हिन्दुस्तान पश्चिम से सैकड़ों बरस पीछे चलता है, और 22वीं या 23वीं सदी में हिन्दुस्तान की संसद और सरकार शायद आदिवासियों से माफी मांगने जितनी सभ्य हो सकेंगी।
-सुनील कुमार

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