सैन्य नीति में अग्निपथ प्रयोग से नाराज युवा..

भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में बेरोजगारी एक बड़ी समस्या रही है, और लगभग सभी सरकारों को इस मुद्दे पर युवाओं के आक्रोश का सामना करना पड़ा है। लेकिन मौजूदा केंद्र सरकार ने बेरोजगारी के मुद्दे पर अनूठी राह ही पकड़ी। आठ साल पहले भाजपा ने वादा किया था कि देश में हर साल 2 करोड़ लोगों को रोजगार दिया जाएगा। ये वादा न कभी पूरा हुआ, न सरकार की ओर से कोई ऐसी कोशिश नजर आई कि देश में रोजगार के मौके बनाए जा रहे हैं। बल्कि एक-एक कर के कई सरकारी उपक्रमों को निजी हाथों में सौंपा गया, जिससे रोजगार के अवसर खत्म होते गए।

नोटबंदी और लॉकडाउन के फैसलों से लाखों नौकरियों पर असर पड़ा, असंगठित क्षेत्र के करोड़ों लोग बेरोजगार हो गए। पिछले आठ सालों में बेरोजगारी दर 45 साल का रिकार्ड तोड़ती नजर आई। बीच में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बयान दिया कि अगर कोई पकौड़ा बेचता है तो वह भी रोजगार है। इसके बाद तो पकौड़ा रोजगार के कई और अनूठे उदाहरण सामने आए। लोगों को आत्मनिर्भरता का पाठ इस तरह पढ़ाया गया कि आमदनी में भी आत्मनिर्भर बनो, नौकरियों की अपेक्षा मत रखो, बल्कि खुद दूसरों को रोजगार देने वाले बनो। स्टार्ट अप और स्टैंड अप के बीच भारत का युवा डिग्रियों के साथ अच्छे दिनों की तलाश में यहां-वहां भटकता रहा। चुनाव के वक्त घोषणापत्रों में रोजगार देने का वादा एक स्थायी कॉलम की तरह चस्पां हो गया। गुजरे सालों में कई बार ऐसी तस्वीरें देखने मिली, जब सरकारी नौकरी की परीक्षा देते और परिणामों का इंतजार करते युवा व्यवस्था से बेचैन, कुंठित और आक्रोशित नजर आए। इनकी नाराजगी अगर सड़कों पर कभी निकली, तो बदले में उन्हें लाठियों का जवाब मिला। सेना में भी भर्ती के लिए लाखों नौजवान तैयारी करते रहे और इस इंतजार में रहे कि कब सरकार कोई ऐलान करेगी।

अब केंद्र सरकार ने नौकरियों और सेना में भर्ती दोनों के लिए घोषणा की है। मंगलवार को प्रधानमंत्री कार्यालय से ट्वीट कर जानकारी दी गई कि अगले डेढ़ साल में 10 लाख नौकरियों का निर्देश प्रधानमंत्री ने दिया है। वैसे तो वादा हर साल 2 करोड़ रोजगार का था, अब बात एक महीने में एक लाख रोजगार की भी नहीं रही। खैर ये 10 लाख भर्तियां भी कब और कैसे होंगी और इनका अगले दो साल में होने वाले 11 विधानसभा चुनावों और 2024 के आम चुनाव पर किस तरह पड़ेगा, ये देखने वाली बात होगी। केंद्र सरकार ने अग्निपथ योजना की भी घोषणा की। जिसके तहत साढ़े सत्रह साल से 21 साल के 45 हजार से 50 हजार युवाओं को 4 साल के लिए सेना में भर्ती किया जाएगा। सरकार के मुताबिक अगले 90 दिनों के भीतर भर्ती प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी और जुलाई 2023 तक पहला बैच तैयार हो जाएगा। इस योजना के तहत जिन युवाओं का चयन सेनाओं में होगा उन्हें अग्निवीर के नाम से जाना जाएगा और इसमें चयन ऑनलाइन केंद्रीय सिस्टम के जरिए होगा।

भारतीय सेना 14 लाख जवानों के साथ दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी सेना है। चार-चार युद्धों का सामना कर चुके भारत के लिए एक मजबूत सैन्य तंत्र कितना जरूरी है, यह सब जानते हैं। हमारे पड़ोस में पाकिस्तान और चीन जैसे देश हैं, जिनसे सीमा विवाद एक अंतहीन समस्या की तरह चला आ रहा है। देश की रक्षा के लिए भारतीय सेना के जवान समर्पित भाव से दिन-रात डटे हुए हैं। सेना में भर्ती से लेकर उनके प्रशिक्षण तक और उनकी आकस्मिक मौत या सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें पेंशन की व्यवस्था सरकार करती है। इसका अच्छा खासा भार बजट पर पड़ता है, फिर भी इसे जरूरी खर्च की तरह वहन किया जाता है। मगर अब सैन्य व्यवस्था में अस्थिरता और अनिश्चितता की तलवार लटक रही है। कई पूर्व सैन्य अधिकारी और विशेषज्ञ अग्निपथ योजना को लेकर सवाल उठा रहे हैं।

सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि पचास हज़ार जवानों की भर्ती तो होगी लेकिन उनमें से केवल साढ़े बारह हजार जवान ही आगे सेना में नौकरी कर सकेंगे और रिटायरमेंट के बाद पेंशन पा सकेंगे। बाकी बचे साढ़े पैंतीस हज़ार जवान रिटायर होकर क्या करेंगे, कहां जाएंगे। हथियारों का प्रशिक्षण लिए हुए ये पूर्व सैनिक, 24-25 की उम्र में बेरोज़गार बनकर क्या देश के लिए एक नया खतरा नहीं बन जाएंगे, इस पर चिंता जतलाई जा रही है। वैसे इस सवाल के उठने के बाद गृहमंत्री अमित शाह का जवाब आया है कि इन्हें असम राइफल्स समेत सभी सशस्त्र बलों में भर्ती में प्राथमिकता मिलेगी। पर इन जगहों पर भी कितने पूर्व सैनिकों को समायोजित किया जाएगा।

क्योंकि हर चार साल में हजारों सैनिक इसी तरह सेवामुक्त होते जाएंगे। अग्निपथ योजना में सैनिकों के लिए 30 हजार का मासिक वेतन तय किया गया है, लेकिन उन्हें केवल 21 हजार ही हाथ में मिलेंगे, बाकी बचे 9 हजार सेवा निधि कोष में जमा होंगे, सरकार भी इसमें अपना हिस्सा जोड़ेगी। चार साल बाद 5.02 लाख रुपये अग्निवीरों के और इतनी ही रकम सरकार की ओर से मिलाकर कुल 10.04 लाख में ब्याज की रकम जोड़ते हुए 11.7 लाख रुपये अग्निवीरों के हाथों में आएंगे। इस रकम के अलावा उनके पास भावी जीवन की कोई गारंटी नहीं रहेगी और इसके भरोसे किस तरह जिम्मेदारियों का वहन किया जाएगा, यह भी विचारणीय है। एक सवाल सैनिकों की दक्षता और प्रतिबद्धता का भी है। पूर्णकालिक और अंशकालिक सेवाओं में कुछ फर्क तो आ ही जाता है। सामान्य क्षेत्र की नौकरी में इस फर्क से होने वाले नुकसान को झेला जा सकता है। लेकिन जब बात देश और देशवासियों की रक्षा की हो, तब आधी-अधूरी भावना बहुत भारी पड़ सकती है।

फिलहाल सरकार की इस योजना का देश के कई हिस्सों में विरोध हो रहा है। नोटबंदी, लॉकडाउन और कृषि कानून जैसे फैसले लाने के वक्त सवाल उठे थे कि इसमें विशेषज्ञों से कितनी सलाह ली गई। एक बार फिर यही सवाल उठ रहा है कि क्या सैन्य और रक्षा विशेषज्ञों से इस बारे में परामर्श किया गया था, या फिर पेंशन और बाकी खर्चों से बचने के लिए सैन्य नीति में अपने किस्म का प्रयोग किया गया है। उम्मीद है कि केंद्र सरकार अपने इस फैसले के हर पहलू को परखेगी।

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