गढ़ने होंगे नए शब्द..

18 जुलाई से संसद का मानसून सत्र शुरु होने जा रहा है, जिसमें सरकार के सामने प्रश्नों की झड़ी लगाने के लिए विपक्ष तैयारियों में जुटा हुआ है। महंगाई, बेरोजगारी, अर्थव्यवस्था में गिरावट जैसे स्थायी मुद्दों के अलावा इस बार अग्निपथ योजना, नुपूर शर्मा विवाद, जांच एजेंसियों का दुरुपयोग, रूपए में ऐतिहासिक गिरावट, किसानों से किए वादों को पूरा करना, चीन का अतिक्रमण, पत्रकारों की आवाज को खामोश करने की कोशिश, बाढ़ की तबाही, नया वन संरक्षण अधिनियम, अल्पसंख्यकों, दलितों और आदिवासियों के अधिकार समेत कई मुद्दे हैं, जिन पर विपक्ष सरकार से जवाब-तलब कर सकता है।

विपक्ष ने इससे पहले भी संसद सत्रों में इसी तरह सरकार की सवालों से घेराबंदी की है। विभिन्न विपक्षी दलों के नेता सदन में तथ्यों के साथ सरकार के सामने अपने सवाल रखते हैं और कई बार उसके फैसलों पर सवाल उठाते हैं। इस सिलसिले में अपनी बात का जोर बढ़ाने के लिए विपक्ष कई तरह के शब्दों का इस्तेमाल करता है। जैसे जुमलाजीवी, तानाशाह, चमचा, शर्मिंदा, विश्वासघात, पाखंड, अक्षम आदि-आदि। लेकिन अब लोकसभा सचिवालय ने मानसून सत्र से पहले एक सूची तैयार की है, जिसमें उन शब्दों को रखा गया है, जो अब असंसदीय कहलाएंगे। यानी इनका इस्तेमाल सदन के भीतर करना गलत माना जाएगा और सदन की कार्रवाई के आधिकारिक ब्यौरे में इन्हें दर्ज नहीं किया जाएगा।

संसद और विधानसभाओं में पहले भी ऐसे शब्दों पर रोक लगाई जा चुकी है, जिनसे सदन या निर्वाचित सदस्यों के मर्यादा मर्दन की आशंका रहती है। संसद और विधानसभाएं महज ईंट-पत्थर से बनी इमारतें नहीं हैं, यहां लोकतंत्र का दिल धड़कता है। जनता जिन्हें अपना प्रतिनिधि बनाकर इन सदनों में बिठाती है, उनकी जिम्मेदारी होती है कि वे जनता से जुड़ी और देशहित की बातों को सदन के पटल पर रखें। अपने क्षेत्र की समस्याओं और देशव्यापी मसलों पर सार्थक चर्चा करें। जो दल बहुमत से सरकार बनाता है, उस का यह कर्तव्य होता है कि वह विपक्ष के सवालों का जवाब दे, मुंह चुराकर भागे नहीं। लेकिन सत्ता पर बने रहने की राजनीति के कारण अब सत्तारुढ़ दल जवाब देने की जगह विपक्ष को खामोश कराने के नए-नए तरीके अख्तियार करने लगा है।

असंसदीय शब्दों की नयी सूची इसका एक उदाहरण है। ऊपर उदाहरणस्वरूप दिए गए शब्दों के अलावा दोहरा चरित्र, निकम्मा, नौटंकी, ढिंढोरा पीटना, बहरी सरकार, अराजकतावादी, शकुनि, जयचंद, विनाश पुरुष, खालिस्तानी, खून से खेती, चाण्डाल चौकड़ी, गुल खिलाए, पिठ्ठू, दलाल, घड़ियाली आंसू, चिलम लेना, छोकरा, कोयला चोर, गोरू चोर, चरस पीते हैं, सांड, लॉलीपॉप जैसे शब्द असंसदीय शब्दों की सूची में शामिल हैं। किसी शब्द को किस आधार पर असंसदीय कहा जा सकता है, इसका विश्लेषण हम पहले कर चुके हैं।

लेकिन इस नयी सूची में जो शब्द शामिल किए गए हैं, उनमें से अनेक शब्द ऐसे हैं जिनका इस्तेमाल मौजूदा विपक्ष ने सरकार के लिए विशेषण के तौर पर किया है। जब सदन के भीतर सरकार उन लोगों को आंदोलनजीवी कह सकती है, जो सरकार के विरोध में शांतिपूर्ण आंदोलन करते हैं, तो फिर जुमलाजीवी शब्द असंसदीय क्यों माना गया। जब रेनकोट पहनकर नहाना असंसदीय नहीं माना गया है, तो फिर विनाश पुरुष को असंसदीय क्यों माना गया है। सत्ता जब मन की बात से संचालित होने लगे तो क्या वह तानाशाही नहीं कहलाती है। जब संसद की चौखट पर मत्था टेकने और संविधान की शपथ लेने के बाद भी संवैधानिक संस्थाओं, पदों और मर्यादा का ख्याल न रखा जाए और एक विशेष धर्म को बढ़ावा दिया जाए, तो फिर इस व्यवहार के लिए पाखंड जैसे शब्दों का इस्तेमाल गलत कैसे हो सकता है। जब सत्ता के शीर्ष पर बैठा व्यक्ति गाहे-बगाहे आंसू बहाता नजर आए, लेकिन बड़ी त्रासदियों पर जिसके माथे पर शिकन भी न पड़े, तब घड़ियाली आंसू की उपमा ही याद आती है।

असंसदीय शब्दों की सूची में कई अलग-अलग शब्द हैं, लेकिन इनमें से अधिकतर में एक बात सामान्य है कि इन शब्दों का इस्तेमाल विपक्ष ने अक्सर सरकार को घेरने के लिए किया है। संसद के हर नए सत्र के साथ विपक्ष के सवालों या विरोध से बचने के लिए एक नया तरीका ईजाद होते देश देख रहा है। इस बार ये तरीका असंसदीय शब्दों की सूची के तौर पर सामने आया है। इस सूची को तैयार करने वालों को यह उम्मीद होगी कि जब विपक्ष इन शब्दों का उपयोग नहीं कर पाएगा, तो सरकार की घेराबंदी ढीली पड़ जाएगी। अगर वाकई ऐसी कोई उम्मीद बांधी गई है, तो यह शुतुरमुर्ग की तरह रेत सिर में घुसाने के समान है। क्योंकि विपक्ष अब भी इतना शक्तिहीन नहीं हुआ है कि उसे सरकार की गलत बातों के विरोध के लिए चंद शब्दों की दरकार हो। इतिहास गवाह रहा है कि विपक्ष को हल्के में लेने की प्रवृत्ति ने सत्ता की जड़ों को कमजोर कर दिया है।

बहरहाल, विपक्ष के साथ-साथ अब भारत के लेखक समुदाय के सामने अब एक नयी चुनौती आ गई है कि वह असंसदीय ठहराए गए शब्दों का विकल्प तलाशे या नए शब्दों को गढ़ना शुरु करे। वैसे भी भाषा की समृद्धि तभी होती है, जब उसमें साल दर साल नए शब्द जुड़ते जाएं। और भारत में तो भाषाओं और बोलियों का अथाह सागर लहराता है, बस उसमें से नायाब मोती चुनने की देर है। निकम्मा न कहें, बिना काम का कह दें, शकुनि न कहें गांधार नरेश कहें या विनाश पुरुष की जगह बर्बादे-आजम कह दें। मुक्तिबोध ने कहा है अभिव्यक्ति के सारे ख़तरे उठाने ही होंगे, तोड़ने होंगे ही मठ और गढ़ सब। हम कह रहे हैं, गढ़ने होंगे ही नए शब्द और शब्द-युग्म सब।

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