मनोहर पर्रिकर ने कहा था सेना RSS से लेती है प्रेरणा..

-मणिमाला॥

नौजवां साथियों, क्यों ट्रेनें फूंक रहे हो। बसें तोड़ रहे हो। पत्थर फेंक रहे हो। यह सच है कि चाहे जितनी ट्रेनें फूंको, पत्थर फेंकों, दो-चार सर भी फोड़ दो तुम्हारे घर नहीं ढहाए जायेंगे। तुम ‘वो’ नहीं हो न! बल्कि तुममें से कइयों ने ताली भी बजाई थी, नाचते-गाते खुशियां मनाई थी जब ‘उनके’ घर ढहाए जा रहे थे। मस्जिदों पर भगवे लगाने, तलवारों/असलहों के साथ मुस्लिम बहुल बस्तियों में नाचने- गाने, जुलूस निकालने, मां-बहनों वाली गालियां देने में भी तुममें से कई शामिल थे। तुम पर इन हिंसक वारदातों के लिए कोई कार्रवाई नहीं होने वाली। जेल गए भी तो जल्दी ही छूट आओगे।
हां, ‘अग्निपथ’ ने सेना में भर्ती का तुम्हारा सालों से संजोया सपना जरूर चूर कर दिया। नहीं….नहीं चार साल बाद बेरोजगारी वापस नहीं आने वाली, चार साल के लिए भी यह अवसर नहीं मिलने वाला है तुम्हें। हो सकता है संतुलन बनाने के लिए कुछ को मिल जाए। ‘अग्निपथ’ की यह योजना बनाई ही गई है ‘शाखावीरों’ के लिए, ‘माफीवीरों’ की राजनीतिक औलादों के लिए।
आठ साल पहले ही, या उससे भी पहले यह योजना बन चुकी थी। पूर्व रक्षामंत्री (अब दिवंगत) मनोहर पर्रिकर का वह बयान याद करो जब उन्होंने कहा था कि भारतीय सेना RSS के स्वयंसेवकों से प्रेरणा लेती है। फिर सैनिक स्कूल बनाने और उसके नीजिकरण की योजनाएं आईं। संयुक्त सचिव जैसे पदों पर बिना परीक्षा सीधी नियुक्ति, किसी भी बहाली के लिए किसी इम्तहान/ इंटरव्यू न होने की घोषणाएं …..यह सब काफी था इतना समझ लेने के लिए तुम्हारा भविष्य ही नहीं, उसका सब कुछ दांव पर है, कि जो शाखा वीर नहीं है। यह देश ही दांव पर है।
आठ साल पहले जब सियासतदानों की नई टीम आई तभी से उपर की नौकरियों में बंदरबांट शुरू हुई। विश्व विद्यालयों के कुलपति, नामी-गिरामी संस्थानों/प्रकल्पों के मुखिया….हर महत्वपूर्ण पोस्ट पर शाखा संचालकों की बहाली हुई तो बड़े पैमाने पर जमीनी शाखा वीरों की नाराज़गी सामने आने लगी थी। इतना लाठी पेलते हैं, झंडा/डंडा उठाए फिरते हैं, वर्जिश करते रहते हैं, दंगे फसाद करवाते रहते हैं और रेवड़ियां सिर्फ ‘बड़े-बड़ों’ के बीच बंट रही है। उनका क्या? तभी बड़े पैमाने नौकरियां खोजी जाने लगीं। सेना और रेलवे में बड़े पैमाने पर शाखा वीरों के खपाने की गुंजाइश दिखी। सेना के तीनों अंगों के उपर एक नायक बिठाए गए। यह सेना नायक होते हुए भी ‘राजनीतिक’ और ‘राजप्रिय’ भी थे। उनके देहांत के बाद वैसा ही ‘आज्ञाकारी’ नायक ढूंढने में महीनों गुजर गए। ईधर आप शारीरिक और मेडिकल फिटनेस में सफल हो इम्तहान की तारीख का इंतजार करते रहे। बुल्डोजर की ताल से ताल मिलाते रहे। मस्जिदों पर भगवे लगाने और ‘जूते मारो सालो को……’ के नारों में अपना भविष्य तलाशते रहे। इम्तहान की तारीख तो नहीं आई, ‘अग्निपथ’ आ गया और आप भी ‘अग्निपथ’ पर आ गए।
तो, मेरे नौजवां दोस्तो, अब तो समझ लीजिए कि ‘अग्निपथ’ की यह योजना आपके लिए है ही नहीं, शाखा वीरों के लिए है। आपके लिए तो बस अग्निपथ ही है। रक्षामंत्रालय के साईट पर जाइए, ‘अग्निपथ’ की ‘खुबियों’ को ध्यान से पढ़िए। साथ में इसका खैर मकदम करती सामुहिक कोरपोरेट विज्ञापनों पर भी नजर डालिए। पिक्चर एकदम साफ़ है।
‘अग्निपथ’ के बहुतायत ‘अग्नि वीर’ शाखा वीर ही होंगे। चार सालों तक बम-बारूद-बंदुक-गोले-हथगोले-भाला-तलवार सब सीखकर ‘पूर्व’ सैनिक और ‘अग्नि वीर’ के तमगे के साथ कहीं भी किसी पर भी हमला बोलने का अधिकार लेकर लौटेंगे। साथ में कुछ एक लाख रुपए भी होंगे। शाखा वीरों का कुछ न मिलने का गुस्सा काफूर करने के लिए यह काफी है। कोरपोरेट को भी अपने मजदूरों को दबाने, आदिवासियों की जमीन छीनने, दलितों को सबक सिखाने में ये भरी जवानी में रिटायर्ड ‘अग्नि वीर’ केंद्रीय भूमिका निभाएंगे। 45-45 हजार के बैज में धीरे धीरे-धीरे तमाम नौजवान शाखा वीरों को अनुशासित, प्रशिक्षित कर हिंसक अग्निवीरों को समाज में खुला छोड़ दिया जाएगा। गैर शाखावीर नौजवानों की मजबूरी होगी कि ‘अग्निवीर’ बनने के लिए ‘शाखावीर’ बनने की शर्त स्वीकार करें।
तो, नौजवानों। ठीक से समझ बुझ लो। पसीना बहा रहे हो‌, बहाओ। नारे लगा रहा हो, लगाओ। लेकिन शांतिमय तरीके से। आगजनी और पत्थरबाजी करके कुछ नहीं मिलेगा। कुछ मिल भी जाए तो भी करना नहीं चाहिए। हमारे आपके खून पसीने का ही प्रतिफल है यह सब। पत्थर पर सर‌ मत पटको। लड़ो। तरीके से लड़ो। अभी अभी शाहीनबागीन दादियों-नानियों और किसानों ने रास्ता दिखाया है न। यह तो तुम सबके जेहन में होगा ही। थोड़ा गांधी को भी पढ़ लोगे तो सत्याग्रही होने का जोश और होश आ जाएगा।
शांति, सत्य, सद्भाव की राह चलोगे तो हम भी चलेंगे तुम्हारे साथ मुंह पर काली पट्टी और हाथ पीछे बांध कर। इस अफसोस के साथ कि हम तुम्हें उतना भी न दे सकें जितना हमें मिला। लगभग नि:शुल्क शिक्षा, बहुत ही सस्ती प्राथमिक चिकित्सा सेवा, आज के मुकाबले एक बेहतरीन समाज और ढेर सारे सपने सामाजिक सौहार्द के, दोस्त रंग बिरंगे….. दिवाली में दिये जलाए, ईद में सेवियां खाई, क्रिसमस पर सांता क्लॉज बने-बनाए, गुरु परब पर गुरू का लंगर खाया…..। और तुम्हें उलझाए रखा गया बुलडोजर की ताल पर नाचने में, मस्जिदों पर भगवा लगाने में, ताजमहल के तहखानों में शिवलिंग तलाशने में…..।
तुम अग्निपथ पर नहीं, शांति-सद्भाव पथ पर चलो। सेना में ससम्मान भर्ती होने के अपने सपने पूरे करो, बढ़िया रोजगार मिले, सबरंगी दोस्तों का साथ इन्कलाब जिंदाबाद।

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