इंसानी अंगों की खरीद फरोख्त और कानून

-सुनील कुमार॥

तमिलनाडु के चार अस्पतालों को सरकार बंद करवा रही है जिन पर यह आरोप है कि उन्होंने सोलह बरस की एक लडक़ी की मां और उसके सौतेले पिता के साथ मिलकर उसके अंडे गैरकानूनी तरीके से निजी गर्भाधान मेडिकल सेंटरों को बेचे। तमिलनाडु सरकार ने अपनी जांच में छह अस्पतालों को ऐसा करने का गुनहगार पाया है जिनमें से एक केरल और एक आन्ध्र में भी हैं। जांच में यह पता लगा कि इस नाबालिग लडक़ी को कागजातों में जालसाजी करके, नकली आधार कार्ड इस्तेमाल करके शादीशुदा बालिग बताया गया, और उसके अंडे निकाले गए। भारत में मेडिकल सहायता से गर्भाधान को लेकर बनाए गए कानून बड़े साफ हैं। जांच में यह भी पता लगा कि अस्पताल के डॉक्टरों को यह मालूम था कि इस लडक़ी का आधार कार्ड फर्जी है, और किसी और आदमी ने उसका पति बनकर सहमति के कागजात पर दस्तखत किए थे। पुलिस ने इस लडक़ी की मां और सौतेले पिता को गिरफ्तार कर लिया है, और इस मामले से जुड़े दो और लोग भी गिरफ्तार हैं। इस नाबालिग लडक़ी ने अपनी शिकायत में कहा था कि 2017 से अब तक उसे आठ बार अस्पताल ले जाकर उसके अंडे निकाले गए। उसकी यह भी शिकायत है कि उसका सौतेला पिता पांच बरस से उसका यौन शोषण कर रहा है। किसी लडक़ी या महिला से निकाले गए ऐसे अंडे 25-30 हजार रूपये में खरीदकर गर्भाधान केन्द्र उनका इस्तेमाल करते हैं।

भारत में एक तरफ तो गर्भाधान से जुड़े हुए कानून बहुत कड़े हैं, और कई प्रदेशों में अब तक अंग प्रत्यारोपण जैसे जीवनरक्षक कानून बनाए ही नहीं गए हैं। छत्तीसगढ़ में भी इसके नियम बनाने के लिए एक कमेटी की चर्चा साल-छह महीने पहले हुई थी, उसके बाद से उसकी भी कोई खबर नहीं है। भारत में किराए की कोख, यानी सरोगेसी से बच्चे के जन्म को लेकर कानून बहुत कड़ा बना दिया गया है, और कड़े कानून के बीच छेद करके रास्ता निकालने का दाम मुजरिमों को हमेशा ही ज्यादा देना पड़ता है। किडनी प्रत्यारोपण देश में सबसे अधिक मांग वाली प्रत्यारोपण-सर्जरी है, और इस काम में भी बड़े-बड़े गिरोह लगातार लगे रहते हैं, कभी-कभी पकड़ाते भी हैं। लोगों को याद होगा कि आज से चौथाई सदी पहले जब किडनी ट्रांसप्लांट को लेकर देश में कोई कानून नहीं थे, और गरीब लोग अपनी जरूरत के लिए किडनी बेचने तैयार रहते थे, और इसी तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में एक पूरी बस्ती ऐसी है जिसके हर मकान में बदन पर चीरा लगे हुए लोग हैं जो कि किडनी निकालने के बाद का बचा निशान है। हिन्दुस्तान नए कानून बनाने और मौजूदा कानूनों को और अधिक कड़ा करने का शौक रखने वाला देश है। इसके बाद बहुत संगठित रूप से कानूनों को तोडऩे का सिलसिला शुरू होता है।

दरअसल इस देश में जिस संसद और जिन विधानसभाओं पर कानून बनाने का जिम्मा है, उनके भीतर दलबदल को रोकने के लिए जो कानून बनाया गया है, उसमें कम से कम एक तिहाई सदस्यों की शर्त को अधिक कड़ा करके कम से कम दो तिहाई कर दिया गया, और अब बड़े मजे से दो तिहाई लोग भी दलबदल के लिए जुट जा रहे हैं। कानून को बनाने का मकसद धरे रह गया, अब उसकी शक्ल यह हो गई है कि उसे तोडऩे के लिए बहुत बड़ी ताकत रखने वाले लोगों की जरूरत है। हर कानून कड़ा होते-होते कमजोर लोगों के तोडऩे लायक नहीं रह जाता, लेकिन सबसे बड़े बाहुबलियों के लिए इस देश में हर कानून को तोडऩे का विकल्प रखा गया है, और इसी के तहत देश के बड़े-बड़े अस्पतालों में इंसानी बदन के हिस्सों की बिक्री और उन्हें निकालने-लगाने के संगठित गिरोह काम कर ही रहे हैं।

कुछ लोगों का यह भी मानना है कि संसद और विधानसभाओं में ऐसे जटिल पहलुओं वाले कानूनों को बनाते समय जो चर्चा होनी चाहिए वह राजनीतिक गुटबाजी और सत्ता की जिद के चलते नहीं हो पाती है। सदनों में बहस का स्तर गिरता जा रहा है, बहस का वक्त घटते जा रहा है, और सांसद-विधायक इस बात के लिए उदासीन रहते हैं कि किसी खास विषय पर बहस करते हुए वे जानकारी लेकर और मुद्दे को समझकर आएं। नतीजा यह होता है कि कई कानून ऐसे बन जाते हैं जिन पर अमल मुश्किल होता है, जिनके बीच मुजरिमों के लिए रास्ते रहते हैं, और जिनसे कमजोर-गरीबों को दिक्कत होती है, और पैसों की ताकत इन कानूनों को तोड़ लेती है। चिकित्सा से जुड़े हुए बहुत से कानूनों का यही हाल है, संसद में बहस का वक्त पार्टियों के एक-दूसरे पर हमले में गुजर जाता है, सांसद ऐसे भाषण में जुट जाते हैं जिसका वीडियो उनके मतदाताओं पर असर डाल सके, और कानून की बारीकियों पर ठीक से चर्चा भी नहीं हो पाती।

जब देश की संसद और विधानसभाएं खुले दिमाग से विचार-विमर्श की संभावनाओं को पूरी तरह से कुचल देने के बाद ही काम करती हैं, तो यही होता है। ऐसे कानून बनते हैं जिसके तहत गरीब जरूरतमंद अपने बदन के हिस्सों को बेचते हैं, पैसे वाले उन्हें खरीदते हैं, और कानून इन अस्पतालों के गलियारों में पोंछा लगाता है। ऐसा लगता है कि इस देश में निजी चिकित्सा कारोबार का निर्वाचित प्रतिनिधियों और पार्टियों पर आर्थिक दबदबा इतना है कि उनके कारोबारी हितों के खिलाफ सदनों में चर्चा भी नहीं होती। अमरीका जैसे देश में तो हर कारोबार को अपनी बात से सांसदों को सहमत कराने वाले कानूनी लॉबिंग करने वाले लोगों को भाड़े पर रखने की छूट है। हिन्दुस्तान में ऐसी कोई छूट नहीं है, इसलिए सांसद-विधायक खरीदने कारोबारी खुद ही जाते हैं, और लोगों को याद होगा कि ऐसी खरीद-बिक्री के कुछ स्टिंग ऑपरेशन सामने आने के बाद कई सांसदों की सदस्यता भी खत्म हुई थीं। आज भी बहुत से कानून देखकर ऐसा लगता है कि उनके पीछे स्टिंग ऑपरेशनों से बचकर काम करने की कामयाबी रही है।

लेकिन हम किसी कानून के खिलाफ नहीं हैं, और छत्तीसगढ़ जैसे जो प्रदेश अंग प्रत्यारोपण के कानून के तहत नियम नहीं बना सके हैं, वे अपनी जिम्मेदारी के प्रति लापरवाह हैं। ऐसे कानून न रहने से राज्य में जरूरतमंद मरीजों को भी उनके परिवार के लोगों से भी अंग नहीं मिल पा रहे हैं, और इसके लिए लोगों को महीनों तक दूसरे प्रदेशों के कई चक्कर लगाने होते हैं, और कागजी खानापूरी में बरसों निकल जाते हैं। इसलिए संसद और विधानसभाओं में जानकार बहस के बाद कानून बनना चाहिए, और उस पर अमल के लिए गैरसरकारी निगरानी-कमेटियां भी बननी चाहिए।

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