संदेह के आधार पर गैरजिम्मेदाराना लम्बी कैद..

अदालतों में लंबित मुकदमे और जेलों में विचाराधीन कैदियों की बढ़ती संख्या किसी भी लोकतांत्रिक, उदारवादी सरकार के लिए चिंता का विषय होनी चाहिए। भारत में भी इसे लेकर समय-समय पर विमर्श किया जाता है, लेकिन उसका कोई सार्थक परिणाम अब तक नहीं निकला है। ऐसा लगता है कि ये विमर्श मौसमी होते हैं, और इसलिए इनका स्थायी फल नजर नहीं आता। अभी कुछ दिनों पहले ही देश की जेलों में विचाराधीन कैदियों की बढ़ती संख्या पर चिंता जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा है कि वो अलग से एक जमानत कानून लाने पर विचार करे। अदालत ने कहा कि लोकतंत्र पुलिस तंत्र जैसा नहीं लगना चाहिए क्योंकि दोनों धारणात्मक तौर पर ही एक दूसरे के विरोधी हैं। अब लोकतंत्र पुलिस तंत्र जैसा क्यों लग रहा है, यह अलग विचारणीय मुद्दा है।

पुलिस तंत्र जिसकी लाठी, उसकी भैंस के सिद्धांत पर काम करता है। सत्ताधारियों की राह में जो लोग किसी भी किस्म की अड़चन पैदा करते हैं, उन्हें समाज और देश के लिए खतरा बताकर फौरन जेल की सलाखों के पीछे डाल देना, और बाद में आरोपपत्र दायर करना, अब नया चलन हो गया है। बिना किसी अपराध के इस वक्त देश के बहुत से बौद्धिक लोग जेल की सलाखों के पीछे हैं।

इनका कसूर शायद यही है कि इन्होंने अपने कामों से किसी किस्म की जागरुकता फैलाने का काम किया, जनता को उसके हक याद दिलाए। इन लोगों को जमानत न मिले और अगर एक मामले में जमानत मंजूर हो जाए, तो फौरन दूसरा आरोप उन पर लग जाए, यह पुख्ता तैयारी भी पहले से है। यह कार्यशैली पुलिसतंत्र की पहचान है। जिस वक्त देश में आजादी का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है और लोकतंत्र की पहचान संसद को स्थानांतरित करने की तैयारी हो रही है, तब लोकतंत्र बनाम पुलिसतंत्र पर बहस को कितनी जगह मिलेगी, पता नहीं।

बीती 11 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस एमएम सुंदरेश की खंडपीठ ने सतेंद्र कुमार अंतिल बनाम केंद्रीय जांच ब्यूरो मामले की सुनवाई के दौरान अपने फैसले में कहा कि अंधाधुंध गिरफ़्तारियां औपनिवेशिक मानसिकता का संकेत हैं। अदालत ने ‘ज़मानत नियम है और जेल एक अपवाद है’, कानून के इस प्रसिद्ध सिद्धांत को आधार मानते हुए कहा कि अनावश्यक गिरफ़्तारियां सीआरपीसी की धारा 41 व 41(ए) का उल्लंघन हैं। शीर्ष अदालत ने निजी स्वतंत्रता की अहमियत पर जोर देते हुए कहा कि जेलों में कुल कैदियों में से कम से कम दो तिहाई विचाराधीन कैदी हैं, जिनमें से अधिकांश ऐसे हैं जिनकी गिरफ्तारी की कोई जरूरत नहीं थी। अदालत ने केंद्र सरकार को ज़मानत के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश लाने के लिए नया ज़मानत कानून बनाने के लिए सख्त हिदायत दी है।

अदालत की फटकार और नसीहत का क्या नतीजा निकलता है, ये अगले कुछ महीनों में पता चल ही जाएगा। लेकिन ये संयोग ही है कि अदालत ने एक ओर अनावश्यक गिरफ्तारियों पर चिंता जतलाई और दूसरी ओर दंतेवाड़ा की एनआईए की अदालत ने 121 आदिवासियों को रिहा करने का फैसला सुनाया, जो यूएपीए सहित कई गंभीर मामलों में आरोपी बनाए गए थे और पिछले पांच सालों से जेल में कैद थे। गौरतलब है कि इन आदिवासियों को 24 अप्रैल 2017 को सुकमा ज़िले के बुरकापाल में हुए एक माओवादी हमले के बाद गिरफ़्तार किया गया था। इस हमले में 25 जवान शहीद हुए थे और 7 गंभीर रूप से घायल हुए थे। पुलिस ने इस हमले के बाद घटनास्थल के आसपास के गांवों से 122 आदिवासियों को गिरफ़्तार किया था। इनमें अधिकतर 19 से 30 साल की उम्र के थे। तब से अदालत का फैसला आने तक ये आदिवासी युवक जेल में ही थे, इनमें से एक की मौत भी जेल में हो गई। बीबीसी के मुताबिक एनआईए के विशेष न्यायाधीश ने अपने $फैसले में कहा, ‘इस प्रकरण में उपलब्ध किसी भी अभियोजन साक्षियों के द्वारा घटना के समय मौक़े पर इन अभियुक्तों की उपस्थिति और पहचान के संबंध में कोई कथन नहीं किया गया है। इन अभियुक्तों के पास से कोई घातक हथियार भी नहीं मिला था।’

विडंबना ये है कि इन आदिवासी युवकों के जीवन के पांच अनमोल साल कैद में केवल इसलिए बीत गए क्योंकि वे उस इलाके के रहने वाले थे, जहां माओवादी हमला हुआ। अगर संदेह के आधार पर इन युवकों को गिरफ्तार भी किया गया तो फिर जल्द से जल्द संदेह को पुष्ट करने के लिए सबूत पेश किए जाने चाहिए थे। लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। अभियुक्तों की संख्या अधिक थी, तो उन्हें पांच साल में केवल दो बार ही कोर्ट में पेश किया गया और कार्रवाई की धीमी रफ्तार के कारण उनकी बेगुनाही साबित होने में पांच साल लग गए। इन पांच सालों में राज्य की सत्ता बदल गई, दुनिया के हालात बदल गए, मानव सभ्यता उत्तर कोरोना काल में पहुंच गई, लेकिन 121 आदिवासियों का जीवन वहीं के वहीं अटका रहा। अब वे जेल से रिहा हैं, लेकिन उनके लिए आगे के हालात कैसे रहेंगे, ये अनुमान लगाना कठिन नहीं है।

माओवादी होने का ठप्पा एक बार लग गया, तो फिर वो आसानी से नहीं मिटेगा। उनकी रोजी-रोटी का प्रबंध कैसे होगा, समाज में सम्मान के साथ रहने की उम्मीदें कितनी बची होंगी, ये भी नहीं पता। इन युवकों को न्याय मिला या नहीं, इस पर विशेषज्ञ विचार करें, और ये भी सुनिश्चित करें कि आइंदा इस तरह संदेह के आधार पर हुई गिरफ्तारियों में फैसले लेने में कई बरस न लगें। अन्यथा अन्याय की प्रक्रिया जारी ही रहेगी।

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