नए भारत की नई पहचान..

भारत को न्यू इंडिया में तब्दील करने की कोशिशें नए-नए रूपों में सामने आ रही हैं। अब ये कोशिश संसद भवन से होते हुए राष्ट्रीय चिह्न तक पहुंच चुकी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सोमवार, 11 जुलाई को सेंट्रल विस्टा के तहत बन रहे देश के नए संसद भवन की छत पर भारत के राष्ट्रीय चिह्न अशोक स्तंभ की प्रतिमा का अनावरण किया है। साढ़े 6 मीटर कांसे के बने अशोक स्तंभ का वजन 9500 किलो बताया जा रहा है।

गौरतलब है कि 20 हजार करोड़ के सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट में नई संसद के साथ-साथ प्रधानमंत्री का नया आवास और उपराष्ट्रपति का आवास समेत कई बहुमंजिला इमारतें बन कर तैयार हो रही हैं।सरकार का लक्ष्य है कि इस साल के अंत तक ये परियोजना पूरी तरह से साकार हो जाए। इसलिए कोरोना के वक्त जब देश के पहिए थम गए थे, तब भी सेंट्रल विस्टा का काम जोर-शोर से चल रहा था। केंद्र सरकार ने इस परियोजना को आवश्यक सेवा के तहत रखा था और इसके लिए ज़रूरी तमाम तरह की मंजूरी दे दी गई थी।

हालांकि विपक्ष ने तब इस का विरोध करते हुए कहा था कि जब देश में अर्थव्यवस्था पर पहले ही संकट आया है, तब एक अनावश्यक खर्चीला काम क्यों किया जा रहा है। कुछ लोगों ने इसके खिलाफ अदालत का दरवाजा भी खटखटाया था। लेकिन इसका कोई फायदा नहीं हुआ। सेंट्रल विस्टा का काम निर्बाध चलता रहा। सरकार का कहना है कि पुराने संसद भवन में आग या भूकंप से बचाव के इंतजाम नहीं है, लोगों के बैठने की जगह भी कम है। सरकार का ये भी कहना है कि सारे मंत्रालय एक ही जगह होंगे तो सरकार के काम करने की क्षमता भी बढ़ जाएगी।

ये सही है कि मौजूदा संसद भवन आधुनिक भवनों के समान नहीं है, लेकिन फिर भी उसका एक ऐतिहासिक और राजनैतिक महत्व है। यह भवन भारत के लोकतंत्र की ऐतिहासिक धरोहर है। यहां की वीथिकाओं में पं. नेहरू, डॉ. अम्बेडकर, सरदार पटेल, मौलाना आज़ाद, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, लाल बहादुर शास्त्री, ज़ाकिर हुसैन, इंदिरा गांधी, डॉ. राम मनोहर लोहिया, मधु दंडवते, अटल बिहारी वाजपेयी, जैसे एक से बढ़कर एक कद्दावर नेताओं की पदचाप दर्ज है। एक मजबूत भारत के निर्माण के लिए किए गए सघन विमर्शों की गूंज यहां मौजूद है। अब नए संसद भवन में मौजूदा सरकार अतीत के इन तमाम चिह्नों से परे अपनी नई पहचान बनाने में जुटेगी, उसे नए भारत का निर्माण जो करना है। जहां तक सवाल सरकार के काम करने की क्षमता बढ़ाने का है, तो इस डिजीटल युग में सारी चीजें दूर-दूर होते हुए भी एक साथ लाई जा सकती हैं।

दुनिया की कई बड़ी कंपनियां और संगठन केवल मुख्यालय में ही अपने सारे कार्यालयों को नहीं रखते। उनका काम सारी दुनिया में फैला होता है, फिर भी पूरी क्षमता और गुणवत्ता के साथ वे काम करते हैं। इस देश की पिछली सरकारों ने युद्ध जीतने की चुनौतियों से लेकर परमाणु बम बनाने, अंतरिक्ष की दूरियां नापने, हरित क्रांति और श्वेत क्रांति लाने तक के कई बड़े फैसले अलग-अलग जगहों पर बने मंत्रालयों के साथ ही किए हैं। क्योंकि अच्छा काम करने के लिए सरकारों के पास दृढ़ इच्छाशक्ति और व्यापक दृष्टिकोण होना चाहिए।

बहरहाल, सेंट्रल विस्टा परियोजना जल्द ही साकार नजर आएगी और अब उसमें अनावरण की शुरुआत भी हो गई है। श्री मोदी ने अपने दौर के राष्ट्रीय चिह्न का अनावरण किया है, लेकिन उस पर जो आपत्तियां उठ रही हैं, उस पर सरकार को गौर फरमाना चाहिए। श्री मोदी ने पूरे विधि-विधान के साथ पूजा करते हुए नए अशोक स्तंभ का अनावरण किया है। लेकिन प्रधानमंत्री सरकार के मुखिया हैं, संसद के दोनों सदनों का नेतृत्व वे नहीं करते हैं। एआईएमआईएम के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने इसी पर सवाल उठाए हैं। श्री ओवैसी ने कहा है कि संविधान संसद, सरकार और न्यायपालिका की शक्तियों का बंटवारा करता है। सरकार का मुखिया होने के नाते प्रधानमंत्री को संसद भवन के ऊपर राष्ट्रीय प्रतीक का अनावरण नहीं करना चाहिए था। लोकसभा के अध्यक्ष लोकसभा का प्रतिनिधित्व करते हैं और वे सरकार के अधीन नहीं आते हैं।

प्रधानमंत्री कार्यालय ने सभी संवैधानिक मानकों का उल्लंघन किया है। एक अन्य आपत्ति ये आई है कि बौद्ध धर्म के अनुयायी सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म की शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए कई स्तंभों और स्मारकों का निर्माण करवाया था। सारनाथ का अशोक स्तंभ भी उनमें से एक है। बौद्ध धर्म के प्रतीक का वैदिक रीति से पूजा-पाठ करते हुए अनावरण करने को भी कई लोगों ने गलत माना है। वैसे भी राष्ट्रीय महत्व के कार्यों में एक धर्म विशेष की पूजा पद्धति को बढ़ावा देना क्या उचित है, इस पर जनता को विचार करना होगा।

नए अशोक स्तंभ के अनावरण पर सबसे बड़ी आपत्ति इसके शिल्प को लेकर उठ रही है। सारनाथ के अशोक स्तंभ के जो चार सिंह हैं, वे शक्ति, साहस, आत्मविश्वास और गौरव के प्रतीक हैं। उनकी मुख मुद्रा में एक गरिमा और ठहराव महसूस किया जा सकता है। सारनाथ के सिंह सुडौल नजर आते हैं, जबकि सेंट्रल विस्टा के अशोक स्तंभ के सिंह तस्वीरों में बेडौल दिख रहे हैं। उनमें सुघड़ता का अभाव दिख रहा है। गुस्से से दहाड़ते सिंहों में एक अजीब सा विद्रूप भाव नजर आ रहा है। सिंहों की दहाड़ में गरिमा गायब है। बताया जा रहा है कि अशोक स्तंभ को तैयार करने का काम टाटा प्रोजेक्ट्स लिमिटेड को दिया गया था, कंपनी ने औरंगाबाद के मूर्तिकार सुनील देवरे को इस मूर्ति को रूप देने के लिए चुना था। श्री देवरे अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त कलाकार हैं और इस मूर्ति का क्ले मॉडल बनाने में उन्हें पांच साल लगे थे।

जाहिर है मूर्तिकार और उसके साथ लगे तमाम लोगों ने इस भारी-भरकम मूर्ति को तैयार करने में काफी मेहनत की, सरकार ने भी इसके लिए अच्छी-खासी धनराशि खर्च की होगी। लेकिन भारत की आत्मा की सौम्यता, सत्यमेव जयते का धैर्य और साहस इस मूर्ति में एकसार नहीं हो पाए। क्या ये नया अशोक स्तंभ ही अब नए भारत की पहचान होगा।

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