किसी धर्म-जाति के राष्ट्रपति बनने से भला उस धर्म-जाति के भले का क्या लेना-देना..?

-सुनील कुमार॥

अखबार की जिंदगी भी बड़ी अजीब रहती है, अक्सर ही पहले पन्ने पर जगह पाने के लिए खबरों में धक्का-मुक्की होती है, और अगर पहला पन्ना तैयार करने वाले लोगों को मेहनत से परहेज न हो, तो आखिरी पलों तक खबरें ऊपर-नीचे, बाहर-भीतर होती रहती हैं। अब कल ही एक तरफ तो महाराष्ट्र की शिवसेना में अभूतपूर्व और बड़ी बगावत चल रही थी, सरकार गिरने के आसार दिख रहे थे, और दूसरी तरफ देश की विपक्षी पार्टियों ने मिलकर एक आकस्मिक एकता दिखाते हुए यशवंत सिन्हा को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बना दिया। और जैसा कि पहले से तय था, कुछ घंटों के बाद देश पर सत्तारूढ़ गठबंधन एनडीए की मुखिया भाजपा ने एक भूतपूर्व भाजपा विधायक, और राज्यपाल रह चुकीं द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति पद प्रत्याशी घोषित किया है। इन दोनों ही नामों के साथ कई तरह की चर्चा शुरू हुई, यशवंत सिन्हा भाजपा की अगुवाई वाली अटल सरकार में महत्वपूर्ण वित्तमंत्री और विदेश मंत्री रह चुके हैं, लेकिन कल सुबह तक वे ममता बैनर्जी की तृणमूल कांग्रेस में थे, और विपक्ष के संयुक्त सर्वसम्मत उम्मीदवार बनने के पहले उन्होंने तृणमूल कांग्रेस से इस्तीफा दिया। यह बात जगजाहिर है कि ममता बैनर्जी और कांग्रेस के बीच एक अनबोला सा चल रहा है, और बड़ी तनातनी चल रही है, इस बीच में अगर ममता की पसंद को कांग्रेस खुलकर अपना पूरा समर्थन दे रही है, तो यह कल का एक बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम था। और खासकर उन घंटों में यह सहमति या एकता नजर आई जब उन्हीं घंटों में महाराष्ट्र में शिवसेना के भीतर असहमति और फूट सुर्खियों में थी। राष्ट्रपति पद के लिए दो उम्मीदवार सामने आ चुके हैं, लेकिन विधायकों और सांसदों के बहुमत से चुने जाने वाले राष्ट्रपति के लिए आज आंकड़े किसके साथ हैं, यह बात साफ है, और अब से राष्ट्रपति चुनाव मतदान तक हो सकता है कि शिवसेना के बहुत से विधायकों के वोट भी भाजपा उम्मीदवार के साथ चले जाएं।
लेकिन ये राजनीतिक घटनाक्रम अभी उतार-चढ़ाव से गुजर रहा है, और इस पर लिखने की अधिक जरूरत नहीं है। एक दूसरा मुद्दा जो इन्हीं सबके बीच से निकलकर आ रहा है, वह द्रौपदी मुर्मू का है। वे ओडिशा में सरकारी नौकरी में छोटी सी कुर्सी से उठकर वार्ड चुनाव लड़ते हुए विधायक बनी, और दो कार्यकाल विधायक रही, मंत्री भी रहीं। वे सिर्फ भाजपा में रहीं, और इस नाते 2015 में वे झारखंड की राज्यपाल बनाई गईं। वे ओडिशा की आदिवासी हैं, और देश के आदिवासी राज्य झारखंड में राज्यपाल रहीं, और अब उन्हें एक आदिवासी महिला के रूप में भाजपा ने अगला राष्ट्रपति बनाने का फैसला लिया है। उनका नाम सामने आने के बाद देश में यह चर्चा जोरों से चल रही है कि क्या एक आदिवासी महिला होने के नाते वे आदिवासियों या महिलाओं की हिफाजत के लिए कुछ कर पाएंगी, या फिर वे मौजूदा राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की तरह होकर रह जाएंगी जो एक दलित होने के नाते इस पद पर लाए गए थे, और जिनके कार्यकाल के दौरान देश के दलितों ने खूब जुल्म झेले हैं, और राष्ट्रपति की तरफ से हमदर्दी के कुछ शब्द भी नहीं आए। अब सोशल मीडिया इस बात पर उबला पड़ा है कि द्रौपदी मुर्मू जब झारखंड की राज्यपाल रहीं उस दौरान वहां आदिवासियों पर खूब जुल्म हुए, सरकारी फैसले आदिवासियों के खिलाफ लिए गए, लेकिन राजभवन में रहते हुए उन्होंने इनमें से किसी बात का विरोध नहीं किया।
अब राष्ट्रपति बनाते वक्त किसी तबके को महत्व देने, या किसी तबके को संतुष्ट करने की बात तो ठीक हो सकती है, लेकिन राष्ट्रपति बनने के बाद क्या ऐसे लोग अपने तबके का कोई भला कर पाते हैं? या क्या उन्हें अपने तबके का अलग से कोई भला करना चाहिए? जो ओहदा देश की संवैधानिक व्यवस्था में सबसे ऊपर बनाया गया है, और जिसकी हकीकत भी सब जानते हैं कि यह ओहदा मोटेतौर पर केन्द्र सरकार का चेहरा देखकर काम करता है, उस ओहदे पर किसी को किस उम्मीद के साथ बिठाया जाता है? यह बात तो साफ है कि जिस तरह ज्ञानी जैलसिंह अपने पूरे कार्यकाल प्रधानमंत्री राजीव गांधी से नापसंदगी से देश में एक अनिश्चितता बनाए हुए थे, वैसा राष्ट्रपति तो कोई भी सरकार नहीं चाहेगी। सरकार तो आमतौर पर फखरूद्दीन अली अहमद किस्म का राष्ट्रपति चाहेगी जिससे आपातकाल की घोषणा पर आधी रात को दस्तखत करवा लिए गए थे। इसलिए किसी भी सरकार से राष्ट्रपति को अधिकार देने की उम्मीद करना फिजूल की बात है।
अब सवाल यह उठता है कि अगर प्रचलित जनधारणा के मुताबिक राष्ट्रपति केन्द्र सरकार की रबर स्टैम्प ही है, तो किसी भी ईमानदार और इज्जतदार व्यक्ति को रबर स्टैम्प क्यों बनना चाहिए? और जहां तक संवैधानिक सीमाओं की बात है, तो भारत की संवैधानिक व्यवस्था में भी राष्ट्रपति के लिए बहुत सी बातें मुमकिन हैं। राष्ट्रपति देश के हालात पर अपनी बात कह सकते हैं, और उन्हें केन्द्र सरकार भी इससे नहीं रोक सकती। राष्ट्रपति कोई इंटरव्यू दे सकते हैं, कोई लेख लिख सकते हैं, सरकार के भेजे प्रस्तावों को रोककर देर कर सकते हैं, उन्हें कम से कम एक बार तो अपनी आपत्ति या सुझाव लगाकर वापिस भेज सकते हैं, लेकिन अगर कोई राष्ट्रपति अपने इन संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल भी नहीं करते हैं, तो वे अपने को इस कुर्सी पर बिठाने वाले के प्रति वफादारी दिखाते हैं, या राष्ट्रपति का दूसरा कार्यकाल पाने के लिए सरकार की सेवा करते हैं। जो एक बार इस ओहदे पर पहुंच गए, उन्हें हटाना तो आसान नहीं रहता, इसलिए उन्हें पांच बरस के एक कार्यकाल की सहूलियतों की तो गारंटी रहती है। इसके बाद भी अगर पुरानी वफादारी या आगे की उम्मीद न हो, तो यह रबर स्टॉम्प भी देश का भला कर सकता है, सरकार के गलत कामों पर उसकी फजीहत कर सकता है। लेकिन ऐसे राष्ट्रपति पहली बात तो बनाए नहीं जाते, और दूसरी बात यह कि बनने के बाद वैसे रह नहीं जाते। इसलिए देश के सबसे बड़े संवैधानिक ओहदे का लगभग हमेशा ही बेजा इस्तेमाल होते आया है, पुरानी वफादारी और शुक्रगुजारी दिखाने के लिए, या दूसरे कार्यकाल की उम्मीद के लिए। ऐसे में अगर कोई राष्ट्रपति केन्द्र सरकार या देश की किसी सरकार के असंवैधानिक कामकाज को देखते हुए भी उसे अनदेखा करते हैं, तो वे हौसले की कमी, और निजी स्वार्थ की वजह से करते हैं, या फिर ऐसा इसलिए भी कर सकते हैं कि उनकी कुछ कमजोर बातें सरकार के हाथ हों।
आज एक आदिवासी महिला के राष्ट्रपति बनने की संभावनाओं से न तो आदिवासियों के खुश होने की कोई बात है, और न ही महिलाओं के खुश होने की। इन दोनों के खिलाफ देश भर में पिछले बरसों में जो माहौल बना हुआ था, उसमें राज्यपाल रहते हुए भी, और उसके बाद भी उन्होंने मुंह खोला हो, ऐसा याद नहीं पड़ता। इसलिए उनके आने से देश के आदिवासी समुदाय में उत्साह की कोई वजह नहीं है, और न ही महिलाओं में उत्साह की। आने वाला वक्त बताएगा कि क्या वे अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी पूरी करेंगी, या वफादारी और उम्मीद के साथ वक्त काटेंगी। भारत के राष्ट्रपति पद को गैरजरूरी महत्व नहीं देना चाहिए, यह समारोहों के लिए बनाया गया दिखावे का एक ओहदा है, जिस पर बैठे लोगों के सामने इस पसंद का मौका रहता है कि वे चाहें तो असर डाल सकते हैं।

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