सवाल फोकस और एंगल का है..

-सर्वमित्रा सुरजन॥

बाढ़ में तटबंधों को तोड़कर सारी मर्यादाएं पानी उफान के साथ बहा कर ले जाता है, वैसे ही सत्तालोलुपता की बाढ़ में पिछले आठ सालों में देश में लोकतंत्र की मर्यादाएं, बंधन, नैतिकता, शिष्टाचार, संस्कार सब बह गए हैं। बाढ़ का ये पानी कब उतरेगा, कब नदी शांत होकर बहेगी, कुछ पता नहीं, क्योंकि नदी को बांध कर रखने वाली किनारे की मिट्टी को ही खोद दिया गया है। एंगल ये है कि पहले के जैसा कुछ भी न रह जाए।

साहब कार से उतरे। कुछ दूरी पर अभिवादन के लिए हाथ जोड़े लोग कतार में खड़े थे। एक सज्जन थोड़ा आगे आ गए। उन्हें साहब के आतिथ्य-सत्कार में अधिक अंक लाने थे। लेकिन जैसे डेढ़ होशियारी कभी-कभी भारी पड़ जाती है, कुछ यही हाल इन महाशय का भी हुआ। क्योंकि अतिउत्साह में इन्होंने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि वे साहब के कैमरे वाले एंगल को बिगाड़ रहे हैं। साहब और कैमरे के बीच कोई नहीं आ सकता, लाल स्याही से रेखांकित कर लीजिए, कोई भी नहीं। चाहे देश हो या विदेश, मामूली नेता हो या विदेशी राष्ट्रपति, जो कोई भी उनके और कैमरे के बीच आता है, वो उसे किसी न किसी तरह किनारे कर ही देते हैं या फिर खुद इस तरह खड़े हो जाते हैं कि कैमरे का फोकस उन पर ही हो। फोकस और एंगल, इन दो बातों की ही दरकार है, बाकी बातें तो बेकार हैं। तो हुआ यूं कि इन उत्साहित महाशय को साहब ने थोड़ा आगे करवाया, फिर थोड़ा पीछे करवाया, थोड़ा दाएं, थोड़ा बाएं, तब जाकर सही एंगल बना। इधर से उधर, उधर से इधर का अभ्यास साहब को राजनीति में भी खूब है, इसलिए वो अच्छे से जानते हैं कि कौन सी चीज, कहां फिट बैठेगी।

साहब ने उन महाशय को उनके सही स्थान पर फिट करवाया, फिर से नमस्कार करवाया और तब जाकर आगे बढ़े, जहां दूसरे लोग पहले से अपने निर्धारित स्थानों पर खड़े हुए हाथ जोड़कर उनका स्वागत कर रहे थे। बस इतने से फसाने पर ट्विटर पर हल्ला मचा हुआ था। कोई साहब को फिल्म का निर्देशक बता रहा था, कोई उनके कैमरा प्रेम पर तंज कस रहा था। जबकि ये कोई नई बात नहीं है। पहली बार तो कैमरे के आगे इस तरह की कवायद हुई नहीं है, जो इतनी चर्चा हो। बल्कि आठ सालों में तो देश में अब इन बातों को मामूली मान लेना चाहिए। मगर इस देश में अब भी स्वाभिमान और आत्मसम्मान जैसे शब्दों का भार उठाने की ताकत रखने वाले लोग हैं, जिन्हें कैमराजीवी लोग रास नहीं आते हैं और वो इस तरह की खबरों पर तीखी प्रतिक्रिया देने लगते हैं। जबकि भक्तों की निगाह में यह तिल का ताड़ बनाने वाली बात है। जैसे रामचरित मानस लिख कर तुलसीदास जी ने एक कालजयी ग्रंथ की रचना की है, लेकिन भक्त मानसिकता वाले किसी ने कहा है कि एक राम, एक रावन्ना। एक क्षत्री, एक बामन्ना। वा ने वा की सिया चुराई। वा ने वा से करी लड़ाई। बस इतनी सी बात भई और तुलसी रच दओ पोथन्ना।

तो सारा नजरिया एंगल का है। अभी कुछ दिन पहले की ही बात है, साहब एक उद्घाटन के लिए पहुंचे थे। वैसे तो सरकारी स्कूल में निरीक्षण के लिए शिक्षा अधिकारी भी आते हैं तो साफ-सफाई दुरुस्त रहती है। श्यामपट पर खड़िया से कोई सुविचार उकेरा रहता है, साथ में फूल-पत्ती भी बना दी जाती है, ताकि सौंदर्यबोध से अधिकारी प्रसन्न हों। नैतिकता भले कूड़ेदान में मिले, लेकिन गंदगी का नामोनिशान नहीं रहता। और यहां तो मामला साहब के आगमन का था, जो खुद स्वच्छता अभियान के प्रणेता रहे हैं, देश की खूब अच्छी सफाई उन्होंने की है, लेकिन उनके मार्ग में एक प्लास्टिक बोतल न जाने कहां से आ टपकी।

सुरक्षा का इतना तगड़ा घेरा तोड़कर कोई जिन्न ही वहां पहुंचा होगा, जिसने खुद को बोतल से बाहर निकाल लिया और बोतल को वहीं पड़े रहने दिया। जिन्न शायद कमअक्ल रहा होगा, उसे पता नहीं था कि घूरे के भी दिन फिरते हैं। सो उस बोतल के भी दिन फिरे और साहब ने अपने करकमलों से उसे उठाया। अब शायद वह फिर से कूड़ेदान में हो, लेकिन मेरे एंगल से उसे स्वच्छता अभियान की ट्राफी की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है। जो देश में सबसे अच्छी सफाई करता दिखेगा, उसे ससम्मान वह बोतल दी जा सकती है। साहब को ये एंगल अगर पसंद न आए, तो वे उसे बदल सकते हैं।

वैसे भी बदलाव के कई एंगल साहब ने देश को दिखलाए हैं। अर्थव्यवस्था का एंगल बदलने के लिए मुद्रा को ही बदल दिया। योजनाएं और नीतियां बनाने के लिए संस्थाओं का एंगल बदल दिया। धर्म और आध्यात्म का एंगल बदल गया, अब लोग सहज भाव से होली और ईद भी नहीं मना पाते हैं कि न जाने कब किस एंगल से सर्वधर्म सद्भाव को देखा जाने लगे। खान-पान, पहनावे, पर्यटन सबका एंगल बदल गया है। और सबसे बड़ी बात राजनीति का एंगल बदल गया है। अब राज के लिए नीति और नैतिकता की कोई जरूरत ही नहीं है, बस जैसे चाहे वैसे सत्ता हासिल करनी होती है।

खुला खेल फर्रुखाबादी लिखने वाले का एंगल को बहुत सीमित रहा होगा, यहां तो साहब ने खुला खेल सत्तावादी बना दिया है, सारा देश इस खेल का मैदान बन गया है और कहीं से भी दांव-पेंच खेले जा सकते हैं। जैसे महाराष्ट्र की सत्ता पर काबिज़ होने का सपना भाजपा कब से देख रही है, पिछले ढाई सालों में कितनी बार कोशिश की गई कि उद्धव सरकार गिर जाए। हर बार मुंह की खानी पड़ी, वैसे भी महाराष्ट्र में और खासकर मुंबई में शिवसेना के आगे जोर चलाना मुश्किल होता है। तो इस बार शिवसेना के विधायकों में ही बगावत हो गई और वो पहुंच गए सूरत। योजना तो खूबसूरत थी, लेकिन मुंबई से करीबी के कारण लगा कि सूरत में चाल बदसूरत न हो जाए, तो सारे विधायकों को उठाकर पहुंचा दिया गुवाहाटी। असम की बाढ़ में जन-धन की खूब हानि हुई है, लेकिन भाजपा शासित इस राज्य में भाजपा ने अपने लिए फायदे की संभावनाएं देखीं।

बागी शिवसेना विधायक उसकी निगरानी में रहेंगे, तो उनके बूते सरकार बनाना आसान रहेगा। बाढ़ का पानी जब उतरता है, तो अपने पीछे कीचड़ छोड़ जाता है। ये कीचड़ जमीन को बहुत उपजाऊ बना देता है। तो भाजपा का एंगल फिलहाल इस कीचड़ में कमल खिलाने की संभावनाएं तलाशने का है। और जो लोग राजनीति में अब भी नीति को महत्व देते हैं, उनका एंगल ये है कि बाढ़ में तटबंधों को तोड़कर सारी मर्यादाएं पानी उफान के साथ बहा कर ले जाता है, वैसे ही सत्तालोलुपता की बाढ़ में पिछले आठ सालों में देश में लोकतंत्र की मर्यादाएं, बंधन, नैतिकता, शिष्टाचार, संस्कार सब बह गए हैं। बाढ़ का ये पानी कब उतरेगा, कब नदी शांत होकर बहेगी, कुछ पता नहीं, क्योंकि नदी को बांध कर रखने वाली किनारे की मिट्टी को ही खोद दिया गया है। एंगल ये है कि पहले के जैसा कुछ भी न रह जाए। अगर एक भी व्यवस्था पुरानी कायम रही तो क्या पता पचास साल तक राज करने के सपने पूरे हों या न हों। इसलिए अभी पुरानी सारी चीजों को बदला जा रहा है। संसद भवन से लेकर सेना के बैरक तक हर जगह एक नया एंगल देखने मिलेगा। क्योंकि सवाल सत्ता पर फोकस का है।

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