अब नोटों के इतने ऊंचे जखीरे पर बैठे नेता भला किस मुंह से बदले की कार्रवाई कह सकते हैं…

-सुनील कुमार॥

पश्चिम बंगाल की ममता बैनर्जी सरकार के साथ केन्द्र सरकार का टकराव, और तनातनी जारी है। लेकिन इस बार बात महज राजनीतिक नहीं है, बल्कि सत्ता का भ्रष्टाचार एक बड़ा मुद्दा है। ममता मंत्रिमंडल के पार्थ चटर्जी से जुड़े ठिकानों पर कल ईडी ने छापा मारा था। और मंत्री की एक बहुत ही करीबी महिला अर्पिता मुखर्जी के घर से 20 करोड़ रूपए नगद बरामद किए गए हैं, और 20 से अधिक मोबाइल फोन जब्त हुए हैं। यह छापा बंगाल की स्कूलों में नौकरी के लिए रिश्वत लेने के आरोपों पर कोलकाता हाईकोर्ट से सीबीआई जांच का आदेश देने के सिलसिले में पड़ा था। ऐसे आरोप थे कि सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में नौकरी लगवाने के लिए बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार चल रहा था, और मामला जब हाईकोर्ट तक पहुंचा तो वहां से सीबीआई जांच का आदेश हुआ, और सीबीआई ने इस मामले में मनी लांड्रिंग की आशंका पाकर ईडी को भी इसकी खबर की थी। कल बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के दो मंत्रियों सहित एक दर्जन जगहों पर ईडी ने एक साथ छापे मारे थे, और आज मंत्री पार्थ चटर्जी को गिरफ्तार कर लिया है।

पश्चिम बंगाल को लेकर पता नहीं क्यों बाहर ऐसी धारणा थी कि वहां तीन दशक तक लगातार चली वाममोर्चा सरकार ने एक ऐसी राजनीतिक और सरकारी संस्कृति विकसित की थी जिसमें बड़े पैमाने पर संगठित भ्रष्टाचार नहीं रह गया था। फिर ऐसा भी लगता था कि ऐसी संस्कृति देखे हुए पश्चिम बंगाल में वाममोर्चे को हराकर दो-दो बार सत्ता में आई ममता बैनर्जी पर भी ऐसा नैतिक दबाव तो रहेगा कि वह भ्रष्टाचार को बड़े पैमाने पर संगठित स्तर तक नहीं ले जाएंगी। लेकिन धीरे-धीरे यह बात समझ में आ गई कि तरह-तरह की चिटफंड कंपनियों के साथ ममता बैनर्जी सरकार के लोगों का जितना गहरा रिश्ता चले आ रहा था वह मामूली और मासूम संबंध नहीं था, वह बड़े पैमाने पर राजनीतिक भ्रष्टाचार ही था। और अब तो जब सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में नौकरी दिलवाने के लिए इतने बड़े पैमाने पर रिश्वतखोरी की गई कि सीबीआई जांच शुरू होने के बाद, ईडी की जांच शुरू होने के बाद भी अब जाकर अगर मंत्री की सबसे करीबी महिला से 20 करोड़ रूपये नगद मिल रहे हैं, तो पिछले बरसों में इससे कितने गुना अधिक रकम आई-गई होगी, यह अंदाज आसानी से लगाया जा सकता है। राजनीतिक और सरकारी भ्रष्टाचार का पैसा बहुत कम ही इस तरह नगद रखा जाता है, और उसका अधिकतर हिस्सा लगातार इधर-उधर कर दिया जाता रहता है। इसलिए इस रकम से आंखें तो फटी की फटी रह जाती हैं, लेकिन यह संगठित भ्रष्टाचार की आखिरी किस्त सरीखी चीज है।

वैसे तो जनता के पैसों से चलने वाली सरकारों में किसी भी किस्म का भ्रष्टाचार सबसे गरीब जनता के हक को सबसे बुरी तरह कुचलना होता है, लेकिन जब नौकरियां देने में भ्रष्टाचार करके कम काबिल या नालायक लोगों को नौकरी पर रख दिया जाता है, तो उसका एक मतलब यह भी होता है कि उनकी पूरी नौकरी चलने तक लोगों को घटिया काम हासिल होगा। एक-एक शिक्षक अपनी पूरी जिंदगी में दसियों हजार बच्चों को पढ़ाते हैं, और अगर रिश्वत देकर नालायक लोग शिक्षक बन जाते हैं, तो वे नालायक बच्चों की पूरी पीढिय़ां तैयार करते हैं। यह सिलसिला किसी सडक़ या इमारत को बनाने में किए जा रहे भ्रष्टाचार से अधिक खतरनाक होता है। यह अधिक खतरनाक इस मायने में भी होता है कि जो गरीब नौकरी के लिए रिश्वत देने की हालत में नहीं रहते हैं, उनका मन ऐसे हिन्दुस्तानी लोकतंत्र के लिए नफरत से भर जाता है, न सिर्फ सरकार बल्कि लोकतंत्र के सभी ढांचों से उन्हें नफरत हो जाती है। और ऐसे लोग न तो इस देश में कोई आत्मगौरव पाते हैं, और न ही सार्वजनिक सम्पत्ति के प्रति उनके मन में कोई दर्द रह जाता है। नैतिकता की तमाम नसीहतें देने वाले नेता उन्हें जालसाज और धोखेबाज दिखते हैं। लोगों को याद होगा कि कई बरस पहले मध्यप्रदेश में मेडिकल कॉलेजों में दाखिले के लिए हुए इम्तिहान लेने वाली व्यापम नाम की संस्था के व्यापक भ्रष्टाचार का मामला अदालत तक पहुंचा था। व्यापम मध्यप्रदेश में सरकारी नौकरियों में भर्ती का काम भी करती थी। इसके चयन में इतना बड़ा संगठित भ्रष्टाचार चल रहा था कि अभी तक उस मामले का पूरा पर्दाफाश नहीं हो पाया है जबकि दस बरस होने को हैं। मामले के इतना लंबा चलने से इससे जुड़े हुए तीस-चालीस गवाह और आरोपी रहस्यमय तरीके से मर गए या मार दिए गए, और अभी तक इस व्यापक जुर्म का पूरा खुलासा सामने नहीं आया है। लोगों को यह भी याद होगा कि हरियाणा के एक भूतपूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला को भी शिक्षक भर्ती में भारी रिश्वतखोरी की वजह से दस बरस की कैद हुई थी, और उसके बेटे अजय चौटाला को भी इतनी ही कैद हुई थी।

हिन्दुस्तान में सरकारी नौकरियों में भर्ती बड़े पैमाने पर होने वाले भ्रष्टाचार का एक मौका रहता है। सत्ता कभी भी इतनी कमाई हाथ से जाने नहीं देती है। और जो 20 करोड़ रूपये नगदी पश्चिम बंगाल के मंत्री की करीबी महिला से मिले हैं, उसे बहुत थोड़ा सा मानना चाहिए क्योंकि ममता सरकार में तो हर किसी को यह मालूम था कि वे केन्द्रीय जांच एजेंसियों के निशाने पर हैं, और उन्हें लगातार सावधान रहना है। इसके बावजूद अगर वे इस तरह से इस हद तक नोटों में डूबे हुए मिल रहे हैं, तो उनके पूरे भ्रष्टाचार का अंदाज लगाना अधिक मुश्किल नहीं है। देश का कानून जितनी नगद रकम रखने की छूट देता है, उससे हजार गुना अधिक नगदी अगर इस तरह से मिल रही है, और भ्रष्टाचार के सुबूत मिल रहे हैं, तो फिर इसे कौन मोदी सरकार की बदले से की गई कार्रवाई करार दे सकते हैं? बदले की कार्रवाई भी जरूर होती होगी, लेकिन 20 करोड़ के नोटों के जखीरे पर बैठकर किसी को बदले की कार्रवाई की शिकायत करने का हक नहीं रह जाता। देश की बाकी सरकारों को भी इससे सबक लेना चाहिए। हमारे कहने का मतलब यह नहीं है कि उन्हें नोट छुपाने के बेहतर रास्ते निकालने चाहिए, बल्कि यह है कि ऐसा भ्रष्टाचार खत्म करना चाहिए जिसने चौटाला और उसके बेटे को दस-दस बरस जेल में रखा। अगर उनके पास हजारों करोड़ की काली कमाई भी होगी, तो भी दस बरस की कैद के मुकाबले वह भला किस काम की?

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