शिक्षा में भ्रष्टाचार..

पश्चिम बंगाल सरकार ने कई हस्तियों को बंग विभूषण पुरस्कार से सम्मानित करने का फैसला लिया। इन हस्तियों में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन भी थे। लेकिन अमर्त्य सेन ने पुरस्कार लेने से इन्कार कर दिया। उनके परिवार का कहना है कि उन्होंने सरकार को जुलाई के पहले सप्ताह में सूचित किया था कि पुरस्कार वितरण समारोह के समय वह भारत में नहीं होंगे। ये पुरस्कार सोमवार 25 जुलाई को दिए गए हैं। अमर्त्य सेन की बेटी अंतरा देव सेन का कहना है कि अमर्त्य सेन को कई पुरस्कार मिल चुके हैं और वह चाहते हैं कि बंग विभूषण सम्मान किसी दूसरे शख्स को दे दिया जाए।

लेकिन माना जा रहा है कि इस इन्कार की असली वजह ममता बनर्जी सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं। गौरतलब है कि स्कूल सेवा आयोग भर्ती घोटाले में टीएमसी सरकार में मंत्री पार्थ चटर्जी की गिरफ्तारी हुई है। पार्थ की नजदीकी रही अर्पिता मुखर्जी के घर से ईडी को 20 करोड़ से ज्यादा की रकम मिली है। भर्ती घोटाले में सीबीआई जांच कर रही थी और पैसों की बड़े पैमाने पर हेर-फेर के अंदेशे में ईडी ने भी कार्रवाई की, जिसमें टीएमसी विधायक और मंत्री पार्थ चटर्जी घेरे में आए। इसके बाद उंगलियां ममता बनर्जी पर भी उठ रही हैं। इसलिए माकपा नेता सुजान चक्रवर्ती ने अमर्त्य सेन और अन्य सभी प्रतिष्ठित हस्तियों से ममता बनर्जी सरकार से कोई पुरस्कार स्वीकार न करने की सार्वजनिक अपील की थी।

अमर्त्य सेन को वैसे भी किसी पुरस्कार या सम्मान की दरकार नहीं है, बल्कि उन्हें सम्मानित कर प. बंगाल की सरकार का मान बढ़ता। लेकिन फिलहाल प. बंगाल की टीएमसी सरकार खुद भ्रष्टाचार के आरोप के कारण अपना अपमान करवा रही है। तीस सालों के वामपंथी शासन के बाद ममता बनर्जी ने जब प.बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की सत्ता स्थापित की, तो इस राज्य की गरीब जनता को बहुत उम्मीदें बंधाई गई थी। विकास और बेहतर भविष्य के सुनहरे सपने दिखाए गए थे। वामपंथी शासन में उद्योगों की चकाचौंध भले ही नहीं थी, लेकिन भ्रष्टाचार का ऐसा सार्वजनिक प्रदर्शन भी नहीं था। जबकि टीएमसी की सत्ता के आने के बाद भ्रष्टाचार के कई आरोप सत्तारुढ़ दल से जुड़े लोगों पर लगे। सूती साड़ी और हवाई चप्पल में ममता बनर्जी ने लोगों के बीच सादगी की मिसाल भले कायम की हो, लेकिन जब उनके आसपास के लोग करोड़ों के ढेर पर बैठे नजर आएं, तो फिर सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या दीदी को अपने करीबियों की यह अनायास भव्यता नजर नहीं आई, या फिर उन्होंने इसे देखकर भी नजरंदाज किया।

स्कूल सेवा आयोग भर्ती में भ्रष्टाचार एकाध महीने की बात नहीं है, कई सालों से यह सिलसिला चल रहा था। जब मंत्री की करीबी सहयोगी के घर से एकमुश्त 20 करोड़ रुपए नकद मिल सकते हैं और उसके साथ कई मोबाइल फोन मिले हैं, तो यह समझना कठिन नहीं है कि इस भ्रष्टाचार के तार कितनी दूर तक फैले होंगे। घर पर इतनी नकदी अगर मिली है, तो इस भ्रष्टाचार में कितने करोड़ इधर से उधर हुए होंगे, उसका कोई हिसाब कभी मिल पाएगा या नहीं, कहा नहीं जा सकता। पार्थ चटर्जी 2014 से 2021 तक राज्य सरकार में शिक्षा मंत्री थे। आरोप है कि उनके कार्यकाल में सरकारी स्कूलों में नियुक्ति में भ्रष्टाचार हुआ है। सात साल का वक्त किसी गड़बड़ी को भांपने के लिए काफी लंबा होता है। अगर ममता बनर्जी को इस गड़बड़ी की वाकई जानकारी नहीं थी, तो फिर उनकी प्रशासनिक क्षमता पर सवाल उठते हैं। और अगर जानकारी थी, फिर भी उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं की, तब भी उनकी कार्यशैली पर सवाल उठेंगे ही।

सरकारी स्कूलों में अमूमन गरीब और वंचित तबके के बच्चे ही पढ़ते हैं। देश के ऐसे नौनिहाल जिन्हें शिक्षा का अधिकार हासिल होने के बावजूद सही तरीके से शिक्षित होने से वंचित रखा जा रहा है। क्योंकि जब नाकाबिल लोग घूसखोरी से शिक्षक बनने लगेंगे, तो वे बच्चों को सही शिक्षा दे ही नहीं पाएंगे। प.बंगाल से पहले हरियाणा में भी पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला और उनके बेटे अजय चौटाला को शिक्षक भर्ती घोटाले में 10 साल की सजा हुई थी। इधर मध्यप्रदेश में व्यापमं घोटाला तो ऐसी अबूझ पहेली बन चुका है, जिसमें फर्जीवाड़े की जानकारी होने के बावजूद असल अपराधियों तक कानून के हाथ पहुंच नहीं पाए हैं और कई संदिग्ध व गवाह रहस्यमय परिस्थितियों में मारे गए हैं। ये घोटाला भी शिक्षा क्षेत्र से ही जुड़ा हुआ था।

देश के तीन बड़े प्रदेशों में सरकारी शिक्षण संस्थाओं में भ्रष्टाचार उजागर हो चुका है। अभी न जाने कितने राज्यों में शिक्षकों की नियुक्ति से लेकर व्यावसायिक परीक्षा तक अरबों रुपए की हेराफेरी हो रही होगी। कभी कोई मामला खुल जाएगा तो दोषियों को सजा हो जाएगी। लेकिन ये सिलसिला कभी रुकेगा, ऐसी सूरत नजर नहीं आ रही। एक ओर देश में सत्तारुढ़ दल के संरक्षण में संपन्न लोगों के भ्रष्टाचार के किस्से सामने आ रहे हैं, दूसरी ओर छत्तीसगढ़ से एक मिसाल सामने आई है। यहां रायपुर में यातायात कांस्टेबल नीलांबर सिन्हा को सड़क पर लावारिस हालात में बैग मिला जिसमें 45 लाख रुपये थे। बैग में अलग-अलग बंडलों में 2000 और 500 के नोट रखे थे। श्री सिन्हा ने रुपयों से भरा यह बैग थाने में जमा करा दिया और ईमानदारी के साथ कर्तव्यपरायणता की सीख समाज को दी है। समाज बेईमान लोगों का हश्र देखे और नीलांबर सिन्हा जैसों की ईमानदारी को मिलने वाला सम्मान याद रखे।

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