अब क़फ़न पर भी लगेगा GST..

-सुनील कुमार॥

हिन्दुस्तान में आज से रोजमर्रा की चीजों और कामकाज पर टैक्स का ढांचा बदल रहा है। सामानों की ऐसी लंबी फेहरिस्त है जिस पर लोगों को अधिक जीएसटी चुकाना होगा। अखबारों की सुर्खियां इस बारे में बताती हैं कि गेहूं, चावल, आटा, मैदा जैसी अधिकतर चीजें आज से महंगी हो जाएंगी फिर चाहे वे किसी ब्रांड की चीजें न हों, और सिर्फ पैकेट में बंद की हुई चीजें हों। खाने-पीने की दूसरी चीजों, जैसे मुरमुरा, दही, पनीर, मखाना, सोयाबीन, मटर पर भी अब जीएसटी लगना शुरू हो रहा है, और पांच फीसदी जीएसटी लगेगा। केन्द्र सरकार को पता नहीं कितने छोटे-छोटे सामानों पर गौर करके जीएसटी लगाने या बढ़ाने की फुर्सत थी, अब चाकू, कागज काटने के चाकू, और पेंसिल शार्पनर पर भी अठारह परसेंट जीएसटी लगेगा। और तो और अंतिम संस्कार भी GST से अछूता नहीं रह, सूत से बनने वाले कपड़े भी अब जीएसटी के दायरे में आ गया और मलमल भी सूत से ही बुना जाता है जबकि शवदाहगृह बनाने के वर्कऑर्डर पर अठारह फीसदी जीएसटी लगेगा। हजार रूपये से नीचे रोज वाले होटल कमरों पर भी अब बारह फीसदी जीएसटी लगना शुरू हो रहा है, और पांच हजार रूपये रोज से अधिक के अस्पताल के कमरों पर भी जीएसटी थोपा गया है। लोगों का इस बारे में कहना है कि आजादी के बाद पहली बार अनाज पर टैक्स लगाया गया है।

सरकारों को वैसे तो अपनी मर्जी से टैक्स लगाने की आजादी रहती है लेकिन आज देश वैसे भी महंगाई से कराह रहा है, पेट्रोल-डीजल और गैस के दाम अकल्पनीय हो चुके हैं, और जो लोग केन्द्र सरकार को धार्मिक भावना से पूजते हैं उनके अलावा कोई भी लोग इसे बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं। पूरे देश भर में रेलगाडिय़ां जगह-जगह रद्द हो रही हैं, रेलभाड़ा बढ़ते जा रहा है, प्लेटफॉर्म टिकट और से और महंगी होती जा रही है। और अब खाना-पीना, बिल्कुल ही आम घरेलू और मध्यमवर्गीय खाना-पीना जिस हिसाब से महंगा होते चल रहा है, वह लोगों की बर्दाश्त के बाहर है। देश में बहुत बुरी तरह बेरोजगारी है, लोगों की तनख्वाह जहां-तहां घटा दी गई है, वेतन और मजदूरी का भुगतान समय पर हो नहीं रहा है, और ऐसे में बुनियादी जरूरतों का लोगों की पहुंच से बाहर होते जाना पता नहीं लोग कैसे बर्दाश्त करेंगे। भारत के ठीक बगल में श्रीलंका आज बेकाबू आर्थिक बदहाली के चलते एक अराजक हालत में पहुंच चुका है, पाकिस्तान में भी चीजें सरकार के काबू से बाहर हो गई हैं, और इनके बीच बसा हिन्दुस्तान आज से यह नई तकलीफ भुगतने वाला है। ऐसे में सोशल मीडिया पर तैरते वे तमाम पोस्टर जायज लगते हैं जो कि मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार के वक्त गैस सिलेंडर पांच सौ रूपये के भीतर का रहने पर भी स्मृति ईरानी सिलेंडर लेकर सडक़ों पर चीखती दिखती थीं, और अब वही सिलेंडर ग्यारह सौ रूपये से अधिक का होने के बाद भी सरकार बेफिक्र है क्योंकि जनता धार्मिक, साम्प्रदायिक, और भावनात्मक मुद्दों में डूबी हुई है, और उसे अपनी जिंदगी के दुख-दर्द का अहसास कम होने के लिए एक राष्ट्रवादी एनस्थीसिया मिल गया है।

लेकिन लोगों का क्या होगा? सबसे गरीब तबका तो फिर भी रियायती अनाज पाकर अपनी जरूरतों को बुरी तरह तंग रखकर जी लेता है, लेकिन मध्यमवर्गीय तबके को जो ताजा कोड़ा आज से लगने जा रहा है, उसके लिए उसके पास कोई मरहम भी नहीं है। ऐसा लगता है कि आज से आम हिन्दुस्तानी जिंदगी दस फीसदी महंगी होने जा रही है। यह सोचना अकल्पनीय है कि पेंसिल शार्पनर पर अठारह फीसदी टैक्स लगाने की बात भी कोई सरकार सोच सकती है। सबसे गरीब बच्चे के लिए भी पढ़ाई में जरूरी इस बुनियादी सामान पर टैक्स लगाने का मतलब यह हुआ कि अब करोड़ों की कारों में चलने वाले लोगों पर लगाने के लिए कोई टैक्स बचा ही नहीं है?

आज हिन्दुस्तान की खबरों में जितना हिन्दुस्तान है, उतने का उतना श्रीलंका भी छाया हुआ है। इसलिए यह याद रखने की जरूरत है कि 2019 में अपार बहुमत पाकर जो सरकार सत्ता में आई थी वह आज 2022 में मुंह छुपाकर देश छोडऩे पर मजबूर हो गई है, और जनता वहां राष्ट्रपति भवन में घुसकर कब्जा करके बैठी है, और जनता का एक दूसरा हिस्सा जाकर प्रधानमंत्री के निजी घर को जलाकर खाक कर रहा है। बहुमत से आई सरकार भी भूख और अभाव को किसी सीमा तक ही लाद सकती है, और आज हिन्दुस्तान लगातार ऐसी तस्वीरों और वीडियो से लद गया है जिनमें गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को कोसते हुए रूपये के दाम गिरने को प्रधानमंत्री के गिरने के बराबर बता रहे थे, और आज वह रूपया एक डॉलर में अस्सी से भी अधिक चढ़ रहा है। हो सकता है कि महंगाई को झेलते हुए हिन्दुस्तानी जनता के बीच अगले आम चुनाव के पहले हकीकत का एक ऐसा अहसास लौटकर आए जो कि राष्ट्रवादी उन्माद और झूठे गौरव के चमकते रंगीन बुलबुले में पिन चुभा दे।

देश की विपक्षी पार्टियों और जनसंगठनों को महंगाई के इस ताजा बोझ के खिलाफ एक होकर आवाज उठानी चाहिए। एक तरफ जब देश की हर सार्वजनिक सम्पत्ति बेची जा रही है, जब देश के कुछ चुनिंदा बड़े कारोबारी अपनी दौलत में गुणा करते जा रहे हैं, तब सबसे आम लोगों की पीठ और कमर तोड़ देने वाला यह बोझ बर्दाश्त करने लायक नहीं है, और जनता की फिक्र करने वाले जितने भी तबके हैं उन्हें मिलकर इस ताजा बढ़ोत्तरी को पूरी तरह खारिज करवाने की कोशिश करनी चाहिए। अगर यह आजाद भारत में बुनियादी जरूरत के अनाज पर, खान-पान पर पहली बार लगने वाला टैक्स है, तो यह आजादी का किस तरह का अमृत महोत्सव है?
यह नौबत देखकर अदम गोंडवी का लिखा याद आता है- सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद हैं, दिल पे रखकर हाथ कहिए देश क्या आजाद है?

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