एक हिन्दी प्राध्यापक ने इस मुल्क को दिखाया आईना..

-सुनील कुमार॥

हिन्दुस्तान की फिक्र करने वाले लोग यहां की भ्रष्ट हो चुकी कार्य-संस्कृति को लेकर बहुत निराश रहते हैं। लोगों को लगता है कि जापान की तरह की ईमानदारी अगर हिन्दुस्तानी लोगों में आ जाती, तो देश की उत्पादकता कई गुना बढ़ जाती, और जनता के पैसों की बर्बादी खत्म हो जाती। खैर, जापान सरीखा बनने में हिन्दुस्तानियों की सपनों की एक सिरीज लगेगी, और सस्ते में ऐसे सपने देखे भी नहीं जा सकेंगे। फिर भी देश में इक्का-दुक्का ऐसे लोग निकल जाते हैं जो कि बाकी हिन्दुस्तानियों में हीनभावना और अपराधबोध भरने का राष्ट्रद्रोह करते दिखते हैं। ऐसा ही एक मामला अभी बिहार के मुजफ्फरपुर में सामने आया जहां पर अम्बेडकर विश्वविद्यालय के हिन्दी के सहायक प्राध्यापक ने पौने तीन बरस अपनी कक्षाओं में छात्र-छात्राओं की हाजिरी शून्य रहने पर पूरी तनख्वाह, 23 लाख 82 हजार रूपये विश्वविद्यालय को लौटा दी। विश्वविद्यालय ने जब चेक लेने से आना-कानी की तो डॉ. ललन कुमार ने नौकरी छोड़ देने तक की बात की, आखिर विश्वविद्यालय को चेक लेना पड़ा। वे एक किसान परिवार से आकर बिहार में पढऩे के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय और जेएनयू से पढ़े, और गोल्ड मेडल प्राप्त, राष्ट्रपति सम्मान प्राप्त इस प्राध्यापक ने यह कहते हुए पैसा लौटाया कि अगर शिक्षक इसी तरह तनख्वाह लेते रहे तो पांच साल में उनकी अकादमिक मौत हो जाएगी। उनका कहना है कि हिन्दी में ग्यारह सौ छात्र-छात्राओं के नाम दर्ज हैं, लेकिन उनकी हाजिरी लगभग शून्य है, और ऐसे में उनका वेतन लेना अनैतिक होगा। सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने तीन दिन से चली आ रही इस खबर के साथ एक दूसरी खबर पोस्ट की है जो कुछ महीनों से सोशल मीडिया पर है, और बताती है कि आरएसएस के एक घोषित विचारक जो टीवी पर अक्सर संघ की विचारधारा रखते दिखते हैं, उन्होंने किस तरह भोपाल के माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय से बिना पढ़ाए लाखों रूपये वेतन लिया है।

जिस वक्त ये दोनों कतरनें सोशल मीडिया पर लगातार तैर रही हैं, उसी वक्त ट्विटर पर एक ऐसा वीडियो सामने आया है जिसमें रेलवे का एक टीटीई रोते-रोते बता रहा है कि किस तरह बिहार पुलिस के लोगों ने ट्रेन के भीतर उनसे टिकट पूछने पर उनकी जमकर पिटाई की, और उन्होंने महिला मुसाफिरों के हाथ-पैर जोड़े तो उन्होंने बीच-बचाव करके उन्हें किसी तरह बचाया, और डिब्बे के मर्द मुसाफिर बीच में नहीं पड़े, बचाने की कोई कोशिश नहीं की। अब यह भी हिन्दुस्तान की एक आम संस्कृति हो गई है कि अगर किसी पर हमला हो रहा है, तो उसे बचाने के लिए दूसरे लोग दखल नहीं देते। उस वक्त इस बात को भूल जाते हैं कि किसी वक्त ऐसा हमला उन पर भी हो सकता है, और उन्हें भी बचाने वाले नहीं मिलेंगे।

जो हिन्दुस्तान अपने किसी काल्पनिक गौरवशाली इतिहास का गुणगान करते हुए मदमस्त इठलाता रहता है, उसकी हकीकत ऐसी ही है। भरी सडक़ पर किसी दलित की नंगी पीठ पर गुंडे अगर अपना बेल्ट तोड़ रहे हैं, तो सैकड़ों तमाशबीन वीडियो बनाने की अपनी सबसे बड़ी नागरिक जिम्मेदारी पूरी करते रहते हैं। किसी अकेले बेबस को बचाने कोई आगे नहीं बढ़ते। अभी दो दिन पहले ही मध्यप्रदेश का एक वीडियो आया है कि किसी एक महिला के कंधे पर उसके पति को बिठा दिया गया है, और उस महिला के बाल खींचते हुए, उसे पीटते हुए गांव में उसका जुलूस निकाला जा रहा है, छोकरे उसे मार रहे हैं, वीडियो बना रहे हैं। कमउम्र लडक़ों को यही हिन्दुस्तानी संस्कृति विरासत में दी जा रही है, जो कि दुनिया के किसी भी सभ्य देश में एक पल के लिए भी बर्दाश्त नहीं होगी। दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों, महिलाओं, और गरीबों पर जुल्म का अंतहीन सिलसिला इस देश में चलता है, और शायद ही कोई ऐसा वीडियो सामने आया हो जिसमें लोगों ने भीड़ या गुंडों के ऐसे जुर्म को रोकने की कोशिश भी की हो। जहां पर तमाशबीन गुंडों से कई गुना अधिक रहते हैं, वहां भी कोई बचाने के लिए सामने नहीं आते।

विश्वविद्यालय के जिस प्राध्यापक की बात से आज की यह चर्चा शुरू हुई है, वैसे लोग विश्वविद्यालयों में भी कम हैं। छत्तीसगढ़ में उच्च शिक्षा विभाग ने एक ऐसा प्राध्यापक देखा है जिसे एक जिला मुख्यालय के कॉलेज में उनकी विशेषज्ञता का विषय पढ़ाने के लिए तैनात किया गया था। वह जगह उनके रहने के शहर से दो घंटे की दूरी पर थी। नतीजा यह हुआ कि उन्होंने उस कॉलेज में दाखिला लेने आने वाले हर छात्र-छात्रा का हौसला पस्त किया कि इस विषय को पढक़र क्या करोगे, इससे कोई नौकरी नहीं मिलेगी, दूसरा विषय ले लो। और फिर दो बरस ऐसे गुजारकर उन्होंने सरकार के सामने साबित कर दिया कि इस शहर में यह विषय कोई पढऩा ही नहीं चाहते, इसलिए उन्हें यहां से हटाया जाए। विचार के इस कॉलम में हम यह मिसाल इसलिए दे रहे हैं कि जब बिहार के इस प्राध्यापक को तनख्वाह लौटाते देखते हैं, तो आए हुए छात्र-छात्राओं को लौटाने वाला छत्तीसगढ़ का यह प्राध्यापक अनायास याद आ जाता है। यही अब भारत की संस्कृति हो चुकी है कि काम कैसे न किया जाए। भारतीय संस्कृति का झंडा लेकर उसके डंडे से दुनिया की बाकी तमाम संस्कृतियों पर हमला करने, और उन्हें हिकारत से देखने वाले हिन्दुस्तानी विश्वगुरूओं को यह बात समझ लेना चाहिए कि उनके नारों से दुनिया में उनका सम्मान नहीं बढ़ता। दाऊद इब्राहिम अगर किसी कलाकार से नोबल शांति पुरस्कार का मैडल बनवाकर उस पर अपना नाम लिख ले, तो उससे उसका सम्मान नहीं बढ़ जाएगा।

हिन्दुस्तान की आम संस्कृति में खामियां गहरी जड़ें जमा चुकी हैं। सरकारी नौकरियों के चक्कर में लोग इसलिए भी रहते हैं कि वहां बिना काम किए तनख्वाह मिलती है। कुछ ऐसा ही हाल सरकारों के सार्वजनिक प्रतिष्ठानों का रहता है, जिन्हें डुबाने में सरकार के बड़े लोगों के भ्रष्टाचार के साथ-साथ कर्मचारियों के निकम्मापन भी शामिल रहता है, और सबकी मिलीजुली मेहनत से इन संस्थानों को बेचने का बहाना मिल जाता है। यह पूरा सिलसिला किसी देश को तबाह करने वाला है, और हिन्दुस्तान काफी हद तक तबाह हो चुका है। सरकारी कामकाज में जगह-जगह हरामखोरी देख-देखकर अब हिन्दुस्तान के निजी क्षेत्रों में भी ऐसा ही हाल होने लगा है, और मुफ्तखोरी लोगों का पसंदीदा काम हो गया है। ऐसे में जब कोई एक प्राध्यापक बिना पढ़ाए मिली तनख्वाह को लौटाने पर उतारू हो जाता है, तो देश के बाकी लोगों को भी अपने-अपने काम के बारे में सोचना चाहिए।
-सुनील कुमार

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