हैवानों से भरा समाज

उत्तराखंड में हरिद्वार जिले के रुड़की से एक दिल दहलाने वाली खबर सामने आई है। यहां रात को चलती कार में छह साल की मासूम बच्ची और उसकी मां से सामूहिक बलात्कार का जघन्य अपराध किया गया है। पुलिस के अनुसार, रुड़की के पास मुस्लिम तीर्थस्थल पिरान कलियर से एक महिला अपनी छह साल की बेटी के साथ रात के वक्त रुड़की जा रही थी, रास्ते में एक कार सवार युवक ने उन्हें लिफ्ट देने के बहाने अपनी कार में बैठा लिया। कार में कुछ युवक पहले से मौजूद थे। उन लोगों ने मां और नन्ही बच्ची दोनों के साथ सामूहिक बलात्कार किया और उसके बाद दोनों को गंगा नहर किनारे कांवड पटरी पर छोड़कर चले गए। इसके बाद महिला आधी रात को किसी तरह से कोतवाली पहुंचीं और पुलिस को आप बीती सुनाई। पुलिस का कहना है कि पीड़िता कार सवार युवकों की संख्या तो नहीं बता पाई, लेकिन एक लड़के के नाम का जिक्र किया है। पुलिस के मुताबिक लड़की की मां भीख मांगकर आजीविका चलाती हैं और एक आश्रय गृह में रहती हैं। फिलहाल अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ धारा 376 (बलात्कार) और यौन अपराधों के खिलाफ बच्चों के संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है और पुलिस ने जांच शुरु कर दी है।

इस बीच दोनों पीड़िताओं की स्वास्थ्य जांच की गई है। बच्ची की हालत गंभीर है, और डॉक्टर उसके स्वास्थ्य पर नजर रखे हुए हैं। मां को तो दोहरे जख्म मिले हैं, उसकी पीड़ा की कल्पना भी नहीं की जा सकती। अपने साथ हुए अनाचार के साथ-साथ उसे अपनी बच्ची के साथ हुए दुष्कर्म की जो पीड़ा भोगनी पड़ी, वो असहनीय रही होगी। शरीर के जख्म शायद दवाओं से भर जाएं, लेकिन मन को मिले घावों का इलाज कैसे होगा। मां खुद को संभाले कि अपनी बच्ची का ख्याल रखे। और मासूम बच्ची जब कुछ सोचने-समझने की स्थिति में होगी, तब उसकी मानसिक अवस्था किस तरह की होगी। उस भयावह रात की यादें उसके दिल-दिमाग को कब तक डराएंगी। कैसे उन यादों का वो सामना करेगी। क्या उसकी जिंदगी कभी सामान्य हो पाएगी। क्या आश्रय गृह में रहने वाली इन मां-बेटी के लिए भविष्य का कोई सहारा रहेगा। अब तक उनका गुजारा भीख मांग कर होता था, तो अब वो बाकी जिंदगी किस तरह गुजारेंगी।

क्या गरीब और एकल मां के पालन-पोषण में बढ़ी बलात्कार की शिकार बच्ची के लिए समाज और सरकार सुरक्षित भविष्य का कोई वादा कर सकते हैं। अगर संवेदनशीलता जैसा कोई शब्द मायने रखता है, तो ये तमाम सवाल इस गंभीर घटना से उपजते हैं। अफसोस इस बात का है कि इस शब्द के मायने मौजूदा व्यवस्था में ढूंढना कठिन हो गया है।

रुड़की की घटना सामूहिक बलात्कार की पहली घटना नहीं है और तय मानिए अंतिम भी नहीं है। क्योंकि समाज में इंसानों की शक्ल में घूमते हैवानों की कमी नहीं है। हर साल एनसीआरबी महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों के आंकड़े जारी करता है। जिसे देखकर पता चलता है कि इस साल, इस राज्य में बलात्कार, छेड़खानी, या दहेज हत्या की इतनी-इतनी घटनाएं हुई हैं। ये आंकड़े पुलिस में दर्ज शिकायतों के आधार पर होते हैं। और जो शिकायतें दर्ज नहीं हो पाती, वो आंकड़ों में भी नहीं ढल पाती। बलात्कार के मामले में कभी कोई राज्य आगे रहता है, कभी कोई। अगर कहीं आंकड़े पिछले साल की तुलना में या पिछली सरकारों की तुलना में कम हुए, तो उनका बखान भी बढ़ा-चढ़ा कर होता है, मानो आंकड़े कम नहीं हुए, बलात्कार की घटनाएं ही खत्म हो गईं। अगर ऐसा हो पाता तो महिलाओं के लिए ये देश वाकई स्वर्ग बन जाता। फिलहाल तो यहां महिला होना, और उस पर गरीब, दलित या अल्पसंख्यक होना ही अभिशाप की तरह हो गया है।

महिलाओं की सुरक्षा का कोई इंतजाम मजबूत होने का दावा करने वाली सरकारें नहीं कर पाई हैं। लेकिन चुनावों में महिला सुरक्षा के वादे ऐसे बढ़-चढ़कर होते हैं, मानो किसी की सरकार बन गई तो महिलाएं वाकई बेखौफ होकर रात बारह बजे भी निकल सकेंगी। अभी कुछ महीने पहले संपन्न हुए चुनावों को ही याद कर लीजिए। उत्तरप्रदेश में भाजपा का दावा ऐसा ही था।

उत्तराखंड में भी भाजपा की ही सरकार है। लेकिन रात को भी महिला सुरक्षा का दावा शायद केवल उत्तरप्रदेश के लिए था, उत्तराखंड के लिए नहीं। वैसे राज्य कोई भी हो, सरकार किसी भी दल की हो, महिलाएं कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं, ये एक कड़वा सच है। इस सच से समाज भी भली-भांति परिचित है, फिर भी वह बेपरवाह बना हुआ है।
धर्म पर खतरे की बात से समाज उद्विग्न हो जाता है। धर्म की रक्षा के नाम पर मार-काट मचे या ऐतिहासिक इमारतें ध्वस्त हों, कोई फर्क नहीं पड़ता। परंपराओं और संस्कारों की रक्षा के लिए भी समाज चिंतित दिखता है, प्रेमी जोड़े बगीचे में दिखें या नदी में, उन्हें मारने-पीटने, कानून हाथ में लेने से नैतिकता के ठेकेदार पीछे नहीं हटते। कथा-कहानियों, नाटकों, फिल्मों से भी मान-मर्यादा पर खतरा समाज को नजर आ जाता है। लेकिन कमाल की बात है कि बलात्कार की भयावह घटनाओं को देख-सुन कर भी इस समाज का मन विचलित नहीं होता है। इतने संवेदनहीन और हैवानियत से भरे समाज में महिलाएं किस तरह अपनी सुरक्षा करें, यह विचारणीय है।

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