विधायकों के प्लेन और होटल पर खर्च क्या अब भी चर्चा के लायक हैं?

-सुनील कुमार॥

सोशल मीडिया की मेहरबानी से किसी भी जलते-सुलगते मुद्दे पर खास से लेकर आम लोगों तक को अपने मन की बात कहने का मौका हासिल है। और इसी के चलते हुए अभी लगातार यह बात लिखी जा रही है कि महाराष्ट्र से शिवसेना के विधायकों को लेकर पहले भाजपा शासित गुजरात और फिर भाजपा शासित असम ले जाने वाले विमानों का खर्चा कहां से आ रहा है? लोग यह भी पूछ रहे हैं कि विधायकों का पहला बड़ा जत्था गुवाहाटी पहुंच जाने के बाद छोटे-छोटे जत्थों के लिए फिर से विमान जुटाने का खर्च कहां से आ रहा है? और एक बात यह भी उठ रही है कि पिछले कई राज्यों की राज्य सरकारें पलटने के वक्त सत्तारूढ़ पार्टी के बागी विधायकों को दूसरी पार्टी के राज्य वाले प्रदेश के महंगे होटल या रिसॉर्ट में ठहराने का खर्च कहां से आता है? बाढ़ में डूबे हुए असम में नदियों के पानी में लाशों के तैरने की तस्वीरें इंटरनेट पर तैर रही हैं, और ऐसे माहौल में ये सवाल बड़ी तल्खी के साथ उठाए जा रहे हैं कि महाराष्ट्र में सरकार पलटने के लिए यह पूरा खर्च कौन उठा रहा है? केन्द्र सरकार की एजेंसियां इसकी जांच क्यों नहीं कर रही हैं?

इस मुद्दे पर किसी का पक्ष लेने के बजाय हम इसकी बुनियादी बातों पर जाना चाहते हैं कि महाराष्ट्र जैसे राज्य में मुम्बई में किसी एक जमीन या इमारत पर कारोबारी इजाजत देने पर सत्ता को दसियों करोड़ रूपये मिल सकते हैं, और मिलते भी रहे होंगे। ऐसे में 25-50 लाख रूपये अगर विशेष विमानों और महंगी होटलों पर खर्च हो भी रहे हैं, तो उसे मुद्दा बनाने का मतलब असल मुद्दे को छोड़ देना है। अगर नीयत सांप को मारने की है, तो उसके गुजर जाने के बाद उसकी लकीर पर लाठी पीटने से क्या हासिल होगा? आज राजनीतिक पार्टियों की सत्ता जिस बड़ी दौलत में खेलती हैं, उसके सामने कुछ दर्जन विधायकों का हफ्ते-दस दिन किसी होटल में रहना कोई बड़ा खर्च नहीं है। और यह पहली बार भी नहीं हो रहा है।

लोगों को याद होगा कि अभी कुछ बरस पहले ही जब कर्नाटक में मुख्यमंत्री येदियुरप्पा की भाजपा सरकार में शामिल वहां के सबसे बड़े खदान कारोबारी और सरकार में मंत्री रेड्डी बंधु जब अपनी ही सरकार गिराना चाहते थे, तो वे बाढ़ में तबाह कर्नाटक के दर्जनों विधायकों को लेकर कई दिन आन्ध्र के हैदराबाद के किसी सात सितारा होटल में पड़े हुए थे। जैसे-जैसे राजनीति में भ्रष्टाचार बढ़ते चल रहा है, सत्ता की कमाई बढ़ते चल रही है, वैसे-वैसे सांसदों और विधायकों की खरीद-फरोख्त के रेट बढ़ रहे हैं, सौदेबाजी बढ़ रही है, और नई सत्ता पर पूंजीनिवेश करने के लिए बड़े कारोबारियों में उत्साह भी बढ़ रहा है। जो लोग राज्यों के कामकाज से वाकिफ हैं, वे जानते हैं कि राज्य की चुनिंदा ताकतवर कुर्सियों पर अपने पसंदीदा अफसरों को लाने के लिए बड़े कारोबारी बड़ा पूंजीनिवेश करने को एक पैर पर खड़े रहते हैं। यही हाल केन्द्र सरकार में कुछ खास मंत्रालयों के मामले में होता है जहां आने वाले अफसरों का अपनी मर्जी का होने के लिए देश के बड़े कारोबारी सरकार पर अपने सारे असर का इस्तेमाल करते हैं, जरूरत रहती है तो पेशगी भी देते हैं, और फिर किस्त भी बांध देते हैं। जिस देश में और उसके प्रदेशों में भ्रष्टाचार के पैमाने इतने ऊपर जा चुके हैं, वहां अगर महाराष्ट्र की नई सरकार अपनी मर्जी से बनवाने के लिए होटल, हवाई जहाज, और सुप्रीम कोर्ट के वकीलों पर दस-बीस करोड़ रूपये खर्च भी होने जा रहे हैं, तो इतनी रकम तो मुम्बई कीकिसी एक खास पुलिस-कुर्सी के लिए करने लोग तैयार रहते हैं।

हम किसी भी किस्म के भ्रष्ट पूंजीनिवेश की वकालत नहीं कर रहे हैं, लेकिन जब लोकतंत्र दांव पर लगा है, तब कुछ करोड़ के बिल पकडक़र उस पर बहस करने से असल मुद्दा तो धरे ही रह जाएगा। आज भारत की राजनीति में त्रिपुरा के माक्र्सवादी मुख्यमंत्री रहे माणिक सरकार जैसे आदर्शों की उम्मीद नहीं करना चाहिए जिनके चुनावी घोषणापत्र के मुताबिक उनके पास 10 हजार 8 सौ रूपये थे, और जो तनख्वाह पार्टी में जमा कर देते थे, और वहां से उन्हें गुजारे के लिए पांच हजार रूपये महीने मिलते थे। उनकी जिंदगी में केन्द्र सरकार की कर्मचारी रही पत्नी की पेंशन से भी मदद मिलती थी जिसने पति के मुख्यमंत्री रहते हुए भी पूरे वक्त रिक्शे से सरकारी दफ्तर आना-जाना किया करते थे। और माणिक सरकार ऐसी ईमानदारी वाले अकेले वामपंथी मुख्यमंत्री नहीं थे। उसी त्रिपुरा में उनके पहले नृपेन चक्रवर्ती मुख्यमंत्री रहे, और उनकी ईमानदारी का भी यही हाल रहा। नृपेन चक्रवर्ती जब मुख्यमंत्री निवास पहुंचे थे तो उनका सारा सामान टीन की एक पेटी में था। एक दशक बाद जब वे मुख्यमंत्री निवास से हेमेले हॉस्टल गए, तो रिक्शे पर उनके साथ वही एक पेटी गई। दस बरस मुख्यमंत्री रहते हुए इस पेटी में कोई नया सामान नहीं जुड़ा।

जिस देश ने ऐसे लोगों का और उनकी पार्टी का चुनावी नक्शे से नामोनिशान मिटा दिया है, उन्हें अब विशेष विमानों में एक होटल से दूसरे रिसॉर्ट जाने वाले विधायक और सांसद ही नसीब होने चाहिए, और नसीब हैं। इन छोटे-छोटे खर्चों को अगर कोई आज बड़ी मुद्दा मान रहे हैं, तो यह दाऊद इब्राहिम के स्टेडियम में सिगरेट पीने जितना बड़ा ही जुर्म है, जिस पर खूब लंबी बहस हो सकती है, उसके बाकी के तमाम जुर्मों को अनदेखा करते हुए। लोगों को लोकतंत्र के लिए मायने रखने वाले मुद्दों के पहलुओं को उनकी असल अहमियत के अनुपात में ही महत्व देना चाहिए। भारत की राजनीति अब गांधीवादी मूल्यों का खेल नहीं रह गई है। इसलिए अब कुछ करोड़ों के खर्च पर बहस खर्च करना सिवाय बेवकूफी के कुछ नहीं है। मुम्बई का शहरी विकास विभाग का एक छोटा सा अफसर यह पूरा खर्च उठा सकता है, और इतने से खर्च को लेकर भाजपा पर तोहमतें लगाना भी ठीक नहीं है। राजनीतिक दल होटल के कमरे, और प्लेन की सीट पर खर्च नहीं करते, वे संसद और विधानसभा के भीतर की सीटों को खरीदते-बेचते हैं। इसलिए सोशल मीडिया और बाकी मीडिया पर भी जो लोग विधायकों के जनवासे के खर्च पर सवाल उठा रहे हैं, उनकी मासूमियत पर तरस आता है।

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