राहुल जिंदाबाद, इंसानियत जिंदाबाद..

-सर्वमित्रा सुरजन॥

राहुल के बचाव में लगे तमाम लोगों की जितनी तारीफें की जाएं, कम हैं। राहुल तक पहुंचने के लिए तरह-तरह की तकनीकों का इस्तेमाल किया गया और इससे फिर साबित हुआ कि विज्ञान का ज्ञान और वैज्ञानिक नजरिया दोनों हमारे जीवन के लिए कितने उपयोगी हैं। जमीन के नीचे केवल रस्सी डालकर निकालना होता तो यह काम कुछ घंटों में खत्म हो जाता।

छत्तीसगढ़ का राहुल मौत पर संघर्ष भरी जीत की दास्तां लिखकर नया हीरो बनकर निकला है। खौफनाक, लेकिन रोमांचक हकीकत, तकनीकी के कमाल और चमत्कारों से भरी इस दास्तां में वह मुख्य किरदार है, लेकिन बाकी लोग भी असल नायकों से कम नहीं हैं। दरअसल यह पूरी दास्तां इस बात पर यकीन दिलाती है कि अगर इंसानियत को सबसे बड़ा धर्म माना जाए, अगर इंसान मुश्किलों के आगे हार न माने, अगर पूरी सकारात्मकता के साथ किसी उद्देश्य को प्राप्त करने में जुटा जाए, अगर लोकतांत्रिक निर्वाचित सरकार जनहित और जनरक्षा के अपने कर्तव्य को याद रखे तो फिर वाकई नामुमकिन लगने वाली बातें मुमकिन हो जाती हैं। फलां है तो मुमकिन है, जैसे चाटुकारिता से भरे नारों की तब जरूरत नहीं पड़ती। जनता अपने आप, आपका लोहा मानने लगती है।

जमीन से 80 फीट नीचे यानी जिसे पाताल कहा जा सकता है, वहां चट्टानों, पानी, जहरीले कीड़ों और सांपों के डर के बीच, अंधेरे में, बिल्कुल अकेले 105 घंटे तक फंसे रहना और सांसों को इस उम्मीद पर चलाते रहना कि रौशनी की किरण कभी तो देखने मिलेगी, आसान नहीं है। बल्कि मुमकिन भी नहीं लगता कि इतने कठिन हालात में कोई कैसे रह सकता है। लेकिन 10 साल के राहुल ने यह सब कर दिखाया है। क्योंकि जमीन के नीचे वह अकेला था, लेकिन जमीन से ऊपर छत्तीसगढ़ सरकार, प्रशासनिक अमला, एसडीआरएफ, एनडीआरएफ, रोबोट टीम, एसईसीएल, बाल्को, बीएसपी, राज्य पुलिस, सेना के जवान इन सब का मिला-जुला बचाव दल भी राहुल को बाहर निकालने के लिए दिन-रात लगा हुआ था। फायर ब्रिगेड, जेसीबी, क्लोज सर्किट कैमरा, आक्सीजन सिलेंडर, एंबुलेंस, कई तरह की कटर मशीनें ये सभी बचाव दल का हिस्सा थे। अभी हम देश के कई हिस्सों में मशीनों से इंसानियत को कुचलने का सियासी कारनामा देख रहे हैं, लेकिन मशीनें गरीब जनता की जीवन रक्षा में कितनी मददगार साबित हो सकती हैं, इसका बेहतरीन उदाहरण छत्तीसगढ़ से सामने आया है।

शुक्रवार सुबह तक छत्तीसगढ़ के मालखरौदा के पिहरीद गांव में जीवन यथावत चल रहा था। लेकिन फिर 10 साल के मूक बच्चे राहुल के गायब होने और फिर उसके बचाव अभियान के कारण यह गांव राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आ गया। दरअसल शुक्रवार को राहुल को उसके घर वालों ने बहुत देर तक अपने आसपास न देखकर उसकी तलाश शुरु की। उसका नाम लेकर पुकारा गया तो घर के पास ही खेत में खोदे गए 80 फीट के बोरवेल से कुछ आवाज आई और पता चला कि राहुल खेलते-खेलते वहां गिर गया। एक खुला बोरवेल फिर एक बड़ी दुर्घटना का कारण बना। देश में हर साल ऐसा कोई न कोई बड़ा हादसा सामने आ ही जाता है, जब बड़ों की लापरवाही के कारण खुले गड्ढों या बोरवेल में कोई बच्चा गिर जाता है। ऐसी ही एक घटना 2006 में राष्ट्रीय स्तर की सुर्खियां बनी थी, जब 4-5 बरस का प्रिंस नाम का बच्चा हरियाणा में 60 फीट गहरे बोरवेल में गिर गया था। तब भारतीय सेना ने 50 घंटों का ऑपरेशन चला कर बच्चे को बाहर निकाला था।

उस वक्त प्रिंस के गांव में पीपली लाइव जैसा मजमा जुट गया था और उसके सकुशल बाहर आने को टीवी चैनलों के प्राइम टाइम में जगह दी गई थी। कई फिल्मी सितारों और नामचीन हस्तियों ने प्रिंस के हौसले की तारीफ करते हुए, कहीं उसे तोहफे दिए, कहीं उसके साथ बातचीत की। एक गंभीर हादसे से सबक लिया जा सकता था, मगर इसे मीडिया की मदद से तमाशे में बदला गया, फिर तमाशा खत्म, पैसा हजम की तर्ज पर सारे सबक भुला दिए गए। इसके बाद और भी हादसे हुए, जिनमें कई में बच्चे बच गए, कई बच्चे बड़ों की करनी का फल भुगतते हुए इस दुनिया से चले गए। जो नहीं बचाए जा सके, उनके लिए प्रिंस की तरह किस्मतवाला नहीं रहा बच्चा, जैसे शीर्षक के साथ खबरें चलाई गईं। जबकि यह सबके सामने है कि गड्ढों को खोदना, और उन्हें खुले रखने की लापरवाही करने में किस्मत या प्रकृति का कोई हाथ नहीं है, यह पूरी तरह मानव निर्मित आपदा है। जब राहुल के बोरवेल में गिरने की खबर आई तो फिर प्रिंस प्रकरण की यादें ताजा हो गईं।

राहुल बोलने में असमर्थ है और मानसिक तौर पर कमजोर भी बताया जा रहा है। हालांकि अब विशेषज्ञों को इस पर विचार करना चाहिए कि मानसिक कमजोरी का पैमाना क्या हो। क्योंकि जिस हिम्मत और जिजीविषा का उदाहरण राहुल ने पेश किया है, वह शत प्रतिशत मानसिक मजबूती है। पढ़ाई में होशियारी, अच्छे अंक लाना, हर वक्त पहले स्थान पर आने की होड़ में रहना, प्रतियोगिता में जीतने को जीवन का लक्ष्य बना लेना और तमाम सुविधाओं के बीच पदक या खिताब जीतना ही कामयाबी की परिभाषा बना दी गई है। संपन्न तबकों में मां-बाप अक्सर अपने बच्चों को इसी परिभाषा को रटाते हुए बड़ा करते हैं। उन्हें असली जीवन संघर्षों से दूर रखते हैं। पांच-सात सितारा स्कूलों में वातानुकूलित बसों से लेकर वातानुकूलित कक्षाएं रहती हैं, और यहां ग्राहकों की तरह बच्चों के नाज़-नखरों का पूरा ख्याल रखा जाता है।

अभिभावक इसी बात पर खुश रहते हैं कि स्कूलों में उन्हें घर जैसा आराम मिलता है। व्यावहारिक जीवन के सबक के नाम पर कई स्कूलों में एडवेंचर क्लब जैसी सुविधाएं रहती हैं, जहां सारे साजो सामान के साथ कभी पहाड़ पर चढ़ने का खेल होता है, कभी किसी जंगल या दुर्गम इलाके की सैर। हो सकता है बच्चों को इसमें भी कई तरह की सीख मिलती हो, लेकिन इससे मानसिक मजबूती कितनी मिलती है, ये कहना कठिन है। हम देखते हैं कि हर साल 10वीं या 12वीं के परीक्षा परिणामों और प्रतियोगी परीक्षाओं के नतीजों के बाद बहुत से किशोर अपना जीवन खत्म कर लेते हैं।

उन्हें असफलताओं का सामना करना सिखाया ही नहीं जाता, कभी अभावों से बच्चों का परिचय नहीं कराया जाता। बल्कि हर वक्त जरूरत से अधिक चीजें उन्हें उपलब्ध कराई जाती हैं और तर्क ये रहता है कि हमने जो कठिन दिन देखें, उन कठिनाइयों का सामना हमारे बच्चों को न करना पड़े। बात सही भी है, क्योंकि कोई अभिभावक अपने बच्चों को तकलीफ में नहीं रखना चाहता। लेकिन तकलीफ या मुसीबत कई बार अवांछित आगंतुक की तरह उपस्थित हो जाती हैं, तब बच्चे उनका सामना किस तरह से करें, ये सीख बच्चों को मिलनी ही चाहिए। केवल बौद्धिकता को मानसिक मजबूती से जोड़ना या आई क्यू स्तर कम होने को मानसिक कमजोरी मानना सही नहीं होगा। राहुल इस वक्त अपनी उम्र और पीढ़ी के तमाम बच्चों के लिए एक मिसाल बन चुका है कि कैसे चट्टान के समान आई मुसीबत का उसने पूरे दमखम के साथ किया। मौत से सीधी मुठभेड़ में उसे मात दे दी।

राहुल के बचाव में लगे तमाम लोगों की जितनी तारीफें की जाएं, कम हैं। राहुल तक पहुंचने के लिए तरह-तरह की तकनीकों का इस्तेमाल किया गया और इससे फिर साबित हुआ कि विज्ञान का ज्ञान और वैज्ञानिक नजरिया दोनों हमारे जीवन के लिए कितने उपयोगी हैं। जमीन के नीचे केवल रस्सी डालकर निकालना होता तो यह काम कुछ घंटों में खत्म हो जाता, मगर राहुल को निकालने के लिए कहीं जमीन के भीतर चट्टानों को खुरचना पड़ा, कहीं सुरंग बनानी पड़ी। और इस काम में विज्ञान की शिक्षा ही काम आई। लेकिन इसके साथ मानवीय पहलू का भी पूरा ध्यान रखा गया। राहुल के परिजन अपनी पीड़ाओं और आंसुओं के साथ धैर्यपूर्वक इस बात की प्रतीक्षा कर रहे थे कि कब राहुल सकुशल बाहर निकाला जाएगा। पांच दिनों तक उनकी सांसें भी अटकी रहीं। बोरवेल में फंसा राहुल रोता तो सबकी जान में जान आती, क्योंकि इससे पता चलता कि उसकी सांसें चल रही हैं, उसे हौसला बंधाने के लिए उससे बात करने की कोशिश होती रही, उसे उसका मनपसंद पेय नीचे भेजा जाता रहा, ताकि उसे थोड़ी ताकत मिलती रहे। राहुल के बाहर निकलने के बाद उसे पड़ोस के बिलासपुर शहर तक पहुंचाने की भी चाक चौबंद व्यवस्था पहले ही की गई, ताकि उसे सर्वोत्तम चिकित्सीय सहायता फौरन उपलब्ध हो सके।

राहुल के फंसने से लेकर जिंदा बाहर निकलने की यह पूरी घटना गलतियों को सुधारने का सबक और मानवता को सर्वोपरि रखने की मिसाल है। उम्मीद है राहुल जैसे तमाम बच्चे हर तरह के गड्ढों से सुरक्षित रहें, ऐसा इंतजाम इस देश के बड़े लोग करेंगे।

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