हिन्दुस्तानी गर्व बड़ी जल्दी उत्तेजना की हद तक पहुंचा..

-,सुनील कुमार॥

ब्रिटेन में प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन के इस्तीफे की खबर आने के बाद वहां की राजनीतिक परंपरा के मुताबिक सत्तारूढ़ पार्टी अपने भीतर उसका विकल्प ढूंढना शुरू कर रही है। और इसके लिए पार्टी के भीतर के नेता अपना दावा पेश कर सकते हैं, जिनमें से अधिक समर्थन वाले दो लोगों को छांटा जाएगा, और फिर उनके भीतर मुकाबला होगा। एक भारतवंशी कंजरवेटिव सांसद ऋषि सुनक ने वित्तमंत्री के पद से इस्तीफा दिया था, और अब उन्होंने यह दावा किया है कि वे अगला प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं ताकि विश्वास बहाल किया जा सके, अर्थव्यवस्था का पुनर्निर्माण किया जा सके, और देश को फिर से जोड़ा जा सके। ऋषि सुनक के दादा-दादी पंजाब से काम करने ब्रिटेन आए थे, और फिर उन्हीं के परिवार का यह लडक़ा पढऩे अमरीका गया, और लौटकर सांसद बना, ब्रिटेन का वित्तमंत्री बना, और अब प्रधानमंत्री बनने की दौड़ में शामिल है।

इस नाम पर खुशियां मनाते हुए हिन्दुस्तानियों को याद दिलाते हुए सोशल मीडिया पर किसी ने लिखा है कि आज हिन्दुस्तानियों का दिल बाग-बाग हो रहा है, लेकिन जब सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने का आसार दिख रहा था, तो उसके खिलाफ सिर मुंडाकर जमीन पर सोने के लिए हिन्दुस्तानी राजनेता तैयार थे। उल्लेखनीय है कि सोनिया गांधी की पार्टी को संसदीय बहुमत मिलने के बाद उनके प्रधानमंत्री बनने पर कोई रोक नहीं बची गई थी, और इसके खिलाफ सुषमा स्वराज ने लोकसभा में कहा था कि अगर वे प्रधानमंत्री बनती हैं तो मैं इस राष्ट्रीय शर्म में भागीदार नहीं बनूंगी, सिर मुंडवा लूंगी, सफेद साड़ी पहनूंगी, जमीन पर सोऊंगी, और सूखे चने खाऊंगी। खैर, सोनिया गांधी ने सुषमा स्वराज के लिए दिक्कतें खड़ी नहीं की थीं, और प्रधानमंत्री बनने से खुद ही इंकार कर दिया था। लेकिन हिन्दुस्तानियों को विदेशी मूल की भारतीय बन चुकी बहू को भी मंजूर करने में खासी दिक्कत होती है, लेकिन बिना किसी भारतीय योगदान के अमरीकी उपराष्ट्रपति बनने वाली कमला हैरिस के मूल पर उन्हें गर्व होता है।

हिन्दुस्तान भी गजब के पाखंडों से भरा हुआ देश है। जब तक कोई नए कारोबारी हिन्दुस्तान में काम करना चाहते हैं, यहां की सरकारें अपने भ्रष्टाचार से उनका खून तक निचोड़ लेना चाहती हैं। फिर जब वे दुनिया के कामयाब देशों में जाकर अपनी काबिलीयत से शोहरत और कामयाबी पा लेते हैं, तब भारत सरकार वहां जाकर उन्हें पूंजीनिवेश का न्यौता देती हैं। लेकिन जब तक वे, या वैसे लोग सीधे हिन्दुस्तान में काम शुरू करते हैं, तो सरकारी अड़ंगा उन्हें दो कदम भी आगे बढऩे से रोकता है। जब किसी तरह का विदेशी ठप्पा उनकी कामयाबी पर लग जाता है, तो वे भारतवंशी मान लिए जाते हैं, और भारत उन पर गौरव करने लगता है। अंग्रेजों के समय की गुलामी की सोच अब तक खत्म नहीं हुई है, और जब कोई गोरी सील किसी देसी कामयाबी पर लग जाती है, तो वह देसी प्यारा हो जाता है। इसलिए आज ऋषि सुनक हिन्दुस्तानियों की आंखों का तारा बना हुआ है, और उसके नाम से हिन्दुस्तानी राष्ट्रवाद के फतवे ट्वीट हो रहे हैं कि प्रधानमंत्री बनकर भारत से वहां गया सारा सामान वापिस भिजवाना, फिर ब्रिटेन को तोडक़र अंग्रेजी राज का बदला निकालना।

हिन्दुस्तान के अधिकतर लोगों को यह फर्क करने की फिक्र नहीं रहती कि परदेस में किसी भारतवंशी की कामयाबी में कितना बड़ा योगदान भारत का रहा है, और कितना उस देश का रहा है जहां पर वह सरकार रहने के बावजूद कामयाब हो सका है। भारत में सरकार रहने के बावजूद कामयाब हो पाना उससे कई गुना अधिक मुश्किल रहता है, और अधिकतर लोग संभावनाओं की ऐसी धरती पर जाकर काम करना बेहतर समझते हैं जहां पर सरकारें न कामकाज को काबू करती हैं, और न ही लोगों की कामयाबी की राह पर रोड़ा रहती हैं। हिन्दुस्तान की एक दिक्कत यह हो गई है कि बिना अपने किसी योगदान के भी वह इतना गौरव पा लेता है, उसमें इतना डूब जाता है कि उसे अपने खुद के खड़े गौरव को पाने लायक कोई काम करने की जरूरत लगती नहीं है। आमतौर पर हिन्दुस्तानी एक काल्पनिक इतिहास की कहानी गढक़र उसके गौरव के वारिस बनकर सिर ताने घूमते हैं, और प्लास्टिक सर्जरी से लेकर हर किस्म के विज्ञान का पेटेंट अपने ही दस्तखत से खुद ही को देकर खुश रहते हैं। बिना किसी नशे के इस हद तक, इस तरह खुश रहने वाला शायद ही और कोई समाज होगा। अब इस काल्पनिक इतिहास से परे आज का खरा कामयाब वर्तमान अगर दुनिया में कहीं भी है, और उससे कोई भारतवंशी जुड़ा हुआ है, तो वह तुरंत भारत की वजह से कामयाब करार दे दिया जाता है, और उसका अभिनंदन करने के लिए समारोहों के आयोजन के शौकीन लोग घूमने लगते हैं, जिनमें भारत की सरकार भी शामिल रहती है।

भारती मूल की कोई लडक़ी, भारत के किसी भी योगदान के बिना अगर किसी और देश से अंतरिक्ष की यात्रा पर जाती है, तो भी वह भारत के लिए उत्तेजक गौरव की बात हो जाती है, और फिर मानो वही गौरव हमारे लिए पर्याप्त कामयाबी हो जाता है, अपनी खुद की और कोई असल कामयाबी जरूरी नहीं रह जाती। कल्पना चावला अंतरिक्ष में चली जाए, और फिर हिन्दुस्तानी पीढ़ी झंडे-डंडे लेकर साम्प्रदायिक तनाव में डूबी रहे, तो भी देश किसी काल्पनिक इतिहास के गौरव में मदमस्त डूबा रहता है, और आज के साम्प्रदायिक वर्तमान के गौरव में भी। ऋषि सुनक को लेकर भारत के लोगों की ऐसी उत्तेजक, गर्वभरी उम्मीदें अंग्रेज अगर सुन लेंगे, तो उनके प्रधानमंत्री बनने की संभावनाएं ही खत्म हो जाएंगी कि भला ऐसे भारतवंशी को प्रधानमंत्री क्यों बनाया जाए जो ब्रिटिश संग्रहालयों को खाली करके सारी कलाकृतियां हिन्दुस्तान भेज देगा, और ब्रिटेन को तोडक़र भारत पर अंग्रेजी राज का बदला निकालेगा।

हिन्दुस्तानियों के गौरव की अनुभूति गजब है, और हिन्दुस्तानी समाज की सामूहिक चेतना के मनोवैज्ञानिक विश्लेषण की बड़ी जरूरत है।

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